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October 01, 2009

खोखला चीन..!!


शक्ति प्रदर्शन से रौब जमाना चाहता है मानसिक रूप से दिवालिया चीन

दोस्तों, आज का दिन (1 अक्टूबर 2009, गुरूवार ) चीन का था। उससे संबंधित कई खबरें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर थीं। उसने आज अपनी स्थापना (माओ के नए चीन या कहें साम्यवादी शासन) के 60 वर्ष जो पूरे कर लिए थे। उसने आज बीजिंग की विख्यात (बदनाम) थ्येनआनमन चौक पर पुख्ता प्रबंध कर रखे थे। वहाँ आस-पास रहने वाले लोगों को घरों में बंद कर दिया गया था, उन्हें शुक्रवार को ही बाहर निकलने की इजाजत थी। चीनी सरकार ने कई एंगलों पर कैमरे फिट करवाए थे और इस परेड की विभिन्न कोणों से शूटिंग हो रही थी जो पूरे संसार में दिखाई जाने वाली थी। चीन ने इस परेड के लिए अपने सैनिकों को विशेष आदेश दे रखे थे जिनमें वे 40 सेकेण्ड में सिर्फ एक बार अपनी पलकें झपका सकते थे। बीजींग ओलंपिक की तर्ज पर इन इंतजामों को भव्यतम बनाने के लिए प्रयास किए गए थे जिससे पूरी दुनिया चीन का लोहा माने, अमेरिका उससे चमके और भारत खौफ खाए। चीन ने इस अवसर पर 52 अत्याधुनिक हथियारों का प्रदर्शन भी किया जो उसी के देश में निर्मित हैं। इनमें कई लड़ाकू विमान भी शामिल थे जिन्हें चीन ने खुद ही विकसित किया है।

चीन ने इतना ही नहीं किया, उसने आज के इस विशेष दिन एक और कमाल कर दिया। उसने बता दिया कि वो कश्मीरियों को भारतीय नहीं मानता है। ताजा मामला वीजा से जुड़ा है, जिसमें चीनी दूतावास द्वारा कश्मीरियों के लिए अलग आवेदन प्रक्रिया अपनाने की बात सामने आई है। समाचार चैनल एनडीटीवी इंडिया की मानें तो चीनी दूतावास में वीजा के लिए कश्मीरियों से अलग से आवेदन पत्र लिए जा रहे हैं। उन्हें दूतावास में पासपोर्ट पर स्टाम्प लगाने को भी कहा गया है। वीजा का आवंटन दूसरे पेपर किया जा रहा है। भारत सरकार ने इस पूरे मामले पर कड़ी आपत्ति जताई है। उसका कहना है कि चीन द्वारा जारी ऐसे किसी भी वीजा को वैधानिक नहीं माना जाएगा। सरकार ने इस संबंध में सारे एयरपोर्ट को अलर्ट कर दिया है, ताकि किसी भी प्रकार की गैरकानूनी गतिविधि को रोका जा सके।

हालांकि भारत की कड़ी आपत्ति मुझे कोरी बात ही लगती है क्योंकि चीन के 60वें राष्ट्रीय दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह ने चीन सरकार और वहां की जनता को बधाई देते हुए आज एक बार फिर दोहराया कि भारत अपने इस मित्र पडोसी देश के साथ अपने संबंधों को और बढाने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। डॉ. सिंह ने चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ को भेजे एक बधाई संदेश में कह दिया कि पिछले चार वर्षो में शांति और समृद्धि के लिए दोनों देशों के बीच सामरिक और सहयोग की साझेदारी बनी है और वैश्विक तथा अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दो पर दोनों देशो के बीच सहयोग और समन्वय भी हुआ है। उन्होंने कहा- “हमारे बीच संबंधों को और मजबूत बनाने के लिए भारत पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। “चीन के लोगों के लिए यह महत्वपूर्ण मौका है। पिछले 60 वर्षों में आपके इस महान देश ने कई उपलब्धियां हासिल की है। अच्छे पडोसी और विकासशील देश होने के नाते भारत में हम इस महत्वपूर्ण मौके पर आपके खुशी के पलों को बांट रहे है।”
अब हमारे प्रधानमंत्री के यह हाल हैं कि वो आँखें दिखा रहा है और हम गिड़गिड़ा रहे हैं जबकि हम जानते हैं कि शक्ति प्रदर्शन और एग्रेशन से ही शक्ति संतुलन बनता है नहीं तो पिछले 1000 सालों में हमने देख लिया है कि सज्जन और सहृदय बनने से क्या होता है..!!!!

दोस्तों, मैंने आज दरअसल अपनी पोस्ट का हैडिंग कुछ अलग रखा था। मैंने चीन को खोखला यूँ ही नहीं कहा। चीन के इतिहास में झाँकें तो हम कुछ ये बातें पाएँगे...

- जो लोग चीन को अच्छी तरह से जानते हैं उनके अनुसार चीन ने भले ही विकास किया हो, परंतु अब भी वहाँ पर लोकतंत्र नहीं है। लोगों पर आदेश थोपे जाते हैं।
- 1949 से 79 तक चीन में माओवाद छाया रहा। इस दौरान चीन ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी राजनीतिक पहचान बनाई और अमेरिका व नाटो से दोस्ती बढ़ाकर रूस का विरोध किया।
- माओ ने अपने समय केवल सांस्कृतिक क्रांति के नाम पर अरबों रुपए खर्च कर दिए थे। 1979 में स्थिति यह थी कि एक-तिहाई चीन अनपढ़ था तथा गरीबी बहुत थी। 1959-62 में पड़े सूखे से लाखों लोग मारे गए तथा उसमें माओ सरकार ने कितना पैसा खर्च किया इसका कोई हिसाब ही नहीं था।
- माओ के समय बेरोजगारी चरम पर थी तथा अर्थव्यवस्था ग्रामीण आधारित ही थी।
- चीन में टेक्नोलॉजी के बारे में मदद ताईवान द्वारा की गई। ताईवान ने चीन को कई प्रकार की विश्व टेक्नोलॉजियों से अवगत करवाया।
- 1979 से अब तक डेंग जियाओपिंग ने समाजवाद के चीनी तरीके को अपनाया तथा कानून व्यवस्था से लेकर आर्थिक सुधार कानून लागू किए।
- चीन के ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार की अनुमति के बाद किसान अपने लिए फसल का कुछ हिस्सा रखने लगे।
- शहरी क्षेत्रों में 'स्पेशल इकोनॉमिक जोन" बनाए गए जहाँ सस्ते मजदूर उपलब्ध थे और पर्यावरण की चिंता करने जैसी कोई बात नहीं थी। साथ ही टेक्स हॉलिडे भी दिए गए।
- चीन में पर्यावरण की अनदेखी की गई तथा वहाँ पर ऐसी टेक्नोलॉजी से उत्पादन किया गया जो कि विश्व में कही पर भी उपयोग नहीं की जाती थी। इससे प्रदूषण काफी फैला। आज भी चीन में जंगल साफ हैं और वन्यजीवों के नाम पर कुछ नहीं है। चीनी सबकुछ खा गए। मारकर और पकाकर। वहाँ से बाघों का सफाया कर दिया गया और अब चीनी लोग भारत के बाघों को मरवा रहे हैं। यहाँ के मरे हुए बाघ वहीं जाकर बेचे जाते हैं। वहाँ उनकी हड्डियों और अन्य अंगों को यौन उत्तेजक दवाइयों के रूप में काम में लिया जाता है।
- आज चीन भारत से 2.5 गुना ज्यादा तथा जापान से 7 गुना ज्यादा ऊर्जा का उपभोग कर रहा है।
- चीन की गिनती विश्व के सबसे प्रदूषित देशों में होती है। क्योंकि वहाँ पेड़ नहीं है, बहुत बड़ा रेगिस्तान है और पर्यावरण संरक्षण की चिंता ना के बराबर है।
- एक अनुमान के मुताबिक चीन को प्रदूषण के कारण अब तक 60 बिलियन डॉलर्स का नुकसान हो चुका है।
- सामाजिक और आर्थिक दोनों स्तरों पर चीन के ग्रामीण व शहरी क्षेत्र में काफी अंतर है। वहाँ ग्रामों में व्यवस्था बहुत खराब है। सब गाँव आबादी की समस्या से जूझ रहे हैं और महानगरों में भी स्लम एरिया बहुत हैं। इन्हीं सबको छुपाने के लिए चीन ने ओलंपिक और स्थापना दिवस पर विशेष इंतजाम किए थे।
- चीन में सामाजिक पतन काफी तेजी से हो रहा है और लाखों की संख्या में परिवारों में विघटन देखने में आ रहा है। यह सब पश्चिम के प्रभाव से हो रहा है क्योंकि समाज का मॉर्डनाइजेशन बहुत तेजी से बढ़ा है।


कुल मिलाकर चीन ऊपर से खूबसूरत लेकिन अंदर से बदसूरत है। इस देश से संसार में चिढ़ने वाले देशों की संख्या भी बहुत अधिक है क्योंकि पीठ में खंजर घोंपने का इसका इतिहास काफी पुराना है। ताइवान की मदद का सिला भी इसने इसी प्रकार दिया कि उस पूरे देश पर ही अपना अधिकार जताने लगा। आज चीन के बने नकली और सस्ते सामान पर ज्यादातर देश प्रतिबंध लगा रहे हैं और सिर्फ इस्लामी देश ही चीन के साथ मित्रता निभा रहे हैं क्योंकि यूएई और सऊदी अरब के ज्यादातर बड़े कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट्स जो अरबों डॉलर के हैं, सिर्फ चीन को दिए जा रहे हैं। पहले ये अमेरिका और योरपीय देशों को दिए जाते थे लेकिन विश्व के धर्म के आधार (मुस्लिम, ईसाई, यहूदी) पर बँटने के बाद इसका सीधा फायदा चीन को मिला है। अब चीन अपना शक्ति प्रदर्शन कर रहा है। अपने लोगों की जबरन आँखें खुली रख रहा है, उन्हें पलकें नहीं झपकाने दे रहा है। लेकिन अब चीन को समझना चाहिए कि वो बंधन में अपने समाज को कब तक बाँधकर रखेगा। कब तक खूबसूरत चेहरों को संसार के सामने लाता रहेगा (वो बीजिंग ओलंपिक वाली घटना याद है आपको जिसमें उदघाटन अवसर पर एक खूबसूरत लड़की को गाना गाते दिखाया गया था जबकि आवाज एक दूसरी लड़की की थी जो दिखने में उतनी सुंदर नहीं थी इसलिए चीन ने उसे पार्श्व में रखा था, बाद में ये मामला खुला था)। चीन को अब अपने नागरिकों को सुपरपॉवर वाले दिग्भ्रम से बाहर निकालना चाहिए क्योंकि वो आजादी चाहते हैं, जो हर समाज का सपना होता है। चीन को मानवाधिकारों के लिए कुछ करना चाहिए क्योंकि वहाँ की जनता का दम घुट रहा है। इस जनता में चीन, हांगकांग और तिब्बत की जनता शामिल है ।जिस दिन वहाँ इन अर्थों में आजादी होगी उसी दिन यह माना जाएगा कि वाकई चीन सुपरपॉवर बन गया है क्योंकि वहाँ की जनता तब अपने को स्वतंत्र मान सकेगी, और वो स्वतंत्रता जबरदस्ती की नहीं होगी।
(नोटः यहाँ जब भी चीन का उल्लेख किया गया है वह वहाँ की सरकार के संदर्भ में माना जाए क्योंकि किसी देश की एकमुश्त जनता कभी खराब हो ही नहीं सकती, वो तो सरकार की नीतियाँ ही होती हैं जो उस देश की छवि को बनाती और बिगाड़ती हैं)

आपका ही सचिन....।

September 07, 2009

हमारे दुश्मनों के हाथों में हथियार पहुँचाता अमेरिका!

ओबामा प्रशासन से अब अमेरिकी-यूरोपीय ही असंतुष्ट

आज जब चीन हमारी सीमा में डेढ़ किलोमीटर अंदर तक घुस आया और वहाँ हमारी चट्टानों को लाल रंग से रंग गया, इसके साथ ही हमारे इलाके में कई जगह कैंटोनी भाषा में चीन शब्द लिख गया, तो ऐसे में हमें उसकी मंशा समझनी चाहिए क्योंकि चीन के साथ युद्ध के बाद से इस प्रकार की घटना पहली बार ही हुई है। यह इलाका हिमाचल से लगी चीनी सीमा में 22420 फीट की ऊँचाई पर है जहाँ चीन ने यह दुस्साहसी कार्रवाई की। माउंट ग्या के उस इलाके को फेयर प्रिसेंस आफ स्नो (बर्फ की गोरी राजकुमारी) भी कहा जाता है। यह घटना हाल ही में हुई है तथा खबरों में तो आज ही आई है। भारतीय सेना फिर से इस मामले में कुछ भी कहने से बच रही है क्योंकि हमारे तीन जनरल फिलहाल चीन की यात्रा पर हैं। भारतीय सेना का कहना है कि हम मामले को बातचीत से सुलझाएँगे, अब ये तो हमें भी नहीं पता कि ये बातचीत कब तक चलेगी..??
....लेकिन दोस्तों, यहाँ आज मेरा विषय चीन नहीं है। क्योंकि चीन पर पिछले कुछ दिनों में मैंने काफी कुछ लिखा है और आपने उसे पढ़ा और सराहा भी है इसलिए आज दूसरा एंगल..। ये एंगल अमेरिका, अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और कुछ मुस्लिम राष्ट्रों के इर्द-गिर्द घूमता है...फिलहाल तो मैं आपको कुछ खबरें पढ़वाऊँगा...फिर थोड़ी सी बात होगी, इन लिंक्स पर खबरें पढ़ने के बाद ही अपनी आगे की बात हो पाएगी...तो पढ़े..

हथियार बेचने में अव्वल रहा अमेरिका
दाल बना लेता हूं,लेकिन क्रिकेट नहीं आता: ओबामा
Obama's remarks at White House iftar

दोस्तों, मुझे लगता है कि आपने तीनों खबरें पढ़ ली होंगी। संभवतः पहले भी पढ़ी होंगी लेकिन इन तीनों के बीच की कहानी या कहें लिंक बड़ी मजेदार हैं। मेरे एक परिचित (वे पाकिस्तान के हैं) ने कुछ दिन पहले बताया था आज से 9 महीने पहले ओबामा के अमेरिकी राष्ट्रपति के तौर पर शपथ लेने को वहाँ जश्न के तौर पर मनाया गया था। वहाँ के अखबारों की लीड हैडलाइन थी कि बराक हुसैन ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति बने। एक मुसलमान अमेरिका का राष्ट्रपति बना। अखबारों ने वहाँ के कुछ मौलवियों के हवाले से खबरें भी छापीं कि अगले कुछ सालों में एक प्योर मुसलमान अमेरिका का राष्ट्रपति होगा क्योंकि ओबामा तो हाइब्रिड हैं।

मित्रों, इन खबरों में से पहली तो वही है जिसका मैंने पूर्व में अपनी एक पोस्ट में उल्लेख किया था कि अमेरिका हथियारों का संसार में सबसे बड़ा विक्रेता है और यह खबर यही बताती है कि उसका वैश्विक हथियार बाजार के 68 प्रतिशत पर कब्जा है। लेकिन खबर साथ ही यह भी बताती है कि विकासशील देशों में संयुक्त अरब अमीरात हथियार खरीदने वाले देशों में पहले स्थान पर है जिसने पिछले साल नौ अरब 70 करोड़ डॉलर के हथियार खरीद थे। दूसरे स्थान पर सउदी अरब ने आठ अरब 70 करोड़ डॉलर के हथियार खरीदे तो पांच अरब 40 करोड़ डॉलर के हथियार खरीद करके मोरक्को तीसरे स्थान पर रहा। ये तीनों की मुल्क इस्लामी हैं और ये लोग हथियारों का क्या करेंगे ये हमें पता है। हालांकि यूएई और सऊदी अरब ने हथियार खरीदे ये तो समझ आता है क्योंकि वहाँ तेल की खेती होती है और वहाँ पेट्रो डॉलर उग रहे हैं लेकिन भिखमंगे मोरक्को को इतने हथियारों की क्या जरूरत पड़ने वाली है यह समझ नहीं आता है।
दूसरी खबर से भी आप समझ ही गए होंगे कि ओबामा के घनिष्ट पाकिस्तानी मित्र रहे हैं, ओबामा खुद भी पाकिस्तान रहे हैं और ऊर्दू, कीमा, शायरी आदि से उनकी नजदीकियाँ भी रही हैं। तीसरी खबर से यह स्पष्ट है कि वाइट हाउस की उनकी इफ्तार पार्टी का अल-अरेबिया चैनल ने क्या मतलब निकाला है। ओबामा का यह भाषण योरप के कई देशों के लोगों ने अपने ब्लॉग पर चढ़ाया है और ओबामा को गालियाँ दी हैं। कई अमेरिकी लोगों ने भी यह काम किया है। देखिए बानगी.. Celebrating a Great Religion at 1600 Pennsylvania Avenue

यह भी आपको पता ही होगा कि ओबामा की लोकप्रियता अमेरिका में तेजी से कम हुई है और इसका सीधा सा कारण है कि अमेरिकियों को उनसे जितनी आशाएँ थीं पिछले 9 माह के दौरान वे उनमें से ज्यादातर को पूरा नहीं कर पाए हैं। इसके अलावा बुश प्रशासन के कई आलोचक भी अब ओबामा के खिलाफ उतरते हुए यह कह चुके हैं कि इससे बेहतर समय तो बुश के समय था क्योंकि तब अमेरिका अपनी स्वाभाविक नीति पर था जिससे आज वो सरकता हुआ प्रतीत हो रहा है।

दोस्तों, हम जिस ताकतवर चीन के सामने अमेरिका को अपना हितैषी तथा दोस्त मान रहे हैं वो हमारे दुश्मनों (अरब देश जो आतंकवाद के प्रायोजक हैं) को हथियारों से लाद रहा है वो भी सिर्फ अपने निजी हित के कारण...ऐसे में भारत कितनी लंबी रेस का घोड़ा सिद्ध हो पाएगा...??

आपका ही सचिन....।

September 04, 2009

भारत को समेटने के प्रयास में एकजुट दुश्मन

हमें पड़ोसियों की हर चाल पर नजर रखनी होगी


दोस्तों, कुछ दिनों से भारत को लेकर कुछ मनहूस खबरें सामने आ रही हैं। सबसे पहले पता चला कि हमारे दुश्मन नंबर 1 चीन ने भारत के खिलाफ अपनी कूटनीतिक चालें तेज कर दी हैं। फिर पता चला कि पाकिस्तान ने अमेरिका से मिली हारपून मिसाइलों में कुछ छेड़छाड़ कर उन्हें भारत के खिलाफ प्रभावी बनाने के लिए तैयार किया है। बाद में इसी टुच्चे पाकिस्तान की ओर से एक खबर यह भी आई कि वह अपने परमाणु हथियारों का जखीरा बढ़ाने में लगा है। वह अपने परमाणु कार्यक्रम का विस्तार कर रहा है और यह भी कि वह अपने परमाणु हथियारों की तैनाती की तैयारी में भी जुटा हुआ है। साथ ही यह भी कि वह सोमालियाई लुटेरों का भी साथ दे रहा है और हिन्द महासागर में जहाजों को लुटवाने में मदद कर रहा है और हाल ही में इस मामले में 12 पाकिस्तानी नागरिकों को पकड़ा भी गया है। सबसे बड़ा तुर्रा यह कि पकड़े गए जहाजों को छुड़वाने या अपने जहाजों को लूट से बचाने वाली बात कहकर चीन अपने नौसेना बेड़े की हिन्द महासागर में तैनाती कर चुका है और कुल मिलाकर बात भारत को घेरने की है। एक अनुमान के मुताबिक पाकिस्तान के पास 70-80 परमाणु बम हैं जबकि चीन के पास कितने हैं उनकी तो गिनती ही नहीं है और यह सिर्फ उसे ही पता है। उसकी सब बातों की तरह यह भी एक रहस्य ही है। इनमें से ज्यादातर बातों का खुलासा दूर बैठे अमेरिका ने किया है। आखिर हम क्यों मेहनत करें जब अमेरिका खुद ही सबकुछ पता करके हमें बता देता है (!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!)...

दोस्तों, यह खबरें तब आई हैं जब हमारे यहाँ राजनीतिक हल्ला मचा हुआ है। भाजपा में घमासान मचा हुआ है, जसवंत सिंह आडवाणी की पोलें खोले जा रहे हैं और कांग्रेस ने हाल ही में अपना एक प्रभावी मुख्यमंत्री खो दिया है। इससे पहले एक और घमासान मच चुका था। लेकिन यह दूसरे मगर रिलेटेड टॉपिक पर था। भारत के रज्ञा वैज्ञानिक संथानम जी ने यह मुद्दा उछाला था। उनका कहना है कि भारत द्वारा किया गया फ्यूजन बम या कहें हाईड्रोजन बम फुस्स था। इसे इस तरह से भी कह सकते हैं कि वो उतनी शक्ति का नहीं था जितना की दावा किया गया था। भारत को अपनी शक्ति सुनिश्चित करने के लिए और विस्फोट करने चाहिए। उल्लेखनीय है कि फिजन तकनीक से अणु बम (एटम बम) बनाया जाता है जबकि फ्यूजन तकनीक हाईड्रोजन बम में काम आती है। इस खबर से जहाँ भारत में हंगामा मच गया वहीं हमारे दुश्मनों की बाँछें खिल गईं। वो नई तैयारियों में लग गए जबकि हमारे यहाँ सफाई देने का सिलसिला चल पड़ा। संथानम के इस दावे को पूर्व राष्ट्रपति डॉ. कलाम और विख्यात परमाणु वैज्ञानिक डॉ. अनिल काकोड़कर ने तुरंत खारिज किया। लेकिन मीन-मेख निकालने वाले तत्कालीन भाजपा सरकार को घेरे में लेने लगे, बिना ये सोचे कि इससे दुनिया में हमारी क्या छवि प्रस्तुत होगी और ये भी कि हमारे बनाए हुए बमों की ताकत पर फिर कौन विश्वास करेगा और क्योंकर हमसे डरेगा..?? इस बीच हमारे वित्तीय दिमाग के रक्षामंत्री चिदंबरम ने तो यह तक कह दिया कि संथानम के इस दावे की जाँच कराई जाएगी जबकि हमारे प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह बात को संभाला और कहा कि इस बात पर बहस नहीं होनी चाहिए और डॉ. कलाम के बोलने के बाद इस बहस को समाप्त माना जाना चाहिए।

दोस्तों, इस पूरे घटनाक्रम को मैं दुर्भाग्यपूर्ण मानता हूँ लेकिन संथानम की एक बात का मैं समर्थक हूँ। मुझे लगता है कि भारत को और अधिक परमाणु विस्फोट करने चाहिए। उसे अपनी ताकत लगातार बढ़ाते रहना चाहिए और उसे समय-समय पर जाँचते भी रहना चाहिए क्योंकि हम चारों ओर दुश्मनों से घिरे हुए हैं। इस ताकत की कब जरूरत पड़ जाए यह कहा नहीं जा सकता। दूसरे, हमारे चारों ओर अमेरिका भी अपना शिकंजा कस रहा है। ठीक रेटीक्युलेटेड पाइथन (अजगर की संसार का सबसे बड़ी प्रजाति जो 10 मीटर तक लंबी होती है) की तरह। हालांकि फिलहाल हमारे उससे संबंध अच्छे चल रहे हैं लेकिन वो हमारी तरफ सिर्फ दो कारणों से झुका हुआ है। एक तो उसे चीन से खतरा है और दूसरे इस्लामिक आतंकवाद से। ये दोनों ही हमारे आस-पास हैं। पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश जहाँ इस्लामिक आतंकवाद का गढ़ हैं वहीं चीन तो हमारे सिर से ही लगा हुआ है। ऐसे में अमेरिका का हमारे साथ रहना लाजिमी है। लेकिन परमाणु समझौते के बाद हमारे सभी परमाणु रिएक्टर उसकी नजरों में आ जाएँगे और एक बार इन रिएक्टरों का काम शुरू होने के बाद हमारा आगे परमाणु विस्फोट करने का रास्ता मुश्किल भरा या कहें असंभव हो जाएगा। ऐसे में हमें ये कदम तुरंत उठाना होगा।

हालांकि भारत जैसे सघन आबादी वाले देश में मैं परमाणु संयंत्रों को लगाने का विरोधी हूँ। इसके कुछ अपने कारण भी हैं। मैंने हमारे हिन्दी वैब पोर्टल पर इस विषय पर तीन विस्तृत लेख लिखें हैं। आप भी इन्हें पढ़ सकते हैं और इसके बाद अपनी राय भी जाहिर कर सकते हैं। ये रहीं इनकी लिंक्स..।
परमाणु समझौते के पीछे का काला सच
पहले भारत के परमाणु संयंत्र तो सुधरें
परमाणु ऊर्जा से पीछा छुड़ा रहा है अमेरिका

दोस्तों, अमेरिका पाकिस्तानी मंसूबों को भाँपकर उसे जल्दी ही दी जाने वाली 7.5 अरब डॉलर की सहायता को रोक सकता है लेकिन इससे क्या हो जाएगा..?? वो पहले ही पाकिस्तान के पाले में 20 अरब डॉलर की मदद फैंक चुका है और इससे पाक ने दो नए प्लूटोनियम रिएक्टर और उपयोग में आने वाले रासायनिक पदार्थों का निमार्ण शुरू कर दिया है। उसके विनाशक हथियारों का जखीरा उसकी राजधानी इस्लामाबाद के नजदीक ही जमा हो रहा है। वो इन्हें बंकरों में जमा कर रहा है और अमेरिका ने तो इन बंकरों की उपग्रह से ली गई तस्वीरें भी जारी कर दी हैं। इसके अलावा पाक शाहीन-2 का विकास, बैलेस्टिक मिसाइल वाली पनडुब्बी निर्माण, दो नई परमाणुचालित क्रूज मिसाइल और बाबर व राड मिसाइलों के उन्नतीकरण में लगा हुआ है। पाकिस्तान किस कदर दोगला है यह तो हम पिछले 60 सालों से जान-समझ रहे हैं। उसके लिए तैयारी भी कर रहे हैं लेकिन दिन पर दिन वह फिर भी नए उदाहरण पेश करता रहता है। हाल ही उसने अपने 15 मोस्ट वांडेट आतंकियों की सूची तैयार की है। लेकिन इसमें लश्कर-ए-तयैबा का सर्वेसर्वा वो हाफिज सईद शामिल नहीं है जिसने पिछले वर्ष मुंबई पर हमला करवाया था। इसके भी दो कारण हैं। पहला तो यह कि सईद को पाकिस्तान में धर्म गुरू समझा जाता है ना कि आतंकवादी सरगना। दूसरे, सईद ने फिलहाल अमेरिका का कुछ नहीं बिगाडा़ है इसलिए वो लिस्ट से बाहर है क्योंकि इस लिस्ट में वही आतंकी शामिल हैं जो अमेरिका और उसकी फौजों के लिए खतरा बने हुए हैं।

हम इस समय इतिहास के सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं जब हमारे चारों ओर शुत्रओं का जमावड़ा है और जिसमें से दो शत्रु परमाणु शस्त्रों से लैस हैं। भारत और यहाँ की राजनीतिक पार्टियों और अपनी दैनंदिन राजनीति से ऊपर आकर हाल फिलहाल भारत और उसके भविष्य के बारे में सोचना चाहिए क्योंकि हर बार हमें खतरे के प्रति अमेरिका ही आगाह नहीं करेगा......!!!!!!!!!!!!!

आपका ही सचिन....।

September 01, 2009

क्या चीन भारत पर हमला करेगा? (भाग-2)

उसकी तैयारी देखकर तो ऐसा ही लगता है


दोस्तों, मेरी पिछली पोस्ट में आपने चीन से संबंधित भारत की चिंताओं पर मेरे विचार पढ़े थे। पिछली पोस्ट को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें क्या चीन भारत पर हमला करेगा? (भाग-1)


अब बात आगे बढ़ाई जा सकती है...
जैसा कि आप जानते हैं कि सामरिक विशेषज्ञ किसी भी बात को बस यूँ ही नहीं कह देते। बल्कि कहें कि कोई भी विशेषज्ञ या शास्त्री (मसलन अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री, मानवशास्त्री) भी झूठ क्यों बोलेगा। उसका अध्ययन जो इजाजत देगा वही वो भी बोलेगा। तो भरत कपूर के दावे को बस यूँ ही खारिज नहीं किया जा सकता। दूसरी बात, आपने मुंबई हमले के बाद ग्लोबल इंटेलीजेंस एजेंसी स्ट्रेटफोर की वो रिपोर्ट भी पढ़ी होगी जिसमें उसने कहा था कि इस हमले के बाद भारत को अपनी शक्ति दिखानी ही होगी और अपने को साबित करने के लिए भारत पाकिस्तान में कुछ चुनिंदा ठिकानों पर सैन्य कार्रवाई कर सकता है। हालांकि एजेंसी का यह दावा खाली गया क्योंकि हमने कुछ नहीं किया, चुप बैठे रहे और पाकिस्तान को डोजिएर (सुबूतों से भरे सूटकेस) देते रहे जिन्हें वह रद्दी की टोकरी में फैंकता रहा। बाद में सामरिक विशेषज्ञों ने कहा कि पाकिस्तान के पास परमाणु बम था इसलिए भारत चुप बैठा रहा क्योंकि क्षेत्र में परमाणु युद्ध छिड़ सकता था इसलिए शक्तिशाली देशों ने भारत पर हमला ना करने का जबरदस्त दबाव बनाया था। यह बात भारत के एक पूर्व थल सेना प्रमुख ने भी कही थी।

आज ही रूस के एक नामचीन प्रोफेसर ने कहा है कि 2020 तक अमेरिका भी ढह जाएगा। रूस के प्रसिद्ध शिक्षाविद प्रोफेसर आईगोर पानारिन ने यह बात काफी शोध के बात कही है। उन्होंने इसके पीछे का कारण अमेरिका की फिलहाल खस्ताहाल अर्थव्यवस्था और बराक प्रशासन के फेल्योर को बताया है। वैसे इस बात के लिए हर अमेरिकी उन्हें झक्की ही कहेगा लेकिन इतिहास गवाह है कि रूस के टूटने से पहले भी कोई वो सब नहीं सोचता था। इस खबर को आप यहाँ पढ़ सकते हैं 2020 तक ढह जाएगा अमेरिका: रूसी प्रोफेसर
रूस बिखर जाएगा यह सिर्फ कोई अर्थशास्त्री ही सोच सकता था क्योंकि अर्थव्यवस्था चरमराने के कारण ही रूस ने अलग हुए मुस्लिम राष्ट्रों पर से अपना नियंत्रण ढीला किया और उन्हें रूसी संघ में साथ रखने से मना कर दिया। आज उसी बात को लेकर हाफिज सईद जैसे आतंकी संगठनों के सरगना यह कहते फिरते हैं कि भारत को भी रूस की तरह से तोड़ना उनका एकमात्र मकसद है औऱ यह पूरा हो जाएगा क्योंकि रूस के लिए भी लोग असंभव शब्द का इस्तेमाल करते थे लेकिन हमने वो कर दिखाया।
दोस्तों, आप लोग सोच रहे होंगे कि इतनी देर की बात में भी अभी तक चीन का जिक्र क्यों नहीं आया, तो मैं आपको याद दिलाना चाहूँगा कि यह सब बातें एक दूसरे से इंटरलिंक हैं। इस बात को पुख्ता करते हुए चीन के एक सामरिक विशेषज्ञ ने हाल ही में कह दिया था कि भारत को 20-30 टुकड़ों में तोड़ देना चाहिए। तो क्या इस्लामिक आतंकी संगठन, हाफिज सईद जैसे आतंकी सरगना और चीन की टोन (बातचीत का ढंग) एक जैसा नहीं है। दूसरा यह कि अमेरिका के लिए कहा जाता है कि जब भी उसकी अर्थव्यवस्था लड़खड़ाती है वह युद्ध करता है। क्या ऐसा चीन नहीं कर सकता जबकि उसके प्रोडक्ट (जिनकी क्वालिटी बेहद ही खराब होती है) को पूरी दुनिया में बैन किया जा रहा है। चीन और पाकिस्तान की मंशा एक जैसी है। दोनों रूस को अपना दुश्मन मानते थे और उसके टूटने पर दोनों ही खुशियाँ मनाते हैं और उसी उदाहरण को भारत जैसे देश के साथ दोहराने का ख्वाब देखते हैं।

चीन बहुत तेज है। वो अरुणाचल प्रदेश पर इसलिए नजर गड़ाए रहता है क्योंकि वहाँ से भारत के उस हिस्से तक आसानी से पहुँचा जा सकता है जहाँ से नॉर्थ-ईस्ट के सेवन सिस्टर्स कहे जाने वाले राज्य अलग होते हैं। उस हिस्से को चिकन नेक या बॉटल नेक (चूजे या बॉटल की गर्दन) कहा जाता है। वहाँ से वो सातों राज्य शेष भारत से अलग होते हैं। वहाँ से हमला कर वो भारत के सात राज्यों को तो एक ही झटके में अलग कर सकता है जैसे भारत ने पाकिस्तान से अलग बने पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) को 1971 में एक ही झटके से अलग कर दिया था। भारत ने हाल ही में अरुणाचल प्रदेश और तेजपुर (असम) में सुखोई और अपनी टैंक स्क्वेड्रन की तैनाती की है। वो इसी संभावित हमले से निपटने के लिए है। चीन उत्तर पूर्व में हमारी गर्दन दबोचने के प्रयास में है और नक्सलवाद से जूझ रहे उन इलाकों में उसकी मंशा पूरी करने में बांग्लादेश भी उसका साथ दे सकता है। (वो बीएसएफ जवान की डंडे पर लटकी हुई लाश वाली तस्वीर तो याद है ना आपको जो टाइम्स आफ इंडिया में प्रथम पेज पर छपी थी और जिसने हमारे साथ-साथ भारत सरकार की भी नींद उड़ाकर रख दी थी, टुच्चे बांग्लादेशियों के दुस्साहस पर)

दूसरे, मैंने ऊपर कहा था कि अमेरिका जब भी अर्थ संकट में फँसता है तो वह युद्ध करता है। ये इस तरह से समझा जा सकता है कि अमेरिका दुनिया को एक तो यह याद दिलाता रहता है कि तुम लोग भी युद्ध में फँस सकते हो इसलिए तैयार रहो। सनद रहे कि अमेरिका की जीडीपी का सबसे बड़ा हिस्सा उसके हथियार बेचने से आता है। आईटी-वाईटी सब गईं किनारे...। जिस अमेरिकी हारपून मिसाइल की पाकिस्तान को लेकर आजकल चर्चा चल रही है वो एक जरा सी मिसाइल 70 लाख अमेरिकी डॉलर में आती है। ऐसी 165 मिसाइलों की खेप पाकिस्तान ने अमेरिका से खरीदी थीं। ऐसे लाखों उपकरण वो हर वर्ष विकासशील और विकसित देशों को बेच देता है। उसके सबसे बड़े खरीदारों में सऊदी अरब भी शामिल है। कुल मिलाकर अमेरिका दुनिया में हथियारों का सबसे बड़ा सप्लायर है, उसके बाद रूस का और फिर चीन का नंबर आता है। लेकिन चीन बहुत जल्दी रूस को इसमें पीछे छोड़ देगा क्योंकि रूसी हथियारों की अब वो इज्जत नहीं रही जो शीत युद्ध के समय थी। इसलिए चीन अमेरिकी स्टाइल में चलते हुए सभी इस्लामिक देशों को हथियार सप्लाई करता है और युद्ध का महौल बनाए रखता है। जब भी भारत की ओर से चीन के व्यापार के खिलाफ कोई स्टेटमेंट जारी होता है चीन तुरंत सीमा विवाद को हवा देता है और कूटनीतिक सफलता पाते हुए भारत को पीछे हटने पर मजबूर कर देता है।
चीन हमेशा कुछ दूसरी ही बात समझता है। वो सोचता है कि अमेरिका उसे कुछ देशों के बीच कस रहा है जिन्हें वो कैंकड़े का पंजा कहता है। चीन का तर्क है कि जापान, भारत, ताइवान, दक्षिण कोरिया से वह घिरा हुआ है और आस्ट्रेलिया को भी अमेरिका उसके खिलाफ इस्तेमाल करता है। ऐसे में उसका सतर्क रहना जरूरी है जबकि चीन अगर थोड़ी समझदारी दिखाए तो सामरिक विशेषज्ञों के अनुसार अगर भारत, चीन और रूस मिल जाएँ तो अमेरिका का वर्चस्व दुनिया से खत्म कर सकते हैं। लेकिन हमारा स्वाभाविक शत्रु चीन यह बात कभी नहीं समझेगा और वही करेगा जिसे वह सही मानता है।

भारत के पास ज्यादातर हथियार रूस से खरीदे हुए हैं, अब वो अमेरिका और इसराइल के हथियार खरीद रहा है लेकिन चीन खुद ही हथियार बनाता है और उन्हें विकसित कर अन्य देशों को भी बेचता है। यहाँ सनद रहे कि चीन के पास दुनिया की सबसे बड़ी सेना है, हथियारों के मामले में चीन आत्मनिर्भर है और भारत पर भारी पड़ता है। अमेरिकी स्टाइल में वो अपने दुश्मन (फिलहाल नंबर एक पर अमेरिका और दूसरे नंबर पर भारत आता है) को शत्रुओं से घिरा रखना चाहता है लेकिन अमेरिका उससे काफी दूर है इसलिए फिलहाल उसका कांस्ट्रेशन भारत पर ही है। अमेरिका के लिए तो उसने आईसीबीएम (इंटर कॉन्टिनेंटल बैलियास्टिक मिसाइल) बना रखी हैं जो किसी भी महाद्वीप के किसी भी देश को अपना शिकार बना सकती हैं और वे परमाणु हथियार भी ले जा सकती हैं। ऐसी मिसाइलों की मारक क्षमता 5000 से 12000 किलोमीटर तक होती है। भारत भी अग्नि का अगला स्वरूप आईसीबीएम के रूप में ही बना रहा है।

दोस्तों, चाणक्य ने कहा था कि जिस देश की सीमा आपसे मिलती हो वो आपका स्वाभाविक शत्रु होता है। पूरे विश्व में अमेरिका-कनाडा को छोड़ दिया जाए तो सीमा मिले देशों की दोस्ती की कोई मिसाल नहीं मिलती। कोई ज्यादा तीव्र शत्रु है तो कोई कम तीव्र है। लेकिन शत्रु होना तय है। दुर्भाग्य से हम सभी ओर से शत्रुओं से घिरे हुए हैं। प्रकृति ने हमारी रक्षा के लिए हिंद महासागर और अरब सागर को तीन ओर रखा था और एक ओर हिमालय था लेकिन हमारा सबसे शक्तिशाली शत्रु चीन फिलहाल हमें हिमालय पर चढ़कर ही घूर रहा है।

(मित्रों इस विषय पर आगे जो कुछ मेरे हाथ लगेगा मैं उसे निश्चित ही आप लोगों से शेयर करता रहूँगा)

आपका ही सचिन...।

August 31, 2009

क्या चीन भारत पर हमला करेगा? (भाग-1)

बहुत संजीदगी के साथ बढ़ रहा है भारत की ओर


दोस्तों, आज सुबह आप लोगों ने एक खबर पढ़ी होगी। कि चीन के दो हेलीकॉप्टर लद्दाख में भारत की सीमा में घुस आए। पाँच मिनट तक भारतीय सीमा में मंडराते रहे और कुछ खाने के पैकेट गिराकर चले गए। उन पैकेटों में सूअर का जमा हुआ माँस था। पैकेट एक्सपायरी डेट को पार गए थे यानी खाने लायक नहीं थे। वैसे तो यह घटना कोई बहुत बड़ी नहीं मानी जा रही है और तीनों भारतीय सेना की संयुक्त कमान के नए अध्यक्ष थलसेना अध्यक्ष जनरल दीपक कपूर के अनुसार पेट्रोलिंग के दौरान अक्सर ऐसा हो जाता है क्योंकि भारत-चीन के बीच सीमा का निर्धारण नहीं है। इस घटना से मेरे मन में काफी बातें उठीं। मैंने इस बारे में अपने उन कुछ मित्रों से बात की जो सामरिक पृष्ठभूमि के हैं और जो चीन पर काफी शोध कर रहे हैं। उस बातचीत में ऐसे बहुत से मुद्दे निकले जिन्हें मैं यहाँ आपके साथ शेयर करना चाहता हूँ। आप लोगों ने भारत के सामरिक विशेषज्ञ भरत वर्मा का नाम तो सुना ही होगा। उन्होंने कुछ समय पहले घोषणा की थी कि चीन 2012 तक भारत पर हमला कर सकता है। उनके अनुसार यह चीन की कुण्ठा निकालने का भी एक जरिया हो सकता है क्योंकि भारत समेत विश्व के तमाम देश अपने बाजारों में चीनी माल की आवक बंद कर रहे हैं। उन पर बैन लगाया जा रहा है। भरत वर्मा के ये विचार आप यहाँ पढ़ सकते हैं। भारत पर 2012 तक हमला कर सकता है चीन

मित्रों यूँ तो मै चीन का उसके अनुशासन, सैन्य और आर्थिक प्रगति और तेजी से विश्व व्यवस्था में खुद के लिए जगह बनाने का प्रशंसक हूँ। उसने खेलों में भी उल्लेखनीय प्रगति की है और बीजींग ओलंपिक में उसने यह दिखा भी दिया। लेकिन मैं एकमात्र कारण से उससे नफरत करता हूँ और वह यह है कि वह हमारे देश का दुश्मन है और हमारी 90000 वर्ग किलीमीटर भूमि पर उसने अपना अवैध कब्जा जमा रखा है। तो चीन की आगे की प्लानिंग क्या है उसपर मैं बिंदुवार कुछ बातें आपके सामने रख रहा हूँ।

1. आप दुनिया के नक्शे पर भारत की स्थिति देखिए तो पता चलेगा कि हम (भारत) बहुत ही खतरनाक जगह पर पहुँच चुके हैं। हालांकि हम तो अपनी जगह से नहीं हिले हैं लेकिन दुश्मनों ने हमको धीरे-धीरे चारों ओर से घेर लिया है। इतना ही नहीं, वह हमारे घर के अंदर भी पहुँच चुका है। बानगी देखिए...

चीन ने 50 साल पहले शांत और धीर-गंभीर तिब्बत को अचानक हड़प लिया और दुनिया देखती ही रह गई और कुछ नहीं कर पाई। तिब्बत चीन और भारत के बीच रक्षा दीवार था। लेकिन उसको हड़पने के बाद वह सीधे हमारे सिर के ऊपर आ गया। इसके बाद 1962 के भारत-चीन सीमा विवाद (इसे युद्ध समझें) में उसने हमारी 90 हजार वर्ग किमी भूमि हड़प ली। यह युद्ध उसने दो मोर्चों पर लड़ा। एक तो जम्मू कश्मीर, हिमाचल और उत्तरांचल से जुड़ा हिस्सा और दूसरी अरुणाचल वाला हिस्सा। उस युद्ध में हम हारे और चीन ने हमारा एक बड़ा हिस्सा हड़प लिया। कैलाश मानसरोवर जैसा तीर्थ हमारे हाथ से निकल गया और उस दिन के बाद से चीन तवांग और अरुणाचल प्रदेश को भी अपना हिस्सा बताने से नहीं चूकता।
चीन ने इतना करने पर अगला कदम कूटनितिक उठाया। उसने पाकिस्तान को हर संभव मदद मुहैया कराई। उसे भारत के खिलाफ ताकतवर बनाया और इस काम में अपने दूसरे सहयोगी उत्तर कोरिया को भी लगा दिया। पाकिस्तान के पास जितनी भी मिसाइलें और परमाणु हथियार हैं वो सब मेड इन चाइना और मेन इन ईस्ट कोरिया ही हैं। चीन ने पाकिस्तान को साधने के बाद नेपाल में माओवादियों के मार्फत अपनी पकड़ बनाई और संसार के एकमात्र घोषित हिन्दू राष्ट्र को माओवादियों का अड्डा बना दिया। इसके बाद उसने बांग्लादेश की ओर रुख किया और वहाँ खूब संसाधन भिजवाए। आतंकियों को भारत के खिलाफ मदद पहुँचाई। और उसे भारत विरोधी कर दिया जबकि बांग्लादेश को भारत ने ही पाकिस्तान के चंगुल से आजाद करवाया था।
चीन ने मालद्वीप को भी साध रखा है और वहाँ की इस्लामिक सरकार को भारत के खिलाफ इस्तेमाल कर रहा है। वहाँ उसका सैन्य अड्डा भी है और हवाई तथा नौसेना तैनाती भी है।
बर्मा की जुंटा सैन्य सरकार भी चीन की मित्र है क्योंकि दोनों ही राष्ट्र अपने को कम्युनिस्ट कहते हैं। हम सिर्फ अंडमान में इसलिए ही कोई विकास नहीं कर पाते क्योंकि भारत सरकार को पता है कि चीन किसी भी दिन अंडमान को हड़प सकता है।
चीन ने हाल ही में श्रीलंका में भी भारी मात्रा में निवेश किया है और लिट्टे के सफाए के बाद चीन श्रीलंका को पाकिस्तान के करीब लाकर भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने की योजना बना रहा है।

दोस्तों, इस पूरी स्टोरी में एक दूसरा पहलू भी है। चीन ने भारत को अंदर से भी कमजोर करना शुरू कर दिया है। भारत के आधे राज्यों में नक्सली समस्या है। इनसे उलझने में हमारे काफी सारे अर्धसैनिक बल लगे रहते हैं। इनमें सीआरपीएफ प्रमुख है जो दशकों से जंगलों में इनके खिलाफ कैंप लगाए पड़ी हुई है। ये नक्सली भी चीन द्वारा प्रायोजित हैं और हम इनका कुछ नहीं बिगाड़ पा रहे हैं। इनका खौफ इतना अधिक है कि ये पुलिस के जवानों और कभी-कभी उसके बड़े अधिकारियों को तो चूहे-बिल्ली की तरह मार देते हैं। आंध्रप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू पर यह जानलेवा हमला कर चुके हैं, झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के पुत्र को जान से मार चुके हैं और देश के पहाड़ी इलाकों में अपनी अलग सत्ता चलाते हैं। देश के 27 में से 7 प्रोजेक्ट टाइगर रिजर्व पर इनका कब्जा है और वहाँ सिर्फ इसी कारण प्रतिवर्ष होने वाली वन्यजीवों की गणना नहीं हो पाती।

इस बात से एक बात का और लिंक है जिसका मैं यहाँ उल्लेख कर देना उचित समझता हूँ। भारत के पास अग्नि, पृथ्वी जैसी मिसाइलें हैं। ये परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम हैं और चीन अग्नि की रेंज में आता है। ये मिसाइलें बहुत महंगी होती हैं और कम संख्या में बनाई जाती हैं। आसमानी पहरे या कहें सेटेलाइट की नजर से बचाने के लिए इन्हें हमेशा मोबाइल रखा जाता है। यानी रेलवे के माध्यम से या हैवी आर्मी व्हीकल के माध्यम से यह हमेशा चलती रहती हैं, एक जगह से दूसरी जगह। अगर इन्हें इस तरह से नहीं घुमाया जाए तो ये बड़े पहाड़ी क्षेत्रों में छुपाकर रखी जा सकती हैं। इसका एकमात्र कारण है कि युद्ध के समय सेटेलाइट से ट्रेक होकर चीन या अन्य कोई भी शक्तिशाली देश इनके जखीरे पर हमला कर इन्हें समूल नष्ट कर सकता है। लेकिन यहाँ दिक्कत यह है कि देश के पहाड़ी इलाके धीरे-धीरे नक्सलियों के कब्जे में आते जा रहे हैं। ऐसे में यकीन करना मुश्किल है कि हम पहाड़ों के बीच अपनी बेशकीमती मिसाइलों को सुरक्षित तरीके से छुपा पाएँगे।

2. क्या आपको नास्त्रेदमस की वो भविष्यवाणी याद है जिसमें उन्होंने कहा था कि तीसरा विश्वयुद्ध चीन और इस्लामिक देश मिलकर भड़काएँगे। दक्षिण एशिया से शुरुआत होगी और ओरियेंट (उन्होंने भारत का इसी नाम से उल्लेख किया है) सबसे पहले गुलाम बना लिया जाएगा। बाद में अमेरिका, जापान, ब्रिटेन और फ्रांस मिलकर भारत का साथ देंगे और अंत में विजयी होंगे। भारत भी विजेता बनेगा और बाद में महाशक्ति के तौर पर स्थापित होगा लेकिन सभी मित्र राष्ट्रों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।
मैंने आज ही वो खबर भी पढ़ी है जिसमें लिखा है कि भारत पर निशाना साधने के लिए पाकिस्तान ने अमेरिका से मिली हारपून मिसाइलों में कुछ परिवर्तन किए हैं और इसमें चीन ने निश्चित तौर से मदद की है। अमेरिका ने मिसाइलों की मूल डिजाइन के साथ छेड़खानी करने के लिए पाकिस्तान को चेताया भी है। दरअसल चीन के साथ पाकिस्तान भी भारत को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता है। चीन पाकिस्तानी मानस को समझते हुए यह भी मानता है कि इस क्षेत्र में एकमात्र महाशक्ति बने रहने के लिए उसे भारत को हराना ही होगा क्योंकि रूस के टूटने के बाद भारत से ही उसे खतरा है। दूसरा वह यह भी मानता है कि अगर वो पाकिस्तान या बांग्लादेश के मार्फत भारत के खिलाफ बड़ा युद्ध छेड़ता है तो भारत के अंदर रह रहे 20 करोड़ मुसलमान भी उसका साथ देंगे और फिर नक्सली तो हैं ही। ऐसे में समझना मुश्किल नहीं है कि स्थिति विकट है और हम उस तरह से तैयार नहीं हैं। हम सिर्फ अपने घर में बैठकर अपने को सुरक्षित नहीं मान सकते। चीन का रक्षा बजट हमारे बजट से तीन गुणा ज्यादा है। इस वर्ष भारत जहाँ अपने डिफेंस बजट पर 27 अरब अमेरिकी डॉलर खर्च कर रहा है, वहीं चीन इस साल 70 अरब अमेरिकी डॉलर खर्च कर रहा है। हमारे पास कई शो-पीस हैं जैसे एयरक्राफ्ट कैरियर विराट, जो हमारे पास इकलौता है और ठीक से काम भी नहीं करता। प्रस्तावित कैरियर एडमिरल गोर्शकोव को रूस ने कई सालों से अटका रखा है, जबकि चीन के पास 12-13 एयरक्राफ्ट कैरियर हैं। टैंकों में भी वो सुविधा और संख्या के मामले में भारत से कहीं आगे है। ऐसे में हमारी शक्तिशाली और साथ ही बदमाश चीन के खिलाफ क्या स्ट्रेटेजी होगी इसपर कोई सोच नहीं रहा। हालांकि भारत ने हाल ही में कुछ कदम उठाए हैं लेकिन वो अपर्याप्त हैं।

(दोस्तों, अब बाकी अगली किश्त में, लेख लंबा हुआ जा रहा है, कहीं पढ़ना मुश्किल ना हो जाए)

आपका ही सचिन...।