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October 28, 2009

भारत पर हर तरह से हावी खानदानवाद

महाराष्ट्र के चुनावों ने यह जता दिया है

दोस्तों, कल आईबीएन-7 पर एक कार्यक्रम देख रहा था। उस कार्यक्रम का नाम था 'एजेण्डा'। उसमें बताया जा रहा था कि कैसे इस बार महाराष्ट्र के चुनावों में जीतकर आने वाले विधायकों में युवाओं की भरमार है। उनमें से कई युवा खूबसूरत थे। फल-फूल रहे थे और उनके चेहरे से रईसी टपक रही थी। उन्हें टीवी पर किसी स्टार की तरह दिखाया जा रहा था। ऐसा क्यों था इसके लिए आप अगला पेरा पढ़े, उन युवाओं के नाम के साथ-साथ उनके माँ-बाप के नाम भी पढ़े। तब ही बात थोड़ी क्लीयर हो पाएगी और आगे बढ़ पाएगी।

तो हमारे इस महान लोकतंत्र में जिसने राजशाही का चोगा कोई 62 साल पहले उतारकर फैंक दिया था, में महाराष्ट्र के ये चुनाव हुए। इनमें जो यंग ब्रिगेड आई है वो इस प्रकार है। चुने गए विधायकों में विलासराव देशमुख के पुत्र अमित देशमुख, सुशीलकुमार शिंदे की बेटी प्रणिती शिंदे, राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील के बेटे राव साहेब शेखावत, पूर्व केन्द्रीय मंत्री माणिकराव गावित की बेटी निमर्ला गावित, सांसद एकनाथ गायकवाड की बेटी वर्षा गायकवाड, पूर्व सांसद रामशेठ ठाकुर के बेटे प्रशांत ठाकुर आदि शामिल हैं। मजे की बात यह है कि इनमें से कई पहली बार ही मंत्री बनने की फिराक में हैं, अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं और मंत्रिमंडल में इनकी जगह पक्की कराने के लिए इनके माँ-बाप ने पूरा जोर लगा रखा है।

कई बार मुझे अपने देश के लोकतंत्र पर गुस्सा आता है। जब जनता ही सुधरना नहीं चाहती तो क्या किया जा सकता है। राज ठाकरे ने महाराष्ट्र चुनावों में सफलता पाई। मुझे लगता था कि ऐसा नहीं होगा लेकिन उसपर लिखे गए एक लेख और उसपर आई टिप्पणियों में मराठियों से गालियाँ खाने के बाद पढ़ें इसे मुझे लग गया था कि वो जरूर जीतेगा क्योंकि वहाँ का मानस उसके साथ था और भारतीयता के तमाम तर्क महाराष्ट्र के लोगों ने अपने-अपने तर्कों के साथ ठुकरा दिए थे। जब लोग ही लोकतंत्र को दुत्कार कर राजशाही, जात-पात में फँस जाएँ तो सिर्फ लेख लिखने भर से क्या हो जाएगा..?? अब इस खानदानवाद और नफरत की राजनीति का विस्तार हो रहा है। लेकिन हम यहाँ सिर्फ खानदानवाद की ही बात करेंगे।

पहले हमारे देश में राजा सत्ता हस्तांतरण किया करता था। अपने बेटे या कहें राजकुमार या युवराज को। राजकुमार अधिकृत रहता था अपने पिता से राज गद्दी लेने के लिए। बाद में वह राज करता था, फिर उसका बेटा, फिर उसका भी बेटा। यही नियम था। हिन्दू राजाओं ने भी यही नियम चलाया और बाद में आने वाले मुगल राजाओं ने भी। लोकतंत्र से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती। लेकिन आप भारत के लोकतांत्रिक इतिहास की ओर जरा नजर डालकर देखिए। देश के ऊपर ज्यादातर किस खानदान का राज रहा है..?? बीच-बीच में कुछ छुटभैये आ गए लेकिन वो गाँधी-नेहरू परिवार की छाँव में ही पले-बढ़े। अन्यथा यह खानदान ही पिछले 60 बरसों से देश पर राज कर रहा है। पिछले दस वर्षों से देश पर पार्श्व में रहकर सोनिया गाँधी राज कर रही हैं। बीच में छह सालों के लिए भाजपा आई लेकिन अटलजी के बाद उसका कोई खेवनहार नहीं रहा और वो पूरे भारत में इस समय कमजोरी और हार का सामना कर रही है। उसके कमजोर होने से पहले से ही चरमराई और खत्म सी हो रही हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था भी धीरे-धीरे खत्म हो रही है। बाकी क्षेत्रीय पार्टियाँ तो चल ही खानदानों के बूते रही हैं। उनमें शुरूआत भले ही किसी कद्दावर नेता ने की हो लेकिन वो आखिरी में सत्ता का हस्तांतरण अपने बेटे-बेटियों को ही करता है। मैं यहाँ नाम नहीं गिनाना चाहता लेकिन आप सभी क्षेत्रीय पार्टियों के बारे में सोच कर देख लीजिए बात अपने आप प्रूव हो जाएगी।

आप ताकतवर परिवारों की बात करें। देश के सारे बिजनिस हाउस अपने परिवारों के तले अपना साम्राज्य स्थापित करते हैं और उसे विस्तार भी देते हैं। इसके ढेरों उदाहरण हैं, बताने की जरूरत नहीं। खैर ठीक भी है, वो पूँजीवादी व्यवस्था है इसलिए बिजनिस एंपायरों के मालिकों के बेटे-बेटियाँ ही सबकुछ संभालते हैं। लेकिन फिल्म इंडस्ट्री को देखिए..वो कला से संबंधित होते हुए भी सिर्फ परिवार के लोगों के बलबूते ही चल रही है। पुराने एक्टर का बेटा पैदा होते ही स्टार बन जाता है, उसके बड़े होने का निर्माता इंतजार करते हैं, जबकि स्ट्रगल करने वाले प्रतिभाशाली युवा एड़ियाँ घिसते-घिसते ही बूढ़े हो जाते हैं। महाराष्ट्र चुनावों में मंत्रियों के बेटे-बेटियाँ युवाओं को मौका मिलने की बात कहकर आगे आना चाहते हैं लेकिन उनका क्या जो मौके की तलाश करते-करते बूढ़े हो गए। मतलब जब वो युवा थे तब उनसे अनुभव की अपेक्षा की गई थी और अब जब वे अनुभवी हैं तो उनसे युवा होने की अपेक्षा है। बेचारे, अब वो ना इधर के रहे ना उधर के।

ऐसा ही आपके और हमारे साथ भी है। अगर आपका 'बैक' नहीं है तो मजे करिए, आपके लिए कहीं कोई जगह खाली नहीं। लेकिन अगर है तो आप भी युवा हैं और आपको भी निश्चित ही मौका मिलेगा, बाकी अपने को तो कोई युवा ही मानने को तैयार नहीं। कुल मिलाकर अगर हम देश की राजनीति में जाना चाहें तो हमें दुआ करनी होगी कि अगले जन्म में भगवान हमें किसी सक्षम राजनीतिक परिवार में पैदा करे और किसी बड़े नेता की संतान बनाए...आमीन..।

आपका ही सचिन....।

September 17, 2009

क्या करें हम इस थरूर और मायावती का?

ये लोग देश और यहाँ की जनता को कुछ नहीं समझते

मित्रों, हमारे देश के गिरगिट नेता रोज नए-नए रंगों में सामने आते हैं। मैं खुद भी अचंभित रह जाता हूँ कि क्यों कोई डिसकवरी या एनिमल प्लेनेट चैनल यहाँ आकर इनपर फिल्में नहीं बनाता..?? अरे भाई, ये तो अनोखे जीव हैं...इनकी रंग बदलने की क्षमता का क्या कहना, गिरगिट भी शरमा जाए। तो सबसे पहले बात शशि थरूर पर..।

शशि थरूर ने क्या कहा ये बताने की जरूरत नहीं...आप सब लोग सुधिजन हैं और सब लोग अखबार, इंटरनेट और न्यूज चैनल देखते हैं। लेकिन ब्रीफ में बस इतना ही कि पिछले तीन माह से फाइव स्टार होटल में टिके (जिसे बाद में उन्होंने वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के कहने पर छोड़ा) भारतीय राजनीति के नवे-नवे राजनीतिज्ञ शशि थरूर का दिमाग अचानक फिर गया। वो जानते हैं कि जबान से निकले शब्द कभी वापस नहीं लौटते, बावजूद इसके उनकी जबान फिसल गई और जो फिसली तो उसके घेरे में भारत की जनता के साथ-साथ सर्वशक्तिमान सोनिया गाँधी और युवराज राहुल गाँधी भी आ गए। ऐसा क्या कह दिया था थरूर ने...?? तो एक अंग्रेजी पत्रकार ने शशि थरूर से सोशल नेटवर्किंग साइट “ट्विटर” पर व्यंग्य में पूछा कि क्या वे भी अब हवाई सफर की “कैटल क्लास” (इकोनोमिक क्लास) में यात्रा करेंगे जिसके जवाब में थरूर ने सार्वजनिक जवाब दिया-“ हां बिल्कुल, अपने साथ की सभी पवित्र गायों के साथ एकता दिखाते हुए अब मैं भी ‘मवेशी श्रेणी’ में यात्रा करूंगा। इन पवित्र गायों से उनका मतलब उनके साथी मंत्री थे और इत्तेफाक से सोनिया और राहुल भी पवित्र गायों की श्रेणियों में आ गए। कांग्रेस ने इसपर कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर की और इस बयान से अपने को अलग कर लिया। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस ने ही अपने मंत्रियों को इकोनॉमी क्लास में सफर करने की सलाह दी थी। फिलहाल थरूर अफ्रीकी देशों लाइबेरिया और घाना की यात्रा पर हैं और लौटने पर ही पता चलेगा कि उनका क्या हश्र होगा। लेकिन इन बातों से कुछ तथ्य तो बिल्कुल साफ हो गए हैं।

सबसे पहला यह कि यह थरूर भूरी चमड़ी में एक गोरा शख्स है जिसे अपने भारतीय होने पर ठीक उसी प्रकार से अफसोस है जैसा कि पंडित जवाहर लाल नेहरू को हुआ करता था। फटाफट अंग्रेजी बोलने वाले थरूर के साथ दूसरी दिक्कत यह है कि उसने हमेशा से विदेशों में काम किया है, लंबे समय तक संयुक्त राष्ट्र का अंडर सेक्रेटरी रहा है और वो भारत तथा यहाँ की जनता को नहीं समझता। मुझे लगता है कि यह आदमी जब किसी भारतीय ट्रेन की जनरल बोगी में सफर करेगा तो वहाँ सफर कर रहे लोगों को क्या कहेगा..?? इनसेक्ट (कीट) क्लास..??
क्योंकि हवाई सफर तो पहले से ही एलीट वर्ग के लिए माना जाता है और इकोनोमिक क्लास के लोगों को यह मवेशी बोल कर जतला चुके हैं कि वो भारतीय जनता को क्या समझते हैं। मुझे कुछ पुरानी बातें याद आ रही हैं। जब ये शख्स संयुक्त राष्ट्र में अंडर सेक्रेटरी था तब मैं इसके इंटरव्यू सुनकर बड़ा आल्हादित हुआ करता था। मुझे लगता था कि वाह, एक भारतीय संयुक्त राष्ट्र के इतने ऊँचे ओहदे पर है। फिर पिछली बार जब यह संयुक्त राष्ट्र के महासचिव पद पर लड़ने के लिए नामांकित हुआ तब भी मुझे लगता था कि हमें इसका सपोर्ट करना चाहिए। कांग्रेस सरकार की वजह से इन्हें पर्याप्त समर्थन नहीं मिल पाया और ये महासचिव बनने से रह गया और दक्षिण कोरिया के बान की मून महासचिव बने तब मुझे बहुत निराशा हुई थी। लेकिन आज मैं खुश हूँ कि अच्छा ही है जो ये आदमी उस पद तक नहीं पहुँच सका। जो व्यक्ति अपनी मातृभूमि और वहाँ के बाशिंदों का आदर करना नहीं जानता वो दुनिया से क्या प्यार करेगा और उस पद पर रहते हुए भारत का क्या भला करेगा। थरूर को उसके किए की सजा मिलनी चाहिए। हमें भूरी चमड़ी के नीचे छिपे हुए गोरे आदमी नहीं चाहिए। हमें प्योर भारतीय व्यक्ति ही अपने देश में शासन चलाने के लिए चाहिए। थरूर को उसके बोले की सजा मिलनी चाहिए। वो भारत का कतई भला नहीं कर सकता।

... दोस्तों, इसी संदर्भ में मुझे एक भारतीय राजकुमारी की भी अचानक याद हो आई। यह राजकुमारी अमर होने के अथक प्रयास कर रही है। करोड़ों रुपए खर्च करके अपनी मूर्तियाँ बनवा और लगवा रही है। ये हमारे देश के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती है। अरे, आप लोग सोच रहे होंगे कि मैंने मायावती का इंट्रोडक्शन इतने ड्रामेटिक अंदाज में क्यों करा, तो पहले यह पढ़िए..

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी अध्यक्ष मायावती ने समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव को चेतावनी दी और कहा कि बसपा के सत्ता से जाने के बाद भी कांशीराम समेत अन्य (खुद मायावती) दलित महापुरुषों की मूर्तियों को तोड़ने की गलती न करें नहीं तो इसके गम्भीर परिणाम होंगे। उन्होंने कहा कांग्रेस के कुछ नेता और सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव कह रहे हैं कि उनकी सत्ता आई तो मूर्तियों पर बुलडोजर चला दिया जाएगा। मुख्यमंत्री ने कहा, “भूल से ऐसी गलती कोई न करें नहीं तो देश में गृहयद्ध की स्थिति हो जाएगी।” उन्होंने कहा कि मूर्तियों से छेड़छाड़ होने पर पूरे देश में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ेगी। देश में आग लग जाएगी।”
अम्बेडकर पार्क समेत अन्य स्मारकों और मूर्तियों के निर्माण पर उच्चतम न्यायालय के रोक के बाद सपा और कांग्रेस ने इस मामले में मायावती पर हमले तेज कर दिए थे। गौरतलब है कि सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने कहा था कि उनकी पार्टी सत्ता में आई तो मूर्तियों पर बुलडोजर चला दिया जाएगा।


पढ़ा दोस्तों, तो देश में गृहयुद्ध के लिए अन्य हालातों की जरूरत ही नहीं है। मायावती अपनी मूर्तियाँ तुड़वाने पर ही देश को गृहयुद्ध की आग में झोंक देंगी। देश में आग लगवा देंगी। मैं कहता हूँ कि ऐसी महिला पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलना चाहिए। इसे सार्वजनिक रूप से जेल में डाल देना चाहिए और इससे भी सब्र ना हो तो इसे ही क्यों नहीं जिंदा आग में झोंक देना चाहिए? देश को ऐसे नालायक नेताओं की जरूरत ही नहीं है। और यहाँ मैं माफी माँगकर कहना चाहूँगा कि उत्तरप्रदेश के नागरिकों को भी इस नालायक महिला के साथ सजा देना चाहिए जो इसे हर बार चुन लेते हैं। क्या उन्हें नहीं पता कि अमर होने वाले व्यक्तियों की मूर्तियाँ दुनिया सदियों तक खुद ही बनवाती रहती है। उन्हें खुद अपनी मूर्तियाँ बनवानी की जरूरत नहीं पड़ती। जनता की गाढ़ी कमाई से ये महिला जो खिलवाड़ कर रही है उसकी सार्वजनिक निंदा की जानी चाहिए और हर बसपा नेता और कार्यकर्ता को जनता को कटघरे में खड़ा करके पूछना चाहिए कि भईया ये तुम्हारी बहनजी हमारी जान लेंगी क्या, वो पागल हो गई हैं क्या, नहीं देखनी हमें उनकी मनहूस शक्ल और मूर्तियों के रूप में दशकों तक उसे कौन झेलेगा...बंद करो ये अंधेरगिर्दी....अगर यह सब अभी बंद नहीं हुआ तो अंदर से कमजोर समझकर हमारे ताकतवर दुश्मन तुरंत हमारा सफाया कर देंगे फिर देखते हैं कि कहाँ जाती हैं तुम्हारी मूर्तियाँ और 'कैटेल क्लास' कहने वाली एलिट मैंनटेलिटी...!!!!!!!

आपका ही सचिन....।

September 05, 2009

फिर कौन करेगा जनता की सुरक्षा?

ऐसे गृहमंत्री और कृषि मंत्री से तो भगवान बचाए


दोस्तों, आजकल जब भी मैं देश के गृह मंत्री पी. चिदंबरम और कृषि मंत्री शरद पवार की तस्वीर देखता हूँ या टीवी पर उनकी फुटेज देखता हूँ तो मुझे उनके बोले गए दो अनमोल वचन अचानक याद आ जाते हैं। मुझे लगने लगता है कि हाँ, हमारे देश को ऐसे बहादुर और जीवट वाले नेताओं की ही तो जरूरत है...!!!!!!!!!!
ये दोनों वचन या कहें बयान क्या थे, वो आप भी जानिए...कुछ समय पहले गृहमंत्री चिदंबरम ने कह दिया था ऐसा संभव नहीं है कि देश के हरेक नागरिक की सुरक्षा की जा सके। केन्द्र सरकार या गृह मंत्रालय ऐसा नहीं कर सकता। लोगों को खुद भी अपनी सुरक्षा का ख्याल रखना चाहिए।
दूसरे बयान में केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने कह दिया था कि अगर देश के प्रदेशों (राज्यों) में सूखे की स्थिति है तो यह राज्यों का निजी मामला है और राज्य सरकारों को इससे निपटने के लिए विस्तृत तैयारियाँ करनी चाहिए। दोस्तों, इसमें मेरा मत है, कि वाह...बहुत अच्छे, हमें ऐसे नेताओं की ही तो जरूरत है.....!!!!!!!!!!

वैसे तो इस मुद्दे पर आप लोग मेरा पक्ष समझ ही गए होंगे क्योंकि मेरा पक्ष भी वही है जो आप लोगों का है। मतलब हमें इस बात से पता चल गया कि हम कितने सुरक्षित हैं। चिदंबरम जी ने हमें यह समझा दिया है कि हमें अपनी सुरक्षा खुद ही करनी चाहिए और बंदूकें, तलवारें, तोप, गोले आदि भी खरीद लेने चाहिए क्योंकि भारत में आतंकवाद का खतरा दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है और भारत सरकार उसके खिलाफ कुछ भी प्रभावी कदम नहीं उठा पा रही है। क्या आपने इतना नाकारा गृहमंत्री कहीं देखा है जो संकट के समय अपने देश के नागरिकों को अकेला छोड़ दे..?? भई, मैंने तो नहीं देखा, देखना भी नहीं चाहता, क्योंकि अगर सुरक्षा के नाम पर भारत के हर घर में हथियारों का जखीरा रहने लगा तो फिर अपराध कैसे रुकेंगे..?? दूसरा, देश में हथियारों का लाइसेंस और हथियार खरीदने की प्रक्रिया इतनी टेढ़ी और महंगी है कि हम और आप बिना सुरक्षित ही रह लेंगे और यूँ ही आतंकी हमलों में मारे जाते रहेंगे। अपने देश में एक रिवाल्वर लाइसेंस समेत कम से कम 1 लाख रुपए में आती है। तो हम कैसे करेंगे अपनी सुरक्षा..?? मतलब, सरकार हमें अपनी सुरक्षा के लिए हथियार भी नहीं लेने देती और सुरक्षा भी मुहैया नहीं कराती। फिर मुझे किसी भी संदर्भ में यह भी याद नहीं आया कि किसी और देश के गृहमंत्री ने इतनी हल्की बात की हो। अमेरिका में अगर 9/11 के बाद वहाँ का डिफेंस मिनिस्टर इस प्रकार का बयान दे देता तो लोग उस देश से ही भाग जाते। अरे, ऐसी जगह रहने से भी क्या फायदा जहाँ की सरकार को आपसे मतलब ही नहीं और वो पहली फुरसत में ही आपसे पल्ला झाड़ना चाहती हो...!!!!!!!

दोस्तों, शरद पवार भी कम नहीं हैं। वो मराठा नेता फिलहाल सिर्फ रुपए कमाने में लगा है और देश में किसी से भी पूछ लीजिए उनकी पहचान कृषि मंत्री से ज्यादा बीसीसीआई अध्यक्ष के रूप में है। भारत का किसान तो उन्हें जानता ही नहीं....तो, पवार साहब ने कह दिया कि हमें राज्यों में पड़ने वाले सूखे से मतलब नहीं....!!!!!!!! अरे, तो आप केन्द्रीय कृषि मंत्री क्यों हैं..?? आपको तो सिर्फ दिल्ली का कृषि मंत्री होना चाहिए था...और आपकी सरकार क्या सिर्फ वोट कबाड़ने के लिए किसानों का कर्ज माफ करेगी.....कभी ऐसी स्थिति पैदा नहीं करेगी जिसमें किसानों को कर्ज लेने की जरूरत ही ना पड़े....!!!!!! और फिर देश की जनता जो लाखों, करोड़ों, अरबों रुपए टैक्स के रूप में देती है वो किसलिए हैं...?? क्या ये राज्य भारत देश के अंग नहीं हैं और अगर हैं तो केन्द्रीयकृत लोकतांत्रिक सरकार यह कहकर कैसे पीछे हट सकती है कि सूखा या बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएँ राज्य सरकारों का अपना मामला है। अब तो ये कांग्रेस सरकार लोगों को वक्त की दलील भी नहीं दे सकती जो हमेशा भाजपा देकर बचती रहती है। कांग्रेस को इस बार देश की जनता ने लगातार दूसरी बार चुना है और भारतीय लोकतंत्र के 63 में से 50 से ज्यादा सालों तक उसने ही देश पर शासन किया है। तो अब उसे क्या समय देना, किसी राजनीतिक पार्टी को शताब्दियों का समय दिया जाता है क्या..?? अरे भाई दशकों का भी नहीं दिया जाना चाहिए लेकिन हमने तो कांग्रेस को पूरी आधी शताब्दी से ज्यादा समय दिया और देश फिर भी वहीं का वहीं है, जहाँ सूखे-बाढ़ के कारण आज भी लोग संकट में आ जाते हैं एवं नागरिकों की सुरक्षा की कोई जिम्मेदारी नहीं उठाई जाती...अब आप ही बताईए कि हम अपनी सरकार पर कितना भरोसा करें, उससे क्या आशा रखें और यह भी कि अपनी सुरक्षा के लिए क्या बंदोबस्त करें...??
क्योंकि हमारे देश का गृहमंत्री तो अपनी धोती संभालने में ही व्यस्त रहता है जबकि कृषि मंत्री को आईपीएल, फिल्मी सितारें और कमाई से फुरसत नहीं है।

आपका ही सचिन.......।