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April 01, 2010

सानिया, ये तूने क्या किया..??

इसे देशद्रोह नहीं तो और क्या कहें..??

सानिया मिर्जा ने जो जुर्म किया वो खबर अब पुरानी पड़ चुकी है। फिलहाल बस इतना ही कि इस लड़की ने आग में घी डाला है, हमारी संवेदनाओं पर पानी डाला है, खुद पर से विश्वास उठवाया है और हर उस मुस्लिम लड़की पर से भी विश्वास उठवाया है जो पाकिस्तान को दुश्मन देश की नजर से नहीं बल्कि इस नजर से देखती है कि वो एक मुसलमान देश है।

मुझे इस वाक्ये को देख-पढ़ वो तमाम सर्वेक्षण याद आ गए जिनमें सानिया मिर्जा देश की लड़कियों के लिए आइकॉन या रोल मॉडल घोषित की जाती थीं। वो मोस्ट डिजाइरेबल भी थीं लेकिन अफसोस कि हमने जिस लड़की को मालो-शौहरत से लाद दिया उसने हमीं को लात मार दी। ये कैसा चरित्र है जो देश को अपना नहीं मान पाता। ये लड़की पाकिस्तान को दुश्मन देश की बजाए मुसलमानों का घर मानती रही और हमें पता तक ना चला। उसने उस खच्चर शोहेब मलिक को चुना जो जैसे भारतीय लड़कियों को फँसाने की कसम खाए बैठा था फिर भले ही वो मुसलमान हो या हिन्दू। उस मलिक ने पहले हैदराबाद की आएशा सिद्दीकी को फँसाया और बाद में सयाली भगत को। सयाली पर तो क्या लिखें, वो मामला पुराना है और हम उस पर थूकना भी नहीं चाहते। लेकिन सानिया तो हमारी आशाओं के केन्द्र में थी। हम उसकी ऊपर उठती रैंकिंग से रोमांचित हुआ करते थे और नीचे गिरती रैंकिंग से चिंतित, लेकिन उसने हमारी सारी चिंताओं को निर्मूल साबित कर कह दिया कि जाओ तुम जो भी सोचा हमारे लिए, हमें परवाह नहीं। हम उस तीजिए (दूजिए नहीं) शोहेब मलिक से ही शादी करेंगे। अब जब सानिया के पोस्टर जलाएँ जा रहे हैं और उसकी तस्वीरों पर चप्पलें मारी जा रही हैं तो यकीन मानिए हमें जरा भी अफसोस नहीं, क्योंकि बंद मानसिकता वाली इस लड़की को अगर मौका मिलता तो वो पाकिस्तानी समधर्म अजमल आमिर कसाब से भी शादी कर लेती, क्योंकि उसे देश से क्या मतलब, और हमारी दुश्मनी से क्या लेना-देना, उसे तो धर्म से मतलब है।

अब जबकि सानिया पाकिस्तान की बहू बनने वाली है तब पाकिस्तान के टेनिस महासंघ की ओर से एक रोचक प्रस्ताव आया है। पाकिस्तान टेनिस महासंघ के प्रमुख दिलावर अब्बास ने कहा है कि हम चाहते हैं कि सानिया मिर्जा इस महीने पूर्व क्रिकेट कप्तान शोएब मलिक से निकाह के बाद पाकिस्तान की ओर से खेले। उन्होंने मीडिया को कहा- पाकिस्तान टेनिस के लिए यह अच्छी खबर है कि सानिया शोएब से शादी कर रही हैं। हम उसका स्वागत करते हैं और उम्मीद करते हैं कि वह पाकिस्तानी नागरिक बनकर भविष्य में हमारे लिए खेलें। उनका भविष्य उज्जवल है और अगर वह पाकिस्तान के लिए खेलें तो हम खुश होंगे। अब्बास ने कहा- महिलाएं पारंपरिक रूप से अपने पति का अनुसरण करती हैं, इसलिए मुझे उम्मीद है कि वह भी शोएब से प्रेरित होकर पाकिस्तान के लिए खेलें।

अब्बास की यह प्रक्रिया सही और उचित है क्योंकि जब यह लड़की इतनी भ्रष्ट हो ही चुकी है तो वो अगर ये भी कर ले तो हमें कोई गुरेज नहीं, उसका पूरा परिवार मय माता-पिता भाई बहन सब पाकिस्तान में बस जाएँ तो भी कोई हर्ज नहीं। हम तो इस नापाक लड़की को पूरा ही विदा करना चाहते हैं। रही बात भारत के उन इलेक्ट्रानिक मीडिया चैनलों या धर्मनिरपेक्षवादी अखबारों की जो इस शादी से खुश हैं और शोहेब मलिक के जीवन के पन्ने हमारे सामने खोल रहे हैं तो थू है ऐसे चैनलों पर जो बेढंगे से चले ही जा रहे हैं बिना ये जाने कि इस देश की जनता क्या चाहती है और ऐसे मौकों पर उन्हें क्या करना चाहिए। इन चैनलों की बोझिल खबरों पर अब कुत्ते भी पैर उठाकर अपने काम को अंजाम देना नहीं चाहेंगे। मेरा मानना है कि इस पूरी घटना पर सानिया को सबक सिखाया जाना चाहिए ताकि उसे यह महसूस हो कि हम उसके इस जाहिल फैसले से खुश नहीं हैं बल्कि क्रोधित हैं, उसने एक गधे का प्यार पाने के लिए पूरे 110 करोड़ भारतीयों का प्यार खोया है, और हमारी इस प्रतिक्रिया से उन सभी मुस्लिम लड़कियों को भी सबक मिलना चाहिए जो पाकिस्तान को एक दुश्मन देश की तरह नहीं बल्कि एक समधर्म देश की नजर से देखती हैं।

आपका ही सचिन....।

October 25, 2009

बम विस्फोट आखिर पाकिस्तान में क्यों..??


दहशतगर्दी का दर्द समझ आ रहा होगा पाकिस्तान को

पिछले कुछ दिनों से लगातार कुछ खबरें सुन रहा हूँ। यह खबरें वैसे तो हम मानसिक सुकून देने वाली कह सकते हैं लेकिन फिर भी मैं इनपर कुछ सोचने के लिए विवश हुआ। आप दोस्तों से शेयर करना चाहता हूँ जैसी कि मेरी आदत है। यहाँ मैं बात कर रहा हूँ पाकिस्तान में लगातार हो रहे बम विस्फोटों की। कई बार तो इन विस्फोटों की भयावहता देखकर लगता है कि ओफ..अगर यह सब भारत में हुआ होता तो कितना भयानक मंजर होता...!!!! भारत की आशंका इसलिए जागी क्योंकि जिस तरह से पाकिस्तान में विस्फोट किए जा रहे हैं और जो लोग विस्फोट कर रहे हैं वो वही लोग हैं जो भारत में आतंक फैलाते रहे हैं। यहाँ की तर्ज पर ही वहाँ भी विस्फोट हो रहे हैं। कारण भी वही है....बहुचर्चित धर्म.....।

दोस्तों, जब पाकिस्तान में विस्फोट होते हैं तो वहाँ के मुस्लिम बाशिंदों के भी उसी तरह फटे हुए बदन आसमान में उड़ते हैं जैसे यहाँ हिन्दुओं के उड़े थे। दोनों ही इंसान हैं लेकिन दहशतगर्दों को यह नहीं दिखाई देता। उन्हें दिखता है कि उनकी धर्मांधता और उसके फैलाव में रोड़ा कौन बन रहा है। पाकिस्तान ने आतंकवाद को लंबे समय तक प्रशय दिया। उसे पाला पोसा। बहुचर्चित आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (खुदा की पवित्र फौज) का कई एकड़ों में फैला मुख्यालय पाक राजधानी इस्लामाबाद से कुछ ही सौ किमी दूर है। ऐसे में पाकिस्तानी आवाम को माँस के लोथड़ों में तब्दील होता हुआ देख आश्चर्य होता है। हालांकि इसके स्पष्ट कारण हैं जो आपको और हमको दोनों को पता हैं लेकिन असमंजस की स्थिति देखिए कि खुदा (?) के लिए काम करने वाली दो फौजें आपस में लड़ रही हैं और मर रही हैं। पाकिस्तान फौज और उसकी इंटेलीजेंस एजेंसी आईएसआई ने लंबे समय तक (लगभग दो दशक) आतंकियों का साथ दिया। उन्हें इतना मजबूत बनाया कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार अरब से पनपे अल कायदा से ज्यादा धन-संपदा और संसाधन पाकिस्तान और अफगानिस्तान से पनपे तालीबान के पास है। अमेरिकी वर्ल्ड ट्रेड टॉवरों को ध्वस्त करने के बाद अमेरिका ने पाकिस्तान को पुचकारने और लताड़ने का काम शुरू किया। पुचकारने का ऐसे कि उसे भरपूर आर्थिक सहायता दी गई जिससे उसकी सामाजिक जरूरतें पूरी हो सकें। लताड़ने का ऐसे कि पाकिस्तान को इसके एवज में तालीबान के खिलाफ जंग छेड़नी थी। उसी तालीबान के खिलाफ जो पाकिस्तानी फौज का बच्चा था। अब यह बच्चा बड़ा हो गया है और बाप को टक्कर दे रहा है।

तालीबान के पास कभी निर्दोषों की जान लेने के अलावा कोई विकल्प रहा ही नहीं। वो डराकर अपने धर्म को दूसरों के ऊपर हावी करना चाहता है। लेकिन उसे यह समझ नहीं आता कि आधुनिक दुनिया में यह काम उतना आसान नहीं रहा जितना 500 या 1000 साल पहले था। आज तालीबान के पास जितने संसाधन या धन होगा उतने समूचे धन की तो अमेरिका, जापान या चीन में एक अकेली अत्याधुनिक इमारत होगी। जहाँ तक हथियारों की बात है तो एके-47 या रूस से लूटे हुए टैंकों के बल पर दुनिया भी फतह नहीं की जा सकती। हाँ, एक यक्ष प्रश्न जरूर हमारे सामने खड़ा है कि पाकिस्तान के परमाणु बमों पर तालीबान कहीं कब्जा करके उन्हें भारत या अन्य योरपीय या अमेरिकी देशों के लिए इस्तेमाल ना कर दे। तो यह आशंका समूचे विश्व के मानस पर अंकित है और आए दिन अमेरिकी सैन्य विशेषज्ञ यह आशंका जाहिर करते भी रहते हैं और पाकिस्तान उस आशंका पर अपना यह कहकर स्पष्टीकरण भी देता रहता है कि उसके कंट्रोल में सबकुछ है और उसके परमाणु बम पूरी तरह सुरक्षित हैं। दूसरी एक आशंका यह भी है कि चीन तालीबान को उन परमाणु हथियारों को हड़पने या बनाने में मदद करे क्योंकि उसके दुश्मन लगभग वही देश हैं जिन्हें मुस्लिम दुनिया अपना दुश्मन मानती है। हालांकि इस्लामिक दुनिया के कई राष्ट्र प्रोग्रेसिव हैं और आतंकवाद की निंदा करते हैं लेकिन तालीबान को लगता है कि वो राष्ट्र अंततः उसी का साथ देंगे और अगर नहीं देंगे तो धर्म के फैलाव के आड़े आने के कारण उनका हर्ष भी वही किया जाएगा जो वर्तमान में पाकिस्तान का किया जा रहा है।

पाकिस्तान में हो रहे लगातार धमाके और चिंदे-चिंदे हो रहे वहाँ के नागरिक और मानवता को लेकर यह अब साफ हो गया है कि तालीबान किसी का नहीं है। जिस देश के लोगों के रूपयों से उसने संसाधन जुटाए उसी देश के लोगों (जो उसके समान धर्म के भी हैं) का नाश करने से वो नहीं चूक रहा। अब उसकी प्रायरोरिटी पर भारत नहीं बल्कि पाकिस्तान है और अब वहाँ के आत्मघाती लड़ाकों को यह बताया जा रहा है कि अगर अल्लाह की बनाई जन्नत में जाना है तो अमेरिका का साथ देने वाले पाकिस्तान के लोगों को लाशों में बदलो। पाकिस्तान दुविधा में है, वो ना चाहते हुए भी तालीबानी आतंकवादियों के खिलाफ बड़ी लड़ाई लड़ रहा है और हजारों तालीबानियों को मौत के घाट उतार चुका है। उसके कई सैनिक और कई मासूम बाशिंदे भी इस लड़ाई में मारे जा रहे हैं लेकिन पीओके और अफगानिस्तान से सटी पाकिस्तानी सीमा पर बसे गाँव के लोग मानते हैं कि इस धर्मांध तालीबान का नाश होना ही चाहिए। वो त्रस्त हो चुके हैं ऐसे वातावरण से जिसमें वो सिर्फ नमाज पढ़ने वाले बनकर रह गए हैं। उन्हें सिर्फ वही करने की इजाजत है जो 1400 पहले थी। आधुनिक दुनिया में उनको झाँकने तक की इजाजत नहीं है। ऐसे में उनका दम घुट रहा है। पाकिस्तान के लोगों को यह अहसास हो रहा होगा कि दहशतगर्दी में जीने पर कैसा महसूस होता है।

आपका ही सचिन....।

September 04, 2009

भारत को समेटने के प्रयास में एकजुट दुश्मन

हमें पड़ोसियों की हर चाल पर नजर रखनी होगी


दोस्तों, कुछ दिनों से भारत को लेकर कुछ मनहूस खबरें सामने आ रही हैं। सबसे पहले पता चला कि हमारे दुश्मन नंबर 1 चीन ने भारत के खिलाफ अपनी कूटनीतिक चालें तेज कर दी हैं। फिर पता चला कि पाकिस्तान ने अमेरिका से मिली हारपून मिसाइलों में कुछ छेड़छाड़ कर उन्हें भारत के खिलाफ प्रभावी बनाने के लिए तैयार किया है। बाद में इसी टुच्चे पाकिस्तान की ओर से एक खबर यह भी आई कि वह अपने परमाणु हथियारों का जखीरा बढ़ाने में लगा है। वह अपने परमाणु कार्यक्रम का विस्तार कर रहा है और यह भी कि वह अपने परमाणु हथियारों की तैनाती की तैयारी में भी जुटा हुआ है। साथ ही यह भी कि वह सोमालियाई लुटेरों का भी साथ दे रहा है और हिन्द महासागर में जहाजों को लुटवाने में मदद कर रहा है और हाल ही में इस मामले में 12 पाकिस्तानी नागरिकों को पकड़ा भी गया है। सबसे बड़ा तुर्रा यह कि पकड़े गए जहाजों को छुड़वाने या अपने जहाजों को लूट से बचाने वाली बात कहकर चीन अपने नौसेना बेड़े की हिन्द महासागर में तैनाती कर चुका है और कुल मिलाकर बात भारत को घेरने की है। एक अनुमान के मुताबिक पाकिस्तान के पास 70-80 परमाणु बम हैं जबकि चीन के पास कितने हैं उनकी तो गिनती ही नहीं है और यह सिर्फ उसे ही पता है। उसकी सब बातों की तरह यह भी एक रहस्य ही है। इनमें से ज्यादातर बातों का खुलासा दूर बैठे अमेरिका ने किया है। आखिर हम क्यों मेहनत करें जब अमेरिका खुद ही सबकुछ पता करके हमें बता देता है (!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!)...

दोस्तों, यह खबरें तब आई हैं जब हमारे यहाँ राजनीतिक हल्ला मचा हुआ है। भाजपा में घमासान मचा हुआ है, जसवंत सिंह आडवाणी की पोलें खोले जा रहे हैं और कांग्रेस ने हाल ही में अपना एक प्रभावी मुख्यमंत्री खो दिया है। इससे पहले एक और घमासान मच चुका था। लेकिन यह दूसरे मगर रिलेटेड टॉपिक पर था। भारत के रज्ञा वैज्ञानिक संथानम जी ने यह मुद्दा उछाला था। उनका कहना है कि भारत द्वारा किया गया फ्यूजन बम या कहें हाईड्रोजन बम फुस्स था। इसे इस तरह से भी कह सकते हैं कि वो उतनी शक्ति का नहीं था जितना की दावा किया गया था। भारत को अपनी शक्ति सुनिश्चित करने के लिए और विस्फोट करने चाहिए। उल्लेखनीय है कि फिजन तकनीक से अणु बम (एटम बम) बनाया जाता है जबकि फ्यूजन तकनीक हाईड्रोजन बम में काम आती है। इस खबर से जहाँ भारत में हंगामा मच गया वहीं हमारे दुश्मनों की बाँछें खिल गईं। वो नई तैयारियों में लग गए जबकि हमारे यहाँ सफाई देने का सिलसिला चल पड़ा। संथानम के इस दावे को पूर्व राष्ट्रपति डॉ. कलाम और विख्यात परमाणु वैज्ञानिक डॉ. अनिल काकोड़कर ने तुरंत खारिज किया। लेकिन मीन-मेख निकालने वाले तत्कालीन भाजपा सरकार को घेरे में लेने लगे, बिना ये सोचे कि इससे दुनिया में हमारी क्या छवि प्रस्तुत होगी और ये भी कि हमारे बनाए हुए बमों की ताकत पर फिर कौन विश्वास करेगा और क्योंकर हमसे डरेगा..?? इस बीच हमारे वित्तीय दिमाग के रक्षामंत्री चिदंबरम ने तो यह तक कह दिया कि संथानम के इस दावे की जाँच कराई जाएगी जबकि हमारे प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह बात को संभाला और कहा कि इस बात पर बहस नहीं होनी चाहिए और डॉ. कलाम के बोलने के बाद इस बहस को समाप्त माना जाना चाहिए।

दोस्तों, इस पूरे घटनाक्रम को मैं दुर्भाग्यपूर्ण मानता हूँ लेकिन संथानम की एक बात का मैं समर्थक हूँ। मुझे लगता है कि भारत को और अधिक परमाणु विस्फोट करने चाहिए। उसे अपनी ताकत लगातार बढ़ाते रहना चाहिए और उसे समय-समय पर जाँचते भी रहना चाहिए क्योंकि हम चारों ओर दुश्मनों से घिरे हुए हैं। इस ताकत की कब जरूरत पड़ जाए यह कहा नहीं जा सकता। दूसरे, हमारे चारों ओर अमेरिका भी अपना शिकंजा कस रहा है। ठीक रेटीक्युलेटेड पाइथन (अजगर की संसार का सबसे बड़ी प्रजाति जो 10 मीटर तक लंबी होती है) की तरह। हालांकि फिलहाल हमारे उससे संबंध अच्छे चल रहे हैं लेकिन वो हमारी तरफ सिर्फ दो कारणों से झुका हुआ है। एक तो उसे चीन से खतरा है और दूसरे इस्लामिक आतंकवाद से। ये दोनों ही हमारे आस-पास हैं। पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश जहाँ इस्लामिक आतंकवाद का गढ़ हैं वहीं चीन तो हमारे सिर से ही लगा हुआ है। ऐसे में अमेरिका का हमारे साथ रहना लाजिमी है। लेकिन परमाणु समझौते के बाद हमारे सभी परमाणु रिएक्टर उसकी नजरों में आ जाएँगे और एक बार इन रिएक्टरों का काम शुरू होने के बाद हमारा आगे परमाणु विस्फोट करने का रास्ता मुश्किल भरा या कहें असंभव हो जाएगा। ऐसे में हमें ये कदम तुरंत उठाना होगा।

हालांकि भारत जैसे सघन आबादी वाले देश में मैं परमाणु संयंत्रों को लगाने का विरोधी हूँ। इसके कुछ अपने कारण भी हैं। मैंने हमारे हिन्दी वैब पोर्टल पर इस विषय पर तीन विस्तृत लेख लिखें हैं। आप भी इन्हें पढ़ सकते हैं और इसके बाद अपनी राय भी जाहिर कर सकते हैं। ये रहीं इनकी लिंक्स..।
परमाणु समझौते के पीछे का काला सच
पहले भारत के परमाणु संयंत्र तो सुधरें
परमाणु ऊर्जा से पीछा छुड़ा रहा है अमेरिका

दोस्तों, अमेरिका पाकिस्तानी मंसूबों को भाँपकर उसे जल्दी ही दी जाने वाली 7.5 अरब डॉलर की सहायता को रोक सकता है लेकिन इससे क्या हो जाएगा..?? वो पहले ही पाकिस्तान के पाले में 20 अरब डॉलर की मदद फैंक चुका है और इससे पाक ने दो नए प्लूटोनियम रिएक्टर और उपयोग में आने वाले रासायनिक पदार्थों का निमार्ण शुरू कर दिया है। उसके विनाशक हथियारों का जखीरा उसकी राजधानी इस्लामाबाद के नजदीक ही जमा हो रहा है। वो इन्हें बंकरों में जमा कर रहा है और अमेरिका ने तो इन बंकरों की उपग्रह से ली गई तस्वीरें भी जारी कर दी हैं। इसके अलावा पाक शाहीन-2 का विकास, बैलेस्टिक मिसाइल वाली पनडुब्बी निर्माण, दो नई परमाणुचालित क्रूज मिसाइल और बाबर व राड मिसाइलों के उन्नतीकरण में लगा हुआ है। पाकिस्तान किस कदर दोगला है यह तो हम पिछले 60 सालों से जान-समझ रहे हैं। उसके लिए तैयारी भी कर रहे हैं लेकिन दिन पर दिन वह फिर भी नए उदाहरण पेश करता रहता है। हाल ही उसने अपने 15 मोस्ट वांडेट आतंकियों की सूची तैयार की है। लेकिन इसमें लश्कर-ए-तयैबा का सर्वेसर्वा वो हाफिज सईद शामिल नहीं है जिसने पिछले वर्ष मुंबई पर हमला करवाया था। इसके भी दो कारण हैं। पहला तो यह कि सईद को पाकिस्तान में धर्म गुरू समझा जाता है ना कि आतंकवादी सरगना। दूसरे, सईद ने फिलहाल अमेरिका का कुछ नहीं बिगाडा़ है इसलिए वो लिस्ट से बाहर है क्योंकि इस लिस्ट में वही आतंकी शामिल हैं जो अमेरिका और उसकी फौजों के लिए खतरा बने हुए हैं।

हम इस समय इतिहास के सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं जब हमारे चारों ओर शुत्रओं का जमावड़ा है और जिसमें से दो शत्रु परमाणु शस्त्रों से लैस हैं। भारत और यहाँ की राजनीतिक पार्टियों और अपनी दैनंदिन राजनीति से ऊपर आकर हाल फिलहाल भारत और उसके भविष्य के बारे में सोचना चाहिए क्योंकि हर बार हमें खतरे के प्रति अमेरिका ही आगाह नहीं करेगा......!!!!!!!!!!!!!

आपका ही सचिन....।

August 26, 2009

जिन्ना की विरासत है आतंकवाद

जी. पार्थसारथी
3 नवंबर 2000 को जमात-उद-दावा (पूर्व में लश्कर-ए-तोइबा) के मुख्यालय पर एकत्रित हजारों जेहादियों की भीड़ के सामने गरजते हुए आमिर-ए-लश्कर हाफिज मोहम्मद सईद ने कहा था, 'जिहाद सिर्फ कश्मीर तक सीमित नहीं है। पन्द्रह साल पहले अगर कोई सोवियत संघ के टुकड़े होने की बात कहता था तो लोग उस पर हँसते थे। इंशाअल्लाह, आज मैं भारत के टूटने की घोषणा करता हूँ। हम तब तक चैन नहीं लेंगे, जब तक की सारा हिन्दुस्तान पाकिस्तान में समा नहीं जाता।'

पिछले दो दशकों से सईद खुलेआम जंग की ऐसी घोषणा कर रहा है कि जैसे उसके जरिए सारे भारत को लील जाएगा। मुंबई में हुए 26/11 के हमले तक किसी ने उसे गंभीरता से नहीं लिया था लेकिन भारत को तोड़ने की हाफिज की मुहिम नौ साल से जारी है। नवंबर 2000 में दिए इस भाषण के तुरंत बाद सईद ने देश के दिल में स्थित ऐतिहासिक लालकिले पर हमला करने के लिए अपने मुजाहिदीन भेजे, तारीख थी 22 दिसंबर 2000। इस हमले के बाद इस्लामी पार्टियों के राजनेताओं के सामने सईद ने छाती ठोक कर कहा कि उसने दिल्ली के लालकिले पर इस्लाम का हरा झंडा फहरा दिया है।

हाफिज मोहम्मद सईद न कभी एक साधारण आदमी था, न अब है। उसे पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की सरपरस्ती भी हासिल थी।

गौरतलब है कि 1998 में पंजाब के गवर्नर शाहिद हमीद और सूचना मंत्री मुशाहिद हुसैन सैयद को खुद हाफिज से बात करने और आभार जताने के लिए भेजा था। क्यों न हो? आखिरकार सईद द्वारा पाले-पोसे वहाबी/ सलाफी इस्लामी स्कूल को नवाज शरीफ के वालिद मियाँ मोहम्मद शरीफ का संरक्षण (तबलीगी जमात के जरिए) हासिल था। इसके अलावा जमीनी स्तर पर लश्कर का करीबी रिश्ता पाकिस्तानी आर्मी तथा आईएसआई के साथ भी है, जो कि चरमपंथी गुटों को हथियार, प्रशिक्षण और सैन्य सहायता देते हैं, किंतु भारत के टुकड़े करने संबंधी सईद के बयान क्या सिर्फ उसकी अपनी सोच है या उसके इस वक्तव्य में पाकिस्तान और विशेषकर पाकिस्तानी सेना की व्यापक रणनीति उजागर होती है? उस रणनीति से पाकिस्तान के हुक्मरान भी नावाकिफ या अलग नहीं हो सकते। चाहे वे फौजी शासक हों या वोट से चुनकर आए प्रतिनिधि हों।

पाकिस्तान का विचार सबसे पहले चौधरी रहमत अली ने 1933 में प्रकट किया था जिसने आकार ग्रहण किया 1944 में मुस्लिम लीग के लाहौर प्रस्ताव में। पाकिस्तान बनने के बाद वहाँ एक आम मान्यता रही थी कि भारत एक कमजोर देश होगा क्योंकि हैदराबाद में निजाम का राज है और द्रविड़ लोग अपना अलग द्रविड़िस्तान बना लेंगे।

अलगाववाद को प्रोत्साहन देते हुए मोहम्मद अली जिन्ना सवर्ण हिन्दुओं के प्रति तिरस्कारपूर्वक बोलते थे। वे इस बात पर जोर देते थे कि दक्षिण भारत के लोगों की भाषा, संस्कृति, रीति-रिवाज और पहचान अलग-अलग है और उनकी पहचान शेष भारत से भिन्न है।

दूसरी ओर महात्मा गाँधी ने बाबा साहेब आम्बेडकर जैसे नेताओं के साथ मिलकर दलितों के प्रति सदियों से हो रहे अन्याय व शोषण के खिलाफ आवाज उठाई, तब भी जिन्ना ने दलितों को अलग करने की ओछी कोशिश की।

उन्होंने तो जोधपुर एवं त्रावणकोर-कोचिन जैसी रियासतों को भी अपने आपको स्वतंत्र घोषित करने के लिए उकसाया था। उनका लक्ष्य स्पष्ट था- भारत के छोटे-छोटे टुकड़े कर दो ताकि उपमहाद्वीप में मुस्लिम राज्य का दबदबा रहे। 1946 के कैबिनेट मिशन प्लान के अनुसार जिन्ना की सोच यह थी कि दस साल के भीतर पश्चिम से संयुक्त पंजाब व सिंध तथा पूर्व से बंगाल व असम कमजोर भारत से टूटकर अलग हो जाएँगे।

अँगरेजों के साथ जिन्ना का भी मानना था कि भारत के केन्द्र में एक कमजोर सरकार है जो देश के विभिन्न हिस्सों को मजबूती से थामे रखने में अक्षम है। इस तरह जिन्ना का लक्ष्य, भारत के प्रति, हाफिज मोहम्मद सईद के इरादों से कुछ अलग नहीं था। हालाँकि जिन्ना वस्तुतः अनीश्वरवादी इस्माइली थे जबकि सईद वहाबी मंसूबों का पक्षधर है।

लियाकत अली खान से लेकर जनरल परवेज मुशर्रफ तक जिन्ना के वारिसों ने भारत से अपने रिश्तों को इसी सोच के आधार पर बनाए रखा कि भारत एक कमजोर देश है। 1965 में फील्ड मार्शल अयूब खान ने यही सोचकर भारत पर हमला किया कि प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री एक कमजोर नेता हैं जो कि गंभीर अलगाववाद से जूझ रहे हैं। ये समस्याएँ थीं पंजाब में पंजाबी सूबा आंदोलन, द्रविड़ पार्टियों द्वारा दक्षिण में हिन्दी विरोधी दंगे तथा उत्तर-पूर्व में लगातार चलती दिक्कतें, लेकिन हिन्दुस्तानियों की एकता के सामने पाकिस्तान को मुँह की खानी पड़ी।

जनरल जिया-उल-हक ने भारत में अलगाववाद को भड़काने के लिए एक विस्तृत नेटवर्क बनाया और पंजाब में हिन्दू-सिख विभाजन का षड्यंत्र रचा। यह साजिश नाकाम सिद्ध हुई क्योंकि हिन्दू और सिख दोनों ही पाकिस्तान की मंशा को समय रहते ताड़ गए थे। लेकिन जम्मू- कश्मीर में पाकिस्तानी आईएसआई की कोशिशें जारी हैं।

इसलिए यह बात हैरान करती है जब कोई भारतीय जिन्ना के दिलो-दिमाग के गुणों की स्तुति करता है। सिर्फ इसलिए कि वे कभी धर्मनिरपेक्ष हुआ करते थे। लेकिन उन्हें इस इल्जाम से बरी नहीं किया जा सकता कि मजहबी आधार पर देश के बँटवारे और कत्लेआम के लिए जिन्ना की जिम्मेदारी बनती है।

पूर्व राजनयिक नरेन्द्रसिंह सरिला ने बहुत सतर्कतापूर्वक एक किताब लिखी है- 'द शैडो ऑफ द ग्रेट गेम-द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ पार्टीशन' जिसमें उन्हें खुलासा किया है कि मई 1946 में कैबिनेट मिशन के भारत आने से पहले, एक के बाद एक आए ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो तथा लॉर्ड वेवैल पहले ही फैसला कर चुके थे कि भारत का बँटवारा करके उत्तर-पश्चिम में एक मुस्लिम राष्ट्र की स्थापना की जाए। सीमाएँ ईरान, अफगानिस्तान तथा चीन के सिंकियांग सूबे से लगती हों। यह इसलिए था कि फारस की खाड़ी में मौजूद तेल के खजाने पर ब्रिटिश हित सुरक्षित किए जा सकें।

मोहम्मद अली जिन्ना ने 1939 में अँगरेजों के इस उद्देश्य को आगे बढ़ाने का काम किया। पाकिस्तान के रूप में उन्होंने एक ऐसे राष्ट्र की स्थापना की जो अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का केन्द्र बन गया है। पाकिस्तान अब एक ऐसा देश है जिस पर सामंतवादी फौज का राज चलता है और जो हाफिज मोहम्मद सईद और मौलाना मसूद अजहर को पाल-पोस रहा है। अंततः समस्त विश्लेषण का लब्बोलुआब यही निकलता है कि ये कायदे आजम जिन्ना की विरासत है जो वे दुनिया और इस उपमहाद्वीप को देकर गए हैं, जिसमें हम सभी रहते हैं।

(लेखक पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त रहे हैं) (साभारः वैबदुनिया)