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October 25, 2009

बम विस्फोट आखिर पाकिस्तान में क्यों..??


दहशतगर्दी का दर्द समझ आ रहा होगा पाकिस्तान को

पिछले कुछ दिनों से लगातार कुछ खबरें सुन रहा हूँ। यह खबरें वैसे तो हम मानसिक सुकून देने वाली कह सकते हैं लेकिन फिर भी मैं इनपर कुछ सोचने के लिए विवश हुआ। आप दोस्तों से शेयर करना चाहता हूँ जैसी कि मेरी आदत है। यहाँ मैं बात कर रहा हूँ पाकिस्तान में लगातार हो रहे बम विस्फोटों की। कई बार तो इन विस्फोटों की भयावहता देखकर लगता है कि ओफ..अगर यह सब भारत में हुआ होता तो कितना भयानक मंजर होता...!!!! भारत की आशंका इसलिए जागी क्योंकि जिस तरह से पाकिस्तान में विस्फोट किए जा रहे हैं और जो लोग विस्फोट कर रहे हैं वो वही लोग हैं जो भारत में आतंक फैलाते रहे हैं। यहाँ की तर्ज पर ही वहाँ भी विस्फोट हो रहे हैं। कारण भी वही है....बहुचर्चित धर्म.....।

दोस्तों, जब पाकिस्तान में विस्फोट होते हैं तो वहाँ के मुस्लिम बाशिंदों के भी उसी तरह फटे हुए बदन आसमान में उड़ते हैं जैसे यहाँ हिन्दुओं के उड़े थे। दोनों ही इंसान हैं लेकिन दहशतगर्दों को यह नहीं दिखाई देता। उन्हें दिखता है कि उनकी धर्मांधता और उसके फैलाव में रोड़ा कौन बन रहा है। पाकिस्तान ने आतंकवाद को लंबे समय तक प्रशय दिया। उसे पाला पोसा। बहुचर्चित आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (खुदा की पवित्र फौज) का कई एकड़ों में फैला मुख्यालय पाक राजधानी इस्लामाबाद से कुछ ही सौ किमी दूर है। ऐसे में पाकिस्तानी आवाम को माँस के लोथड़ों में तब्दील होता हुआ देख आश्चर्य होता है। हालांकि इसके स्पष्ट कारण हैं जो आपको और हमको दोनों को पता हैं लेकिन असमंजस की स्थिति देखिए कि खुदा (?) के लिए काम करने वाली दो फौजें आपस में लड़ रही हैं और मर रही हैं। पाकिस्तान फौज और उसकी इंटेलीजेंस एजेंसी आईएसआई ने लंबे समय तक (लगभग दो दशक) आतंकियों का साथ दिया। उन्हें इतना मजबूत बनाया कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार अरब से पनपे अल कायदा से ज्यादा धन-संपदा और संसाधन पाकिस्तान और अफगानिस्तान से पनपे तालीबान के पास है। अमेरिकी वर्ल्ड ट्रेड टॉवरों को ध्वस्त करने के बाद अमेरिका ने पाकिस्तान को पुचकारने और लताड़ने का काम शुरू किया। पुचकारने का ऐसे कि उसे भरपूर आर्थिक सहायता दी गई जिससे उसकी सामाजिक जरूरतें पूरी हो सकें। लताड़ने का ऐसे कि पाकिस्तान को इसके एवज में तालीबान के खिलाफ जंग छेड़नी थी। उसी तालीबान के खिलाफ जो पाकिस्तानी फौज का बच्चा था। अब यह बच्चा बड़ा हो गया है और बाप को टक्कर दे रहा है।

तालीबान के पास कभी निर्दोषों की जान लेने के अलावा कोई विकल्प रहा ही नहीं। वो डराकर अपने धर्म को दूसरों के ऊपर हावी करना चाहता है। लेकिन उसे यह समझ नहीं आता कि आधुनिक दुनिया में यह काम उतना आसान नहीं रहा जितना 500 या 1000 साल पहले था। आज तालीबान के पास जितने संसाधन या धन होगा उतने समूचे धन की तो अमेरिका, जापान या चीन में एक अकेली अत्याधुनिक इमारत होगी। जहाँ तक हथियारों की बात है तो एके-47 या रूस से लूटे हुए टैंकों के बल पर दुनिया भी फतह नहीं की जा सकती। हाँ, एक यक्ष प्रश्न जरूर हमारे सामने खड़ा है कि पाकिस्तान के परमाणु बमों पर तालीबान कहीं कब्जा करके उन्हें भारत या अन्य योरपीय या अमेरिकी देशों के लिए इस्तेमाल ना कर दे। तो यह आशंका समूचे विश्व के मानस पर अंकित है और आए दिन अमेरिकी सैन्य विशेषज्ञ यह आशंका जाहिर करते भी रहते हैं और पाकिस्तान उस आशंका पर अपना यह कहकर स्पष्टीकरण भी देता रहता है कि उसके कंट्रोल में सबकुछ है और उसके परमाणु बम पूरी तरह सुरक्षित हैं। दूसरी एक आशंका यह भी है कि चीन तालीबान को उन परमाणु हथियारों को हड़पने या बनाने में मदद करे क्योंकि उसके दुश्मन लगभग वही देश हैं जिन्हें मुस्लिम दुनिया अपना दुश्मन मानती है। हालांकि इस्लामिक दुनिया के कई राष्ट्र प्रोग्रेसिव हैं और आतंकवाद की निंदा करते हैं लेकिन तालीबान को लगता है कि वो राष्ट्र अंततः उसी का साथ देंगे और अगर नहीं देंगे तो धर्म के फैलाव के आड़े आने के कारण उनका हर्ष भी वही किया जाएगा जो वर्तमान में पाकिस्तान का किया जा रहा है।

पाकिस्तान में हो रहे लगातार धमाके और चिंदे-चिंदे हो रहे वहाँ के नागरिक और मानवता को लेकर यह अब साफ हो गया है कि तालीबान किसी का नहीं है। जिस देश के लोगों के रूपयों से उसने संसाधन जुटाए उसी देश के लोगों (जो उसके समान धर्म के भी हैं) का नाश करने से वो नहीं चूक रहा। अब उसकी प्रायरोरिटी पर भारत नहीं बल्कि पाकिस्तान है और अब वहाँ के आत्मघाती लड़ाकों को यह बताया जा रहा है कि अगर अल्लाह की बनाई जन्नत में जाना है तो अमेरिका का साथ देने वाले पाकिस्तान के लोगों को लाशों में बदलो। पाकिस्तान दुविधा में है, वो ना चाहते हुए भी तालीबानी आतंकवादियों के खिलाफ बड़ी लड़ाई लड़ रहा है और हजारों तालीबानियों को मौत के घाट उतार चुका है। उसके कई सैनिक और कई मासूम बाशिंदे भी इस लड़ाई में मारे जा रहे हैं लेकिन पीओके और अफगानिस्तान से सटी पाकिस्तानी सीमा पर बसे गाँव के लोग मानते हैं कि इस धर्मांध तालीबान का नाश होना ही चाहिए। वो त्रस्त हो चुके हैं ऐसे वातावरण से जिसमें वो सिर्फ नमाज पढ़ने वाले बनकर रह गए हैं। उन्हें सिर्फ वही करने की इजाजत है जो 1400 पहले थी। आधुनिक दुनिया में उनको झाँकने तक की इजाजत नहीं है। ऐसे में उनका दम घुट रहा है। पाकिस्तान के लोगों को यह अहसास हो रहा होगा कि दहशतगर्दी में जीने पर कैसा महसूस होता है।

आपका ही सचिन....।

September 02, 2009

भारतीय लड़कियों की यह कैसी समझ?

देश, धर्म और समाज विरोधी कार्य करते हुए जरा भी नहीं हिचकतीं..!!


दोस्तों, सबसे पहले आप लोगों से एक खबर शेयर करना चाहूँगा, उसके बाद ही बात आगे बढ़ सकेगी..।
आज एक खबर पढ़ी... आप भी पढ़िए...खबर का शीर्षक था
केरल में लड़कियों को बना रहे जिहादी, हाईकोर्ट के सामने आए मामले के बाद पुलिस समेत सब सकते में
तिरुअंनतपुरम। केरल में जिहादी संगठन के कार्यकर्ता कॉलेज में पढ़ने वाली युवतियों को प्रेमजाल में फँसाकर उन्हें अपने आतंकी संगठनों से जोड़ रहे हैं। इसकी सूचना मिलने के बाद पुलिस ने जाँच के लिए स्पेशल टीम बनाई है।
यूँ आया मामला सामने
खुफिया सूत्रों के कान तब खड़े हो गए जब एमबीए में पढ़ने वाली दो लड़कियों के पिता ने केरल हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की। दोनों ही लड़कियाँ पतनमथिट्टा जिले के सेंट जॉन कॉलेज हॉस्टल में रहती थीं। यहीं इनकी मुलाकात एक कॉलेज सीनियर मुस्लिम युवक से हुई। इनमें आपस में नजदीकियाँ बढ़ गईं लेकिन लड़के को अनुशासनहीनता के आरोप में कुछ साल पहले कॉलेज से निकाल दिया गया था।
इस बारे में कॉलेज के प्राचार्य श्रीकुमारन नायर ने बताया कि सस्पेंड होने के बावजूद वह दोनों लड़कियों समेत चार जूनियर लड़कियों के संपर्क में रहा और सबसे प्यार का नाटक करता रहा। इसके बाद वह इनमें से दो लड़कियों को अपने आतंकी संगठन में शामिल करने में सफल रहा। अब अपनी बेटियों की कोई खबर ना पाकर परिजनों ने केरल हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर दी। इसके बाद दोनों लड़कियों को कोर्ट में पेश किया गया। जब लड़कियाँ कोर्ट में पेश हुईं तो उन्होंने जो कहानियाँ बयाँ की वह पुलिस और प्रशासन को हिला देने के लिए काफी था। उन्हें इस दौरान लड़के ने जिहादी वीडियो दिखाया और अपने आतंकी काम में शामिल कर लिया। पूरे घटनाक्रम के चिंतित हाईकोर्ट ने पुलिस को जाँच का आदेश दिया है।
( दोस्तों, ये दोनों लड़कियाँ ईसाई थीं। उल्लेखनीय है कि दुनिया में इस समय अमेरिका और एलाइज जो युद्ध अफगानिस्तान और इराक में लड़ रहे हैं उस युद्ध को ईसाई बनाम इस्लाम के रूप में ही देखा जा रहा है)

... अब जरा एक दूसरी खबर के ऊपर भी नजर डालिए...

अभी कुछ दिन पहले मध्यप्रदेश के सभी अखबारों में एक खबर छपी। वह यह कि डबरा से एक नाबालिग लड़की (उम्र 17 साल) अपने घर से भाग गई है। वह एक संपन्न जैन परिवार से थी और अपने साथ साढ़े नौ किलो सोना (कीमत लगभग एक करोड़ रुपए) और एक लाख रुपए नकद भी लेकर भागी थी। इसे एक जावेद नामक युवक भगाकर ले गया था जिसके कंप्यूटर सेंटर पर यह पढ़ने जाया करती थी। चूँकी लड़की का परिवार संपन्न और रसूख वाला था इसलिए शिवपुरी और ग्वालियर पुलिस ने तगड़ी घेराबंदी की और ट्रेन चलने के थोड़ी ही देर बाद लड़के को उक्त घेराबंदी की खबर लगी और वह लड़की को ट्रेन में छोड़कर ही भाग गया। भोपाल में लड़की महिला आयोग के समक्ष इस्माइल कुरैशी नामक एक वकील के साथ पेश हुई(यानी उस वाहियात लड़के की पूरी तैयारी थी लड़की के साथ तुरत-फुरत शादी करने की और वकील इसलिए ही तैनात करवाया गया था, क्या पता ये लड़का भी इस लड़की को एक करोड़ रुपए के साथ-साथ किसी गैर कानूनी काम में इस्तेमाल करता। बहरहाल, लड़की ने आयोग में बताया कि उसके घरवाले उसे बहुत मारते हैं जिस वजह से उसे जान का खतरा है और वह प्रेमी के साथ भाग गई है। इसके बाद भोपाल पहुँची ग्वालियर पुलिस ने आयोग के समक्ष पूरा मामला खोला और लड़की की कीमती कपड़ों में खिंचावाई गईं कई फोटो पेश कीं और बताया कि लड़की जो चाहती थी उसे घर से वो मिलता था और यह पट्टी लड़के द्वारा पढ़ाई हुई है। इसके बाद महिला आयोग की शीर्ष सदस्यों ने लड़की की कई चरणों में सफल काउंसलिंग की और लड़की को समझाया कि जो प्रेम करता है वो ना घर छुड़वाता है, ना चोरी करवाता है और ना बीच में छोड़कर भागता है। कुल मिलाकर लड़की को वापस उसके अभिभावकों को सौंप दिया गया क्योंकि वो नाबालिग थी और सोना फिलहाल पुलिस की गिरफ्त में ही है। लड़की के पिता स्वर्ण आभूषणों का काम करते हैं और काफी संपन्न हैं।
(उल्लेखनीय है कि लड़की जैन परिवार से थी जो किसी और धर्म को तो छोड़िए हिन्दूओं तक से अपनी लड़कियों की शादियाँ नहीं करते और सिर्फ जैन परिवार में ही कन्याएँ ब्याही जाती हैं)
इसके अलावा कुछ दिन पहले कुछ इलेक्ट्रॉनिक न्यूज चैनलों ने कुछ आतंकी मुस्लिम युवकों के बारे में एक रिपोर्ट प्रस्तुत की थी जिसमें बताया गया था कि उन्होंने सोशल नेटवर्किंग साइट आरकुट का सराहा लेकर कुछ युवतियों (जाहिर है हिन्दू) को अपने फर्जी हिन्दू नाम रखकर फँसाया था और उनको भी अपनी जिहादी गतिविधियों में शामिल करने की कोशिश की थी जिसमें कुछ मामलों में वे सफल भी हो गए थे।

दोस्तों, यहाँ से मैं अपनी बात शुरू करता हूँ..........चूँकी उक्त सभी घटनाएँ पिछले कुछ दिनों में ही हुई हैं इसलिए इनपर बात की जा सकती है। सबसे अहम यह कि क्या हम अभी तक अपने घर की लड़कियों को ये संस्कार नहीं दे पाएँ हैं कि प्यार क्या होता है, उसे कैसे ढूँढा जाए और किस पर यकीन किया जाए और किस पर नहीं.....और यह भी कि कौन से धर्म के लोगों को कौन से धर्म के लोगों से प्यार करना सीखना चाहिए क्योंकि शादी ब्याह सिर्फ रिश्ता बनाने के लिए या सिर्फ दिल-विल का खेल नहीं बल्कि पूरे समाज निर्माण के लिए होते हैं। ये कौन सी आग है जो ये लड़कियाँ इतने विपरित कदम उठा लेती हैं, बिना ये सोचे कि इससे हमारे अभिभावकों की समाज में इज्जत खत्म हो जाएगी, उनकी नाक कट जाएगी, उनका जीना मुहाल हो जाएगा। जिसने पाल-पोसकर इतना बड़ा किया उनके खिलाफ ये कैसी बयानबाजी, वो भी एक ऐसे लड़के के कहने पर जो सिर्फ अपना उल्लू सीधा करना चाहता है। नहीं तो कौन सा प्रेमी अपनी प्रेमिका को एक करोड़ रुपए का सोना लेकर भागने की सलाह देता। वाकई बड़ी हिम्मत का काम है, उन्हें पता है ना कि इस देश में कुछ नहीं बिगड़ने वाला। यही पाकिस्तान होता तो उसे वहाँ पचास टुकड़ों में काटकर फैंक दिया जा। गैरत के नाम पर पाकिस्तान में कत्ल को जायज माना जाता है और उसकी सजा नाममात्र की है, सिर्फ दो वर्ष....। अरब में तो ऐसे लड़के-लड़की की सजा क्या होती है ये आप और हम लोग बचपन से ही जानते हैं।

पहले वाली खबर में एक लड़के के चक्कर में चार-पाँच लड़कियाँ फँसी हुई थीं। अरे, ऐसी भी क्या दीवानगी, क्या इस देश में शरीफ लड़कों की कमी हो गई है जो आतंकवादी को चुना। ऐसा कैसा प्रेम जो तुम्हें भी डुबा रहा है, देश भी डुबा रहा है और धर्म भी डुबा रहा है। क्या उन्हें नहीं पता कि इस्लाम में महिलाओं के साथ कैसा सुलूक होता है? उक्त दोनों ही मामलों में ईसाई और हिन्दू (जैन) लड़कियों के उदाहरण हैं। सिर्फ यदूही नहीं हैं। जबकि इस्लाम में ईसाई, हिन्दू और यहूदी तीनों को ही दुश्मन माना जा रहा है। तो फिर क्या कारण है कि भगाने के लिए सिर्फ विपरीत धर्म की लड़कियों को ही निशाना बनाया जा रहा है। इसपर चर्चा करने की जरूरत नहीं है। मुझे लगता है हम सबको यह बात पता है। जैसा कि कश्मीर में हुआ जहाँ कश्मीरी पंडितों (पुरुषों) को तो चुन-चुनकर मारा गया जबकि उनकी लड़कियों को भगाया गया, उनके साथ बलात्कार किया गया, उनसे शादियाँ की गईं और अपने धर्म में मिलाया गया ताकि वे उनकी वंशवद्धि और धर्मवृद्धि के काम आएँ। ऐसा भी नहीं है कि ऐसा सिर्फ भारत में ही हो रहा है। पूरे विश्व में ऐसा चल रहा है। इसकी बानगी तो लेख में लिखी जा सकती है लेकिन सबकुछ नहीं लिखा जा सकता इसलिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें। बहुसंस्कृति की कीमत चुकातीं ब्रिटिश महिलाएँ
और हाँ भारत की लड़कियों को तो यह जरूर पढ़ना चाहिए।

आपका ही सचिन...।

August 26, 2009

जिन्ना की विरासत है आतंकवाद

जी. पार्थसारथी
3 नवंबर 2000 को जमात-उद-दावा (पूर्व में लश्कर-ए-तोइबा) के मुख्यालय पर एकत्रित हजारों जेहादियों की भीड़ के सामने गरजते हुए आमिर-ए-लश्कर हाफिज मोहम्मद सईद ने कहा था, 'जिहाद सिर्फ कश्मीर तक सीमित नहीं है। पन्द्रह साल पहले अगर कोई सोवियत संघ के टुकड़े होने की बात कहता था तो लोग उस पर हँसते थे। इंशाअल्लाह, आज मैं भारत के टूटने की घोषणा करता हूँ। हम तब तक चैन नहीं लेंगे, जब तक की सारा हिन्दुस्तान पाकिस्तान में समा नहीं जाता।'

पिछले दो दशकों से सईद खुलेआम जंग की ऐसी घोषणा कर रहा है कि जैसे उसके जरिए सारे भारत को लील जाएगा। मुंबई में हुए 26/11 के हमले तक किसी ने उसे गंभीरता से नहीं लिया था लेकिन भारत को तोड़ने की हाफिज की मुहिम नौ साल से जारी है। नवंबर 2000 में दिए इस भाषण के तुरंत बाद सईद ने देश के दिल में स्थित ऐतिहासिक लालकिले पर हमला करने के लिए अपने मुजाहिदीन भेजे, तारीख थी 22 दिसंबर 2000। इस हमले के बाद इस्लामी पार्टियों के राजनेताओं के सामने सईद ने छाती ठोक कर कहा कि उसने दिल्ली के लालकिले पर इस्लाम का हरा झंडा फहरा दिया है।

हाफिज मोहम्मद सईद न कभी एक साधारण आदमी था, न अब है। उसे पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की सरपरस्ती भी हासिल थी।

गौरतलब है कि 1998 में पंजाब के गवर्नर शाहिद हमीद और सूचना मंत्री मुशाहिद हुसैन सैयद को खुद हाफिज से बात करने और आभार जताने के लिए भेजा था। क्यों न हो? आखिरकार सईद द्वारा पाले-पोसे वहाबी/ सलाफी इस्लामी स्कूल को नवाज शरीफ के वालिद मियाँ मोहम्मद शरीफ का संरक्षण (तबलीगी जमात के जरिए) हासिल था। इसके अलावा जमीनी स्तर पर लश्कर का करीबी रिश्ता पाकिस्तानी आर्मी तथा आईएसआई के साथ भी है, जो कि चरमपंथी गुटों को हथियार, प्रशिक्षण और सैन्य सहायता देते हैं, किंतु भारत के टुकड़े करने संबंधी सईद के बयान क्या सिर्फ उसकी अपनी सोच है या उसके इस वक्तव्य में पाकिस्तान और विशेषकर पाकिस्तानी सेना की व्यापक रणनीति उजागर होती है? उस रणनीति से पाकिस्तान के हुक्मरान भी नावाकिफ या अलग नहीं हो सकते। चाहे वे फौजी शासक हों या वोट से चुनकर आए प्रतिनिधि हों।

पाकिस्तान का विचार सबसे पहले चौधरी रहमत अली ने 1933 में प्रकट किया था जिसने आकार ग्रहण किया 1944 में मुस्लिम लीग के लाहौर प्रस्ताव में। पाकिस्तान बनने के बाद वहाँ एक आम मान्यता रही थी कि भारत एक कमजोर देश होगा क्योंकि हैदराबाद में निजाम का राज है और द्रविड़ लोग अपना अलग द्रविड़िस्तान बना लेंगे।

अलगाववाद को प्रोत्साहन देते हुए मोहम्मद अली जिन्ना सवर्ण हिन्दुओं के प्रति तिरस्कारपूर्वक बोलते थे। वे इस बात पर जोर देते थे कि दक्षिण भारत के लोगों की भाषा, संस्कृति, रीति-रिवाज और पहचान अलग-अलग है और उनकी पहचान शेष भारत से भिन्न है।

दूसरी ओर महात्मा गाँधी ने बाबा साहेब आम्बेडकर जैसे नेताओं के साथ मिलकर दलितों के प्रति सदियों से हो रहे अन्याय व शोषण के खिलाफ आवाज उठाई, तब भी जिन्ना ने दलितों को अलग करने की ओछी कोशिश की।

उन्होंने तो जोधपुर एवं त्रावणकोर-कोचिन जैसी रियासतों को भी अपने आपको स्वतंत्र घोषित करने के लिए उकसाया था। उनका लक्ष्य स्पष्ट था- भारत के छोटे-छोटे टुकड़े कर दो ताकि उपमहाद्वीप में मुस्लिम राज्य का दबदबा रहे। 1946 के कैबिनेट मिशन प्लान के अनुसार जिन्ना की सोच यह थी कि दस साल के भीतर पश्चिम से संयुक्त पंजाब व सिंध तथा पूर्व से बंगाल व असम कमजोर भारत से टूटकर अलग हो जाएँगे।

अँगरेजों के साथ जिन्ना का भी मानना था कि भारत के केन्द्र में एक कमजोर सरकार है जो देश के विभिन्न हिस्सों को मजबूती से थामे रखने में अक्षम है। इस तरह जिन्ना का लक्ष्य, भारत के प्रति, हाफिज मोहम्मद सईद के इरादों से कुछ अलग नहीं था। हालाँकि जिन्ना वस्तुतः अनीश्वरवादी इस्माइली थे जबकि सईद वहाबी मंसूबों का पक्षधर है।

लियाकत अली खान से लेकर जनरल परवेज मुशर्रफ तक जिन्ना के वारिसों ने भारत से अपने रिश्तों को इसी सोच के आधार पर बनाए रखा कि भारत एक कमजोर देश है। 1965 में फील्ड मार्शल अयूब खान ने यही सोचकर भारत पर हमला किया कि प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री एक कमजोर नेता हैं जो कि गंभीर अलगाववाद से जूझ रहे हैं। ये समस्याएँ थीं पंजाब में पंजाबी सूबा आंदोलन, द्रविड़ पार्टियों द्वारा दक्षिण में हिन्दी विरोधी दंगे तथा उत्तर-पूर्व में लगातार चलती दिक्कतें, लेकिन हिन्दुस्तानियों की एकता के सामने पाकिस्तान को मुँह की खानी पड़ी।

जनरल जिया-उल-हक ने भारत में अलगाववाद को भड़काने के लिए एक विस्तृत नेटवर्क बनाया और पंजाब में हिन्दू-सिख विभाजन का षड्यंत्र रचा। यह साजिश नाकाम सिद्ध हुई क्योंकि हिन्दू और सिख दोनों ही पाकिस्तान की मंशा को समय रहते ताड़ गए थे। लेकिन जम्मू- कश्मीर में पाकिस्तानी आईएसआई की कोशिशें जारी हैं।

इसलिए यह बात हैरान करती है जब कोई भारतीय जिन्ना के दिलो-दिमाग के गुणों की स्तुति करता है। सिर्फ इसलिए कि वे कभी धर्मनिरपेक्ष हुआ करते थे। लेकिन उन्हें इस इल्जाम से बरी नहीं किया जा सकता कि मजहबी आधार पर देश के बँटवारे और कत्लेआम के लिए जिन्ना की जिम्मेदारी बनती है।

पूर्व राजनयिक नरेन्द्रसिंह सरिला ने बहुत सतर्कतापूर्वक एक किताब लिखी है- 'द शैडो ऑफ द ग्रेट गेम-द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ पार्टीशन' जिसमें उन्हें खुलासा किया है कि मई 1946 में कैबिनेट मिशन के भारत आने से पहले, एक के बाद एक आए ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो तथा लॉर्ड वेवैल पहले ही फैसला कर चुके थे कि भारत का बँटवारा करके उत्तर-पश्चिम में एक मुस्लिम राष्ट्र की स्थापना की जाए। सीमाएँ ईरान, अफगानिस्तान तथा चीन के सिंकियांग सूबे से लगती हों। यह इसलिए था कि फारस की खाड़ी में मौजूद तेल के खजाने पर ब्रिटिश हित सुरक्षित किए जा सकें।

मोहम्मद अली जिन्ना ने 1939 में अँगरेजों के इस उद्देश्य को आगे बढ़ाने का काम किया। पाकिस्तान के रूप में उन्होंने एक ऐसे राष्ट्र की स्थापना की जो अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का केन्द्र बन गया है। पाकिस्तान अब एक ऐसा देश है जिस पर सामंतवादी फौज का राज चलता है और जो हाफिज मोहम्मद सईद और मौलाना मसूद अजहर को पाल-पोस रहा है। अंततः समस्त विश्लेषण का लब्बोलुआब यही निकलता है कि ये कायदे आजम जिन्ना की विरासत है जो वे दुनिया और इस उपमहाद्वीप को देकर गए हैं, जिसमें हम सभी रहते हैं।

(लेखक पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त रहे हैं) (साभारः वैबदुनिया)