August 22, 2009

विभिषण बनते जसवंत!

अपने ही घर को ढहाने में लगे, भाजपा बैकफुट पर, आडवाणी की कई पोलें खुलीं

भाजपा के वरिष्ठ नेता (पूर्व) जसवंत सिंह अब विभिषण की भूमिका में आ गए हैं। वे अपना ही घर ढहाने में लग गए हैं इसलिए उनकी इतिहास में कभी ख्याति दर्ज नहीं की जाएगी। लेकिन हमें ध्यान रखना चाहिए कि विभिषण के बनने के पीछे रावण था और पूरी लंका भी थी। सो, भाजपा अब लंका की भूमिका में है और रावण की भूमिका में आडवाणी हैं। अपने पूरे चुनाव कार्यक्रम के दौरान आडवाणी ने कई मोर्चों पर झूठ बोला। यह बात अब धीरे से जसवंत सिंह खोल रहे हैं। आडवाणी ने कहा कि उन्हें कंधार में आतंकियों को छोड़े जाने की जानकारी नहीं थी। इन आतंकियों को तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह ही कंधार छोड़ने गए थे। तो सिंह ने बता दिया कि पहले दिन से ही आडवाणी को समस्त जानकारी थी और तथाकथित लौह पुरुष (आडवाणी) भारत में उतरे उस विमान पर एनएसजी कार्रवाई भी समय रहते नहीं करा पाए थे। भारतीय मीडिया की नजरों में खलनायक बने हुए नरेन्द्र मोदी के बारे में भी जसवंत ने जहर घोल दिया। उनका कहना है कि आडवाणी ने मोदी को कार्रवाई से बचाया जबकि वाजपेयी उनपर गुजरात दंगों के मामले में कार्रवाई करवाना चाहते थे। तब देश भर और दुनिया भर में भी यह संदेश गया था कि वाजपेयी ने कोई कार्रवाई नहीं की। जबकि आडवाणी ने वाजपेयी जी को यह कहकर डरा दिया था (बकौल जसवंत सिंह) कि अगर मोदी पर कार्रवाई हुई तो बवाल मच जाएगा। वाजपेयी गुजरात दंगों को लेकर बहुत परेशान थे। उन्होंने अपने संसदीय कार्यालय में प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा भी लिख दिया था। उस समय संसद सत्र चल रहा था। बकौल जसवंत वाजपेयी ने एक कागज उठाया और इस्तीफा लिखने लगे। मैंने उनका हाथ पकड़ लिया और उन्होंने मेरी ओर सख्ती से देखा, तब मैंने कहा आप यह क्या कर रहे हैं। ऐसा मत कीजिए। उन्होंने कहा छोड़ दो और मैंने बड़ी मुश्किल से उन्हें मनाया। हम उनके निवास गए। हम हालात को शांत करने में सफल हुए। उल्लेखनीय है कि जसवंत, वाजपेयी और आडवाणी के समकालीन हैं। भैरोसिंह शेखावत भी उतने ही पुराने हैं और बीच में उन्होंने भी राजनाथ सिंह और आडवाणी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था।

दोस्तों, यह तो हुई जसवंत सिंह की बातें। लेकिन मैं यहाँ सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ कि जसवंत सिंह की इन बातों ने यहाँ बहुत से गूढ़ रहस्यों पर से भी परदा उठा दिया। सबसे पहला कि अटल बिहारी वाजपेयी क्या थे वो उन्होंने बता दिया है। आज राजनाथ सिंह या अरुण जेटली कितना भी हवा में उड़ लें लेकिन उन्हें यह पता होना चाहिए कि सिर्फ एक भाजपा में अटल बिहारी वाजपेयी के ना होने से क्यों उसकी 100 सीटें कम हो गईं जबकि कांग्रेस के शासन से देश की जनता त्रस्त थी। अटल जी लखनऊ से पिछले बीस वर्षों से चुनाव जीत रहे थे। सिर्फ उनके नाम भर से ही इस बार लालजी टंडन भी वहाँ से चुनाव जीत गए जबकि मायावती तो उन्हें लालची टंडन तक कह चुकी हैं। लखनऊ काफी मुस्लिम आबादी वाला क्षेत्र है। लेकिन कट्टर भाजपाई और संघ के प्रचारक रहे वाजपेयी वहाँ से सिर्फ इसलिए जीत जाया करते थे क्योंकि उनमें कभी उतनी कट्टरता नहीं रही। वे हमेशा शांत चित्त और धैर्यवान बने रहे और जसवंत सिंह इस प्रकरण में बार-बार उन्हें याद कर कह रहे हैं कि अगर वाजपेयी होते तो उन्हें सफाई देने का मौका दिया होता और इस तरह बेइज्जत करके नहीं निकाला जाता। वाजपेयी का कद इसलिए भी बड़ा था क्योंकि उन्होंने पार्टी के भीतर कभी राजनीति नहीं की और सभी लोगों को बराबर मानकर अपने साथ रखा। आज जबकि राजनाथ सिंह और अरुण जेटली भयानक राजनीति कर रहे हैं, और पहले उमा भारती अब जसवंत सिंह जैसे पुराने पार्टी दिग्गज एक-एक करके पार्टी से निकाले जा रहे हैं। वसुंधरा राजे को भी हाशिए पर डालने की तैयारी है। जार्ज फर्नांडीस पहले ही कहीं उड़ा दिए जा चुके हैं, तब वाजपेयी की याद आना लाजमी है। वाजपेयी इन सबको रोके रखने में सक्षम थे। वो ममता बनर्जी, जयललिता और मायावती सरीखी आग का शोला रूपी महिला नेताओं को भी अपने साथ जोड़े रखते थे। उनकी लोकप्रियता इतनी जबरदस्त थी कि नितांत बंगाली, मराठी, मलयाली या कन्नड़ क्षेत्रों में भी लाखों की संख्या में जनता उन्हें सुनने आती थी।

जसवंत की दूसरी टीस यह भी है कि इसी जिन्ना की वजह से आडवाणी भी मुसीबत में फँसे थे लेकिन उनका सिर्फ भाजपा अध्यक्ष का पद गया जबकि उन्हें एक फोन कॉल कर राजनाथ सिंह ने उनकी पार्टी से ही निकाल दिया। उस पार्टी से जिसके वो संस्थापक सदस्य थे और जिसमें उन्होंने 30 साल दिए थे। जसवंत सिंह के अनुसार उनके साथ ऐसा व्यवहार किया गया जैसा कि किसी चपरासी के साथ भी नहीं किया जाता। जसवंत सिंह की बात सही है, लेकिन अब मंथन का समय भाजपा और उसके पितृ संगठन आरएसएस का है कि ऐसा क्या हो रहा है कि इन लोगों की जमीन खिसक रही है, जनाधार कम हो रहा है और ये खिसियाकर बौराए जा रहे हैं। इस सबमें मजे की बात यह है कि पार्टी के दो शीर्ष लोगों (आडवाणी और जसवंत सिंह) को मुसीबत में डालने का काम उस जिन्ना ने किया है जिसकी दशकों पूर्व मौत हो चुकी है और जो मरने से पहले यह कह गया था कि पाकिस्तान बनवाना मेरे जीवन की कुछ सबसे बड़ी गलतियों में से एक रहा। अब उस जिन्ना का भूत भाजपा के लिए नित नए गड्ढे खोद रहा है और वो उन गड्ढ़ों में लड़खड़ाकर गिर भी रही है। फिलहाल इस कठिन समय में भाजपा को मार्गदर्शन देने वाला वाजपेयी जैसा कोई दूरगामी सोच वाला शीर्ष पुरुष मौजूद नहीं है (वाजपेयी जी का स्वास्थ्य ऐसा नहीं कि वे किसी से बोल-सुन सकें)। इस समय में पार्टी को खुद ही अपनी करनी से उबरना होगा। लेकिन जसवंत सिंह प्रकरण के बाद पार्टी को नुकसान होना तय है। फिलहाल तो लोकसभा चुनावों में पहले ही अपनी दुर्दशा करवाने वाली भाजपा का इस कठिन समय में कोई खेवनहार दिख नहीं रहा।

आपका ही सचिन...।

August 20, 2009

चटकती दरकती भाजपा की मानसिकता


मुस्लिम वोट बैंक का पीछा करना छोड़ना होगा

भाजपा ने अपने संस्थापक सदस्यों में से एक जसवंत सिंह की छुट्टी कर दी। जसवंत सिंह भाजपा में अटलबिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के साथ शुरूआत के समय से हैं और वर्तमान में इसकी बागडोर संभाले हुए अरुण जेटली और राजनाथ सिंह उनके सामने बच्चे हैं। लेकिन जसवंत सिंह की लिखी एक किताब उनके तीस साल पुराने रिश्ते खा गई। ये तीस साल पुराने रिश्ते भाजपा के साथ वाले हैं। जसवंत सिंह जी ने जिन्ना के फेवर में बोल दिया था। यह उनके सठियाने (हालांकि वो हैं अस्सी के आसपास) की निशानी भी मानी जा सकती है। आडवाणी जी इस निशानी को कुछ साल पहले तब जाहिर कर चुके थे जब वे पाकिस्तान में जिन्ना की मजार पर गए थे। वहाँ उनकी ऐसी जुबान फिसली कि भाजपा का अध्यक्ष पद हाथ से गया और वे उस घटना की अभी तक माफी माँग रहे हैं। सठियाए दोनों ही, बस फर्क इतना रहा कि आडवाणी जी बच गए और जसवंत सिंह जी निबट गए।

लेकिन दोस्तों, ये अजीब वाक्या क्यों घटित हो रहा है समझ नहीं आ रहा। भाजपा को जिन मूल मुद्दों पर रहकर अपना स्थान बनाने की कोशिश करनी चाहिए वो उससे सरके जा रही है। वो बार-बार मुस्लिमों को रिझाने की कोशिश करती नजर आती है। अगर उसे यह करना ही है तो पहले उसे अपना अतीत याद करना चाहिए। भाजपा का स्थान देश की राजनीति में तय ही हिन्दुत्व के आधार पर हुआ है। 1992 में गिरे बाबरी मस्जिद ढाँचे में उसकी भूमिका अहम है और उसे यह भूल जाना चाहिए कि आने वाली कई शताब्दियों तक मुस्लिम उसे वोट देने की गलती से भी सोचेंगे। मुसलमान भाजपा से चिढ़ते हैं, आरएसएस से चिढ़ते हैं और हर उस शख्स से चिढ़ते हैं जो इनसे जुड़ा हुआ हो। भाजपा में दो मुसलमान चेहरे हैं, मुख्तार अब्बास नकवी और शाहनवाज हुसैन। लेकिन भारत की मुस्लिम जमात इन्हें मुसलमान ही नहीं मानती। अगर ये उनके हत्थे चढ़ जाएँ तो भारतीय मुसलमान इन्हें मार ही डालें। भाजपा से जुड़े इन मुसलमानों से मुस्लिम जमात हद दर्जे तक चिढ़ती है। दूसरा उदाहरण मशहूर शायद बशीर बद्र का दिया जा सकता है। वो भाजपा से जुड़े। उनके मोहल्ले में रहने वाले मुसलमानों ने उनका सोशल बॉयकॉट करना शुरू कर दिया। इतना ही नहीं, उनके घर परिवार के बच्चों के साथ कोई बच्चा खेलता तक नहीं था, यह कहकर कि ये तो भाजपा वाले हैं। उनका बहुत टोरचर (मानसिक रूप से प्रताड़ित) किया गया। साधारण मुसलमान जो भाजपा के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ से जुड़ा हुआ है, को भी अपनी खाल बचाकर रखनी पड़ती है। उसे दरअसल मुस्लिम जमात द्वारा धर्म विरोधी माना जाता है।

एक अन्य उदाहरण देना चाहूँगा। इंदौर में एक कॉलोनी है जो मुस्लिम बहुल है। गत वर्ष मध्यप्रदेश में हुए विधानसभा चुनावों में इस कॉलोनी से भी वोटिंग हुई। यहाँ से 1600 वोट पड़े। लेकिन आपको जानकर आश्चर्य हो सकता है कि इनमें से मात्र 3 वोट ही भाजपा को गए। अगर कॉलोनी के रहवासियों को पता चल जाए कि वो तीन वोट कौन से लोगों ने डाले तो उन तीनों की तो समझिए शामत ही आ जाए। यही कारण है कि मुस्लिम वोटों को मुस्लिम वोट बैंक कहा जाता है क्योंकि ये किसी एक पार्टी को थोकबंद पड़ते हैं। भाजपा हर बार गफलत में रह जाती है। किसी पार्टी को अपनी पार्टी लाइन से नहीं भटकना चाहिए। अगर आपको सेक्युलर रहना है तो वह रहिए और नहीं रहना है तो फिर वैसा ही कीजिए...बीच का रास्ता खोजते हुए तो भाजपा बहुत ही साधारण तरीके से दरक जाएगी। इन चुनावों में हमने देख लिया कि भाजपा की राष्ट्रीय स्तर पर फजीहत क्यों हुई। वरुण गाँधी ने उत्तर प्रदेश में आग उगली। लेकिन भाजपा ने उससे अपने को अलग कर लिया। अरे अगर आपने उस व्यक्ति को टिकट दिया है तो पहले ही उसे समझा देना चाहिए था कि क्या बोलना है और अगर बोल दिया तो उसके साथ रहना था। पता चला कि भाजपा उत्तर प्रदेश में मुसलमानों को सीधे तौर पर नाराज नहीं करना चाहती थी क्योंकि वहाँ उनकी संख्या बहुत ज्यादा है। लेकिन भाजपा को ना माया (सत्ता) मिली ना राम मिले। अब वो झूल रही है, उसपर से उसके कुछ सबसे बुजुर्ग नेता सठियाकर कुछ भी उल्टा सीधा बोल रहे हैं जिससे जनता को लग रहा है कि ये अपने स्टेण्ड पर टिक ही नहीं पा रही।

उत्तरप्रदेश में दो अन्य राजनीतिक पार्टियों बसपा और सपा ने अपने स्थाई स्टेण्ड (विचारधारा) से मुसलमानों को अपने हक में किया और अब मुस्लिम वहाँ कांग्रेस को थोकबंद वोट नहीं देते। वहाँ के मुसलमान बाबरी कांड के समय से ही दिल ही दिल में कांग्रेस से भी खफा हैं। उन्हें लगता है कि उस समय केन्द्र में बैठी कांग्रेस चाहती तो वह हादसा रुक सकता था लेकिन उनके पास आप्शन नहीं था। जब सपा और बसपा रूपी आप्शन उनके सामने आए तो उन्होंने कांग्रेस से किनारा कर लिया। मुसलमान कांग्रेस को सिर्फ इसलिए वोट देते हैं ताकि भाजपा सत्ता में नहीं आ पाए, लेकिन भाजपा को यह बात समझ ही नहीं आती। उसको समझ लेना चाहिए कि अगर कोई दूसरा आप्शन सामने आया तो मुसलमान कांग्रेस छोड़कर उसे चुन लेंगे लेकिन भाजपा को कभी नहीं चुनेंगे। इसलिए भाजपा की मुस्लिमों को रिझाने की कोई भी रणनीति कभी काम नहीं आनी वाली।

जिन्ना ने पाकिस्तान नाम का एक ऐसा नासूर हमारे सामने पैदा कर दिया कि हम पिछले 62 सालों से उससे जूझते हुए अपने को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। अगर आज वो नहीं होता तो हमारी तरक्की की राह कहीं अधिक तेज होती। तमाम आतंकवाद और हिंसा पाकिस्तान ने हमें तोहफे में दी। बँटवारे के समय ही लाखों लोग काट डाले गए। यह सब उस जिन्ना की ही वजह से हुआ। लेकिन जसवंत सिंह हैं कि मान ही नहीं रहे। जिन सरदार वल्लभ भाई पटेल को भाजपा अपना हीरो बताती रही है जसवंत सिंह ने उन्हें भी विलेन बना डाला। ऐसे में भाजपा की अंदरूनी बातों को छोड़िए आम भारत का नागरिक क्या सोचेगा। कि इस पार्टी का स्टेण्ड ही अभी तक तय नहीं हो पाया है। इस लोकसभा चुनावों में भारत की जनता ने बता दिया कि उन्हें एक ही स्टेण्ड वाली पार्टी चाहिए जो देश की तरक्की को ही मुख्य माने। भाजपा का राम मंदिर अलाप फुस्स हो चुका है और अब अगर वो मंदिर की बात करेगी तो लोग उसपर हँसेंगे। अब भाजपा को अंदरूनी कलह से उबरकर अपना स्थाई स्टेण्ड रखकर सिर्फ देश की तरक्की पर ध्यान देना चाहिए नहीं तो वो भारत-पाकिस्तान, हिन्दू-मुसलमान करती रह जाएगी और देश में तेजी से बढ़ रही तरक्की पसंद जनता उसे धीरे से किनारे लगा देगी और कांग्रेस बार-बार इसी तरह सत्ता में रिपीट करती रहेगी जैसा कि उसने इस बार किया।

आपका ही सचिन.....।

August 19, 2009

हमारी मर्जी से नहीं बरसेगा पानी

बुरे वक्त के लिए सहेजकर रखना सीखना होगा

सचिन शर्मा
21वीं सदी की सबसे बड़ी समस्या पानी है। यह बात इस वर्ष हमें अधिक अच्छे से इसलिए समझ आ रही है क्योंकि अभी तक देश भर में 65 फीसदी बारिश कम हुई है। सिर्फ इस वजह से ही पहले से सिर चढ़ी हुई मंदी अधिक गहरा गई है। उस पर से तुर्रा यह कि मंदी के साथ-साथ महँगाई भी बढ़ रही है और आम आदमी की कमर तोड़े दे रही है। मंदी, महँगाई और बारिश के बीच संबंध को समझने के लिए हमें उसी गणित को समझना होगा जो बाघ और बैंगन के बीच संबंध को समझाता है।

पानी की अहमियत को बताना तो सूरज को दिया दिखाने जैसा ही है, लेकिन स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी हमारी सरकारों ने इस विषय में बातें अधिक और काम कम किया है। पिछले एक दशक से हम नदी जोड़ परियोजना के बारे में सुन-समझ रहे हैं। लेकिन ये नदियाँ फिलहाल कागजों पर ही बह और जुड़ रही हैं। जिस साल बारिश ठीक-ठाक होती है, हम प्रसन्न हो जाते हैं। जिस साल बारिश कम होती है वह साल हमारा रोते-गाते हुए बीतता है, हम अपनी सारी असफलताओं (मसलन महँगाई, कम उत्पादन, किसान आत्महत्या आदि) का ठीकरा इन्द्र देव पर फोड़ देते हैं। जिस वर्ष बारिश जरूरत से ज्यादा हो जाए यानी बाढ़ जैसी स्थिति बन जाए वह साल भी हमारा हैरानी-परेशानी और पानी के प्रकोप को कोसते हुए बीतता है।

हमारे देश का आम आदमी चाहता है कि उसके शहर में इतना पानी पड़ जाए कि उसके पीने के लिए पर्याप्त रहे। मसलन 20 से 30 इंच के बीच। कई बार आपने लोगों को कहते हुए भी सुना होगा कि बारिश धीरे-धीरे होनी चाहिए ताकि पानी जमीन में अच्छे से पैठ जाए। 30 से 40 इंच बारिश होनी चाहिए ताकि अगली गर्मियों में पानी की किल्लत महसूस नहीं हो। अगर किसी रोज ज्यादा पानी गिर जाता है तो लोग परेशान हो जाते हैं। उनकी गाड़ियाँ बंद हो जाती हैं, जनजीवन रुक जाता है और वे दुआएँ मनाने लगते हैं कि बस, अब बहुत हुआ। बारिश बंद हो जानी चाहिए हम लोग ऑफिस नहीं पहुँच पा रहे हैं।

हमारे देश के किसान भी आम आदमी की तरह ही हैं। वे चाहते हैं कि एक निर्धारित समय पर निर्धारित बारिश हो ताकि उनकी फसल अच्छे से पनप सके। अगर किसान छत्तीसगढ़ या झारखंड का है (वहाँ धान की खेती होती है) तो उसे 40 से 50 इंच के बीच बारिश चाहिए। किसान के लिए अगर कम बारिश होगी तो बीज तथा पौधे सूख जाएँगे, ज्यादा बारिश होगी तो गल जाएँगे, उनमें कीड़े लग जाएँगे। इसलिए हम हमेशा भगवान से यही चाहते हैं कि हमारी मर्जी के अनुसार ही पानी बरसे। ना कम, ना ज्यादा। ठीक हमारी अपेक्षा अनुसार।

आशावादी होना बुरा नहीं है लेकिन प्रकृति को अपने ढंग से चलाना किसी के बस की बात नहीं। आज भी भारत के ज्यादातर शहरों में आजादी से पहले बने बैराज, बाँध और तालाब बने हुए हैं। आजादी के बाद जो प्रयास हुए हैं वो बेतहाशा बढ़ी जनसंख्या के लिहाज से कम ही हैं। पिछले दो दशकों से पानी की जो अभूतपूर्व कमी शहर देख रहे हैं वो दिनोदिन बढ़नी ही है। तेज बारिश के बाद सड़कों पर बहते पानी को देखकर हमेशा मन से एक ठंडी आह निकलती है। काश, वो पानी अगली गर्मिंयों के लिए हम बचा पाते।

जब भी किसी बैराज या बाँध के साइफन चालू होते हैं तो उनकी खूबसूरती देखने से ज्यादा मन यह सोचकर परेशान हो उठता है कि काश, इस बाँध की गहराई कुछ और ज्यादा होती। ज्यादातर महानगरों में अब तालाब नहीं बचे। जहाँ बचे हैं वहाँ पुराने स्टेट टाइम (आजादी से पहले जब राजा-महाराजाओं का राज हुआ करता था) के तालाबों की चैनल व्यवस्था है और वो भी अतिक्रमण का शिकार हैं। शहरों के बीच से बह रही नदियाँ नालों में तब्दील हो चुकी हैं। सरकारें बेतहाशा बढ़ती जनसंख्या और नालों पर जमे अतिक्रमणकारी वोटरों के दबाव में चुप रह जाती हैं।

भारत जैसे विशाल भू-भाग तथा विशालतम आबादी वाले देश में पानी के संकट को जिस तरह से अनदेखा किया जाता है वैसा उदाहरण कम ही देखने को मिलता है। इसका खामियाजा भविष्य में क्या होगा इस पर आमतौर पर बहसें चलती रहती हैं, लेकिन ये बहसें भी अच्छे मानसून की आमद पर दफन हो जाती हैं। लेकिन इस बार ये साल भर चलती रहेंगी, क्योंकि बादलों ने हमें ठेंगा दिखा दिया है। शहरों में चौड़ी सड़कें बनाने के लिए जिस तरह से हरे-भरे पेड़ों को निर्लज्जता के साथ काट दिया जाता है उस समय भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी भी यह छोटी-सी बात नहीं समझ पाते कि वो उस शहर से बादलों और बारिश को विमुख करने की दिशा में बढ़ रहे हैं। किसी शहर में जितने लोग रहते हों उतने ही पेड़ होने चाहिए लेकिन वर्तमान हालात क्या हैं ये बताने की जरूरत नहीं।

इस बार मध्यप्रदेश में बाँधों के विकास के लिए 379 करोड़ विश्व बैंक ने मंजूर किए हैं। इस रकम से 50 बाँधों का उद्धार किया जाएगा। लेकिन यह भविष्य के गर्भ में ही छिपा है कि उन बाँधों का कितना उद्धार हो पाएगा। एक ओर जहाँ अरब देशों में सड़कों के नीचे बड़े-बड़े पानी के टैंक बनाकर उसे वाप्षीकृत होने से बचाया जाता है वहीं हमारे देश में सूख रहे जल स्रोतों में जमा थोड़ा-बहुत जल भी सूरज की भीषण गर्मी से उड़ जाता है। हम ऐसी समस्याओं पर कभी ध्यान नहीं देते। बाँधों की मरम्मत और नए बाँधों के निर्माण की इस देश में कैसी गति है यह हम जानते हैं। इंदिरा सागर और सरदार सरोवर जैसे बाँधों को बनने में दशकों का समय लग गया। नए बाँध बनने शुरू होते नहीं हैं कि उससे पहले विस्थापितों के हिमायती सामने आ जाते हैं और काम अटक जाता है।

ओंकारेश्वर बाँध परियोजना इस मामले को लेकर कई बार अटकी। उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश के बीच केन और बेतवा नदियों के जोड़ को लेकर समझौता हुआ था। खुद प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह वहाँ मौजूद थे। दोनों प्रदेशों के तत्कालीन मुख्यमंत्रियों मुलायमसिंह यादव और बाबूलाल गौर ने 25 अगस्त 2005 को इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। लेकिन इस नदी जोड़ परियोजना का 4 वर्षों में क्या हुआ, किसी को नहीं मालूम।

मध्यप्रदेश के भिण्ड जिले के अटेर क्षेत्र में कनेरा सिंचाई परियोजना को शासन से स्वीकृति मिलने में ही 25 साल लग गए। इस परियोजना से लगभग 100 गाँवों को लाभ मिलने वाला है। इन उदाहरणों से समझा जा सकता है कि देश में योजनाएँ लागू होने की दर इतनी धीमी है कि सरकारें बदल जाती हैं, लेकिन ढर्रा नहीं बदलता। अभी तक पानी को लेकर कोई केन्द्रीयकृत नीति नहीं बन पाई है जबकि वर्तमान समय में इसकी सख्त और तुरंत जरूरत है।

नदी जोड़ परियोजना में एनडीए की वाजपेयी सरकार ने जितनी दिलचस्पी दिखाई थी बाद की सरकार में उस मामले में उतनी ही उदासीनता दिखाई दी। अब मौसम बदल रहा है। बादल हमारा साथ छोड़ रहे हैं। समय है कि जितना पानी पास में है उसे ही बचाकर रखा जाए, हौले से सहेजा जाए नहीं तो देश की आबादी के पास प्यासा तड़पने के सिवा और कोई चारा नहीं रह जाएगा।

August 18, 2009

न्यूज चैनल्स के न्यूज रूम और राखी सावंत

दर्शकों पर मुझे तरस आता है
मित्रों, राखी सावंत का स्वयंवर खत्म हो गया। बात पुरानी हो गई। लेकिन इस पागल लड़की का चेहरा अचानक मैंने आज किसी न्यूज चैनल पर देख लिया। वो बता रहा था कि अब वे बच्चे पालेंगी। हालांकि यह खबर भी पुरानी है लेकिन शायद फॉलोअप चल रहा होगा। इस फॉलोअप को देखकर मेरे तन-मन में आग लग गई। राखी के तथाकथित स्वयंवर को देखने वाले और दिखाने वाले पहले दिन से ही जानते थे कि ये वाहियात लड़की किसी से शादी-वादी नहीं करने वाली। अगर ये राजी हो भी जाए तो उससे ढंग के लड़के शादी नहीं करेंगे। लेकिन इस सबके बावजूद यह शो चला, इसे दर्शक भी मिले और सबसे बड़ी लेकिन दुखदायी बात कि हमारे देश के घटिया टीआरपी बटोरू और विज्ञापन जुगाड़ू न्यूज चैनल्स ने इसके बारे में जरूरत से ज्यादा दिखाया। इन न्यूज चैनलों को दर्शकों को राखी की नाभि दिखाने में ही मजा आता है। रियेलिटी शो की रियेलिटी क्या होती है इसके बारे में बताने की जरूरत नहीं। हम सब जानते हैं। इसपर मैं पहले भी लिख चुका हूँ लेकिन अब तो गुस्सा दर्शकों पर आता है। अरे अगर दर्शक किसी शो का बहिष्कार कर दें तो क्या मजाल न्यूज चैनल वाले और खुद शो दिखाने वाले एनटरटेनमेंट चैनल का कि वो उसे लेकर दर्शकों को झिलाते रहें। लेकिन हम आजकल चुप रहकर बैठना सीख गए हैं।

दोस्तों, मैंने न्यूज चैनलों के न्यूज रूम की बात की है। तो उन न्यूज रूम का बस नाम ही न्यूज रूम रह गया है। दरअसल वो तो सब 'न्यूड रूम' हैं। अश्लील कार्यक्रम दिखाएँगे (मसलन बालीवुड), नहीं तो हँसी के कार्यक्रम दिखाएँगे (जिन्हें देखकर रोना आता है), नहीं तो अपराध दिखाएँगे। कोई काम की चीज नहीं दिखाएँगे। बीच में एक और रियेलिटी शो शुरू हुआ। इस जंगल से मुझे बचाओ। विदेशी रियेलिटी शो की तर्ज पर। लेकिन भारतीय संस्करण शर्मनाक था। नंगी लड़कियों को जंगल में एक वाहियात और नकली झरने के नीचे नहाते दिखाया गया इसमें। कमाल है यार, इतनी तरक्की कर ली हमने, लेकिन नकल करने की भी अकल नहीं आई। जंगलों के ऊपर जो रियेलिटी शो एएक्सएन, डिस्कवरी, नेटजियो या एनिमल प्लेनेट पर बनते हैं उसके बाल बराबर भी नहीं था ये। बस लफ्फाजी करवा लो, गालियाँ सुनवा लो, बीच-बीच में टूँ-टूँ की आवाज सुनवा लो, अरे यार दो ना गाली, क्योंकि इन सीरियलों को देखना गाली खाने से कम नहीं है। इससे हमें पता चलता है कि भारतीय मीडिया और ऐसे शो मेकर दर्शकों को मूर्ख ही समझते हैं।

राखी सावंत के फर्जी स्वयंवर के बारे में न्यूज चैनलों ने देश के सैंकड़ों अहम घंटे बर्बाद कर दिए। इस देश की 110 करोड़ की आबादी है। विकराल समस्याएँ हमारे आगे मुंह बाए खड़ी रहती हैं, लेकिन इन दो कौड़ी के न्यूज चैनलों को वो सब नहीं दिखता। उन्हें सिर्फ माँस दिखता है। हिराइनों के नितंबों के रूप में, कमर या उरोजों पर जमा हुआ या हीरो-हिरोइनों के मुखड़ों पर। बाकायदा दोपहर में तो टीवी सीरियलों के ऊपर तथा सुबह-शाम फिल्मों के ऊपर न्यूज चैनल्स मसाला कार्यक्रम दिखाते हैं। कई बार तो प्राइम टाइम का 'विशेष' भी इसी के इर्द-गिर्द घूमकर चकरघिन्नी हो जाता है। चमड़ी का यह कैसा मायाजाल कि असल मुद्दे परदे के पीछे समाते चले जा रहे हैं। आम आदमी हैरान-परेशान है लेकिन देश के कमजोर चरित्र के मीडिया को वह सब नहीं दिखता। एनटरटेनमेंट चैनल विलेन महिलाओं से लबालब सीरियल बना रहे हैं और न्यूज चैनल उनकी हाँ में हाँ मिलाते हुए उनके प्रोमो, प्रमोशन इवेंट और उनपर विशेष कार्यक्रम दिखा रहे हैं। यह सब बताता है कि न्यूज चैनल हमारे देश में दरअसल नॉन न्यूज हैं, फर्जी हैं, टेलेंट विहीन हैं और 24 घंटे के नाम पर सिर्फ टाइम पास कर रहे हैं। तभी तो कभी इन्हें रावण और श्रीलंका याद आ जाते हैं, तो कभी कोई उड़नतश्तरी दिख जाती हैं, कभी कोई ऐसा आदमी मिल जाता है जो मरकर फिर से जी उठा हो। दर्शकों को ऐसे चैनल्स का बहिष्कार करना चाहिए नहीं तो यह धमकी देना चाहिए कि ऐसे चैनलों पर विज्ञापन देने वाली कंपनियों के प्रोडक्ट वह नहीं खरीदेंगे, ऐसे में उन चैनलों के विज्ञापन बैठ जाएँगे और उनका भट्टा भी देर-सबेर बैठ जाएगा। इससे उनको कम से कम कुछ सबक तो मिलेगा।

रियेलिटी शो के नाम पर इतना रुपया बर्बाद करने वाले मीडिया को देश की साधारण समस्याओं और आम आदमी का शो दिखाना चाहिए जो वाकई रियल होगा और देश की रियेलिटी को सामने लाएगा। लेकिन अपने मूल फर्ज से भटके हुए न्यूज चैनलों ने आम आदमी को तो अपने पर्दे से गायब ही कर दिया है। उन्हें उनका फर्ज याद दिलाना हमारी जिम्मेदारी है नहीं तो हम दर्शक सिर्फ तरस खाने के लायक रह जाएँगे और हमें सिर्फ वही दिखलाया जाता रहेगा जो हम वाकई देखना नहीं चाहते। हमें अपने को लाचार नहीं बनाए रखना है।

आपका ही सचिन........।

August 17, 2009

शाहरुख खान की जाँच में अपमान कैसा..!!

दूध का जला छाछ भी फूँक-फूँक कर पीता है
दोस्तों, अमेरिकी हवाईअड्डे पर शाहरुख खान की थोड़ी सी कड़ी जाँच हो गई। वो तमतमा गए। अरे, आखिर वो 'भारत रत्न' जो हैं। उन्हें बुरा लग गया है कि भारत में लोग उनके दर्शन करने के लिए दीवाने रहते हैं। घंटो लाइन में खड़े रहते हैं, उन्हें फिल्मों का भगवान माना जाता है। वो कैसी भी घटिया फिल्म बनाएँ लेकिन वो हिट हो जाती है, भारत में उनके लिए हजारों खून माफ हैं तो फिर ये अमेरिका क्या बला है जो उसने उनके कपड़े उतरवा लिए। आखिर 'खान' सरनेम में ऐसी भी क्या बुराई है कि उन्हें कड़ी जाँच का सामना करना पड़ा.....????

दोस्तों, शाहरुख बहुत नाराज हैं। उनकी पोपुलरटी देखकर भारत सरकार को भी उनके समर्थन में उतरना पड़ा और अमेरिका से पूछना पड़ा कि इतने बड़े स्टार की आखिर उसने बेइज्जती क्यों कर दी? लेकिन हमारे पास उसका जवाब है। मीडिया के पास भी है लेकिन वो भी पोपुलर गेम खेलने की आदी हो गई है इसलिए शाहरुख खान की तरफ से हुई बयानबाजी को तवज्जो दे रही है। असल में शाहरुख अमेरिका की नजर में कुछ नहीं है। अरे शाहरुख की क्यों, कोई भी कुछ नही है जो उस देश के लिए खतरा हो। अमेरिका में हुए 9/11 और ब्रिटेन में भूमिगत ट्रेनों में हुए विस्फोटों के बाद उन दोनों देशों में किले जैसी सुरक्षा बढ़ा दी गई। वहाँ की जाँच प्रक्रिया को इतना कड़ा कर दिया गया कि कोई भी उसे अपना अपमान समझ सकता है। ये जाँच सभी के लिए है। इसमें अमेरिका का कसूर नहीं है। उसने विश्वास किया उन चंद नौजवानों पर। सबको समान रूप से मौके देने वाले देश में कुछ बाहरी देश के मुस्लिम युवकों ने हवाईजहाज उड़ाना सीखा, फिर कुछ बड़े हवाई जहाजों को अगवा किया और उसकी महत्वपूर्ण इमारतों में घुसेड़ दिया। अब बारी उसकी है, अविश्वास करने की, तो लोगों को बुरा लग रहा है। अब उसे मुस्लिम सरनेम के सभी लोग सस्पेक्ट नजर आते हैं लेकिन वो उसकी 'दूध का जला छाछ भी फूँक-फूँक कर पीता है' वाली नीति के तहत है। दरअसल, वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के बाद अमेरिका और ब्रिटेन में मुस्लिमों और अरब देशों से आए लोगों के लिए धर्म-आधारित नियमावली तय की गई है। इसमें ऐसे यात्रियों से उनके वीजा, सामान, नागरिकता और धर्म संबंधी सवाल किए जाते हैं। ऐसे में थोड़ा संदेह होने पर भी यात्री को हिरासत में लिया जा सकता है। जबकि, भारत में ऐसे कोई नियम नहीं है। यहाँ सुरक्षा मानक लोगों के नाम और ओहदे से ज्यादा बड़े नहीं हैं। इसलिए जहाँ अमेरिका में 9/11 हादसे के बाद कोई आतंकी हमला नहीं हुआ वहीं भारत में ऐसे हमले होना रूटीन की बात हो गई है।

अमेरिका में कड़ी पूछताछ के लिए कई पैमाने बनाए गए हैं।
शारीरिक बनावट ः यदि आप मुस्लिम देशों और अरब देशों के नागरिकों की तरह दिखते हैं तो आपसे कड़ी पूछताछ निश्चित है। संदेह में सिख धर्मावलंबी दूसरे नंबर पर हैं।
नाम ः यदि आपका नाम मुस्लिम शब्दावली के अनुसार है तो सख्त पूछताछ हो सकती है। आपके टिकट पर लाल निशान लगाकर आपको अलग लाइन में खड़ा किया जाएगा जहाँ आपसे गंभीर सवाल पूछे जाएँगे।

हवाई यात्रा के दौरान होने वाली जाँच इस प्रकार रहती है ः
- हर नए नागरिक पर जीपीएस से नजर रखी जाती है।
- मुसलमान है तो जाँच सख्त करते हुए संदेह दूर करने के लिए सवाल किए जाएँगे।
- विमान में तरल पदार्थ ले जाना सख्त मना है, फिर भले ही वो दूध ही क्यों ना हो।
- दोहरे रूप में काम आ सकने वाली चीजें जैसे लाइटर, लिपिस्टक आदि प्रतिबंधित हैं।
एक्स-रे मशीन पर जूते उतारकर जाँच करवाना जरूरी है।
- करीब दो घंटे तक चलती है औसत जाँच (इतनी ही शाहरुख खान की चली थी।)
- विमान बदलते वक्त दोबारा जाँच होगी।
- लैपटॉप, कैमरे के अतिरिक्त रूमाल और पर्स की भी एक्स-रे जाँच होगी।

कौन-कौन नामचीन उलझ चुके हैं जाँच में..
जार्ज फर्नाडीज - राजग सरकार में रक्षामंत्री रहते हुए जार्ज फर्नांडीज भी जाँच झेल चुके हैं। अमेरिका के डल्स हवाईअड्डे पर उनके कपड़े भी उतरवा लिए गए थे।
एपीजे अब्दुल कलाम - कुछ माह पहले पूर्व भारतीय राष्ट्रपति श्री कलाम की अमेरिकी एयरलाइंस द्वारा ली गई तलाशी ने हाल ही में तूल पकड़ा और संसद तक में यह मामला उठा।
आमिर खान - सिर्फ मुस्लिम नाम के कारण 2002 में शिकागो हवाईअड्डे पर आमिर से करीब डेढ़ घंटे तक पूछताछ की गई। वे यहाँ अपनी फिल्म 'लगान' के प्रमोशन पर आए थे।
अजीम प्रेमजी - उद्योगपति प्रेमजी ने भी अमेरिका जाने पर हर बार सख्त जाँच किए जाने की शिकायत की है। 2002 में चार बार विमान बदलने पर उन्हें आठ घंटे जाँच में रहना पड़ा।
दक्षिण भारतीय अभिनेता ममूटी - ममूटी को अपने वास्तविक नाम मुहम्मद कुट्टी इस्माइल के कारण अमेरिकियों के सख्त सवालों का जवाब देना पड़ा था।
कमल हासन - 2002 में टोरंटो एयरपोर्ट पर सिर्फ अपने उपनाम 'हासन' के कारण उनसे पूछताछ की गई। तब अमेरिकी उच्चायोग के हस्तक्षेप पर इन्हें जाने दिया गया।

हालांकि इस मामले में भारतीय अभिनेता सलमान खान का कल दिया बयान गौरतलब है। उनका कहना है कि अमेरिका के कड़े प्रावधान ही हैं कि वहाँ 9/11 के बाद अब तक कोई आतंकवादी हमला नहीं हो पाया है। शाहरुख के मसले को हमें ज्यादा तूल नहीं देना चाहिए....लेकिन उनकी तरह से हरेक मुसलमान इसे नहीं सोचेगा और ऐसी जाँचों को अपना अपमान ही मानेगा। दूसरी ओर शाहरुख को भी यह समझ जाना चाहिए कि जब भारतीय रक्षामंत्री को अमेरिकी जाँच अधिकारियों ने नहीं छोड़ा तो वो किस चिड़िया का नाम हैं।

अब लिजलिजे देश भारत के हाल देखिए...तमाम आतंकी हमलों के बाद हम हैं कि सुधरते ही नहीं हैं, हमारे यहाँ सुरक्षा के यह हाल हैं..

- किसी यात्री से धर्म या नस्लीयता के नाम पर कोई सवाल नहीं किया जाता।
- किस आकार के बैग ले जाएँ, यह मानक अभी तय नहीं है।
- जाँच में सिर्फ तीस मिनट लगते हैं।
- नवीनतम एक्स-रे मशीन उपलब्ध नहीं है।
- विदेशी यात्रियों पर लगातार नजर बनाए रखने की कोई नई प्रणाली अब तक विकसित नहीं की गई है।
- 'विशेष' व्यक्तियों को सुरक्षा जाँच में छूट मिलती है।

(नोटः उक्त सभी आँकड़े अखबारों से जुटाए गए हैं)

दोस्तों, अमेरिका जानता है कि उसके पास कोई चारा नहीं है। तालीबान, अल कायदा सरीखे सैंकड़ों कट्टरपंथी मुस्लिम संगठन उसके पीछे लगे हैं। ये संगठन किसी को भी धार्मिक रूप से बरगलाकर कुछ भी करवा सकते हैं। ऐसे में अगर वो अविश्वास नहीं करेगा तो उसकी पीठ में सैंकड़ों खंजर घोंपे जाएँगे। यह बात उसे बर्दाश्त नहीं। वो भारत नहीं है कि बार-बार पिट-पिट कर भी यही कहता रहे कि देख लेंगे, छोड़ेंगे नहीं, अबकी बार सहन नहीं करेंगे। अरे भाई, करके दिखाना पड़ता है। शब्दों के वीरों ने कभी इतिहास नहीं बनाया, कर्मवीर और तलवारों के वीरों ने बनाया है। उसके लिए शाहरुख खान की कोई औकात नहीं है। वहाँ की सरकार को अपना देश प्यारा है क्योंकि वो जानती है कि सतर्कता और अपराधियों के खिलाफ क्रूरता ही उनका एकमात्र इलाज है। हमें अभी यह सब सीखना है।

आपका ही सचिन....।

August 14, 2009

क्या मुझे हिन्दू की औलाद समझा है..??


पाकिस्तान की जनता सिर्फ नफरत केन्द्रित है
क्या मुझे हिन्दू की औलाद समझा है जो मैं तुझसे डर जाऊँगा। क्या मैं तुझे डरपोक लगता हूँ, क्या मेरी शक्ल हिन्दू जैसी है जो मुझे धमका रहा है......

दोस्तों, ये दो लाइनें कुछ अचंभित करने वाली हैं। लेकिन ये मैंने कुछ दिन पहले ही सुनीं। यह मुझसे किसी ने नहीं कहा। कहता तो मैं उसे निश्चित ही जूतों से मारता और बस चलता तो गोली भी मार देता। लेकिन जिस व्यक्ति ने यह सब सुना, पूरे 45 बरस तक सुना वो मुझे कुछ दिन पहले मिल गया। असल में एक सज्जन कुछ दिन पहले ही मेरे मित्र बने हैं। मैं उनके नाम का यहाँ उल्लेख नहीं करना चाहता। वो एक डॉक्टर हैं। लेकिन वो हैं पाकिस्तानी, जाहिर है वे हिन्दू हैं। लेकिन उनका जन्म पाकिस्तान के सिंध प्रांत में हुआ। उनके चार बड़े भाई हैं। वो सभी एक-एक करके भारत सैटेल हो चुके हैं। आठ महीने पहले वो भी भारत में सैटेल हो गए। जब मेरी उनसे मित्रता हुई तो मैंने उनसे पाकिस्तान, वहाँ के समाज, वहाँ की व्यवस्था, अमेरिका का प्रभाव, अमेरिकी सेना का जमावड़ा वगैरह संबंधी विषयों पर घंटो बात की। कई रोचक बातें निकलकर सामने आईं। उनमें से सबसे ज्यादा रोचक यही है कि उन्होंने इतने भयानक वातावरण और समाजिक व्यवस्थाओं में अपने जीवन के 45 साल निकाल दिए। मैंने उनकी दाद दी और कहा कि ठीक ही किया जो वो यहाँ आ गए। लेकिन यह बात सुनकर उनका मन खट्टा हो गया। उन्होंने कहा कि वे तो अपने को डरपोक ही मानते हैं जो वहाँ स्ट्रगल नहीं कर पाए और हिन्दुस्तान आ गए। वहीं जमे रहना था। लेकिन परिवार बहुत डरा हुआ था इसलिए पाकिस्तान छोड़ना पड़ा। सारा सामान समेटा और भारत आ गए। वे इससे पहले भारत सिर्फ कुछ ही बार आए थे। अपने भाईयों के पास, लेकिन यहाँ आकर भी अब वे खुश नहीं हैं। उनके अनुसार पाकिस्तान में सिर्फ 15 लाख हिन्दू हैं, लेकिन वहाँ उनकी भयंकर दुर्गति है। उनको पल-पल घुट-घुट कर जीना पड़ता है। अगर किसी बस में या चौराहे पर, या पान की दुकान पर दो मुस्लिमों की आपस में लड़ाई हो जाए तो वे इन्हीं शब्दों का उपयोग करते हैं.....क्या मुझे हिन्दू की औलाद समझा है जो मैं तुझसे डर जाऊँगा। क्या मैं तुझे डरपोक लगता हूँ, क्या मेरी शक्ल हिन्दू जैसी है जो मुझे धमका रहा है......

उनके घर में डकैती पड़ी। हिन्दू वहाँ लूट लिए जाते हैं लेकिन पुलिस उनकी रिपोर्ट तक नहीं लिखती। अल्पसंख्यकों के नाम पर भारत में मुस्लिमों को जितनी सुविधाएँ प्राप्त हैं उसकी एक फीसदी भी हिन्दूओं को पाकिस्तान में प्राप्त नहीं हैं। डॉक्टर साहब जो पाकिस्तान के साथ ही ब्रिटेन से भी पढ़े हैं, बताते हैं कि वहाँ पार्टिशन (बँटवारे) के समय की हिन्दूओं की कोठियाँ, बड़े-बड़े बंगले खाली पड़े हैं। बस्ती वाले उनमें अपने भेड़, बकरियाँ बाँधते हैं या खुद रहते हैं। बड़ी-बड़ी इमारतों का नाम भगवानदास बिल्डिंग, राधे-श्याम कॉम्प्लेक्स लिखा हुआ है। सब धीरे-धीरे खंडहर होती जा रही हैं। मंदिर तो सभी समाप्त होते जा रहे हैं, नया मंदिर बनने नहीं दिया जाता। वहाँ से हमारा इतिहास मिट रहा है। हिन्दू लड़कियाँ जबरन भगा ली जाती हैं, उनसे मुस्लिम युवक जबरदस्ती शादी कर लेते हैं, लेकिन वहाँ का समाज ऐसे युवकों का स्वागत करता है, उनके खुद भी दो बेटियाँ हैं इसलिए उन्होंने भविष्य की सोचकर पाकिस्तान को त्याग दिया। यहाँ आकर उनका कहना है कि ये पूरा हिन्दोस्तान तो नहीं लगता। यहाँ सभी धर्म के लोगों को बहुत छूट है भाई। ऐसा हरेक देश नहीं कर सकता।

दोस्तों, उनसे मेरी काफी बातें हुई थीं, जैसे-जैसे याद आती जाएँगी मैं आप लोगों को बताता रहूँगा लेकिन जो बातें मुझे अमेरिकी केन्द्रित लगीं वो रोचक हैं। वो महादेश दूर बैठे भी गिद्ध की निगाह से अपने दुश्मनों को देख रहा है, समझ रहा है और उन्हें मार रहा है।
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दोस्तों, कल की पोस्ट में मैंने आपको अमेरिका के कदम के बारे में बताया था जो उसने पिछले आठ साल में उठाए। वो मुस्लिम आबादी को कंट्रोल करने की कोशिश में लगा है। उसका शोध जारी है। मजे की बात है कि यह बात कई पाकिस्तानियों को भी पता है और वो उसके शोध में शामिल भी रहते हैं, सिर्फ पैसे की खातिर।
सबसे पहले बात अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की। बराक के पिता कनवरटेड मुस्लिम थे। यह सभी जानते हैं। बराक का पूरा नाम भी बराक हुसैन ओबामा है। लेकिन अमेरिकी जनता और वहाँ के थिंक टैंक को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अमेरिका जनता या अमेरिकी थिंकटैंक को जिस दिन यह लग गया कि ओबामा इस्लाम या अश्वेतों का पक्ष ले रहे हैं तो समझो वो गए, अपने आप किनारे कर दिए जाएँगे। क्योंकि इतिहास गवाह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति तो बदल सकता है लेकिन अमेरिकी नीतियाँ नहीं, इसी रौ में बहते हुए बराक ने ईरान के सामने दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया। मैंने सोचा ये राष्ट्रपति इतना लिबरल कैसे है..?? क्या अमेरिकी प्रशासन यह सब नहीं देख रहा। लेकिन पता चला कि पाकिस्तान में शिया आबादी मात्र 15 फीसदी है। बाकी 85 फीसदी लोग सुन्नी हैं। आपसी झगड़ों में शिया सबसे अधिक मारे जाते हैं।

पाकिस्तान की सीमा अफगानिस्तान और ईरान से लगती हैं। अफगानिस्तान पर अमेरिका का कब्जा है। ईराक पर भी अमेरिकी कब्जा है। दोनों देशों की सीमाएँ ईरान से मिलती हैं। ऐसे में अमेरिका इस बात पर जोर देगा कि मैंने तुम्हें (ईरान) को घेर तो रखा ही है, इसलिए हमारे से झगड़ा छोड़ो और पाकिस्तान को देखो जो तुम्हारे भाईयों को मार रहा है। उल्लेखनीय है कि ईरान दुनिया का एकमात्र शिया देश है। पाकिस्तान सुन्नी देश है। और सिर्फ इसी कारण ईराक और ईरान भी आपस में 8 साल तक लड़ते रहे थे। शिया-सुन्नी आधार पर। अमेरिका ने शियाओं का एक कारण से और दिल जीता है, उसने ईराक की सत्ता ली तो सुन्नियों के हाथों से (सद्दाम हुसैन सुन्नी था) लेकिन थमा दी शियाओं के हाथों में, भले ही ईराक का वर्तमान प्रशासन अमेरिका के हाथों की कठपुतली हो लेकिन वो है तो शिया ही। अगर यह बात अमेरिका ईरान को समझाने में कामयाब रहा तो वो ईरान और पाकिस्तान को आपस में लड़ाने में कामयाब हो सकता है ( विदित हो कि ईरान-ईरान का युद्ध भी अमेरिका ने ही शुरू कराया था और तब उसने सद्दाम का साथ दिया था और बाद में उसे मार भी दिया), इसके ईनाम में वो ईरान को यह आश्वासन दे सकता है कि वो इजराइल की ओर से टेंशन छोड़ दे, उसे वो संभाल लेगा। क्योंकि इजराइल पहले से ही कई मोर्चों पर व्यस्त रहता है।

दोस्तों, सिर्फ इतनी ही नहीं है अमेरिकी प्लानिंग। अमेरिका जानता है कि पाकिस्तान की अवाम उससे भयंकर नफरत करती है। इसलिए वो अंदर से उसे घुन की तरह खा रहा है। जिस दिन अमेरिका पाकिस्तान के ऊपर से अपना हाथ हटा लेगा उस दिन वहाँ सिविल वार या कहें अराजकता की स्थिति आ जाएगी। फिलहाल अमेरिका ने पाकिस्तान पर इतना प्रेशर बना रखा है कि उसकी सेना अपने भाईयों को ही मार रही है। पाकिस्तानी सेना में ऐसे-ऐसे सैनिक हैं जिनकी सीने तक की दाढ़ी है। वो पाँचों टाइम नमाज पढ़ते हैं और संसार के हर मुसलमान को अपना भाई मानते हैं, बावजूद इसके उन्हें अपने भाईयों को मारना पड़ रहा है। बहुत मजबूरी में है पाकिस्तानी सेना। दूसरी बात, कि अमेरिका की दुनिया भर के मुस्लिम देशों में रिसर्च चल रही है। ये हैल्थ डवलपमेंट या टीकाकरण के नाम पर है। ये शोध वो मुस्लिम देशों की द्रुत गति से बढ़ती हुई जनसंख्या पर कर रहा है। वो लोग चौबीसों घंटे लगे हुए हैं इसका निष्कर्ष निकालने में। मोरक्को से लेकर पाकिस्तान तक में उसका अध्ययन चल रहा है। वो जानना चाहता है उस नफरत को, जो इन देशों के मन और मानस में भरी हुई है। वो इस्लाम धर्म की इंजीनियरिंग भी समझ रहा है जिसमें अन्य किसी को भी मंजूर नहीं किया जाता। आने वाले समय में हमें उसके कदमों से इस शोध के परिणामों को समझने में मदद मिलेगी। हमें उससे सीख लेनी चाहिए क्योंकि वो कई दशकों और शताब्दियों आगे की प्लानिंग करके चल रहा है। हम वर्तमान में जीते हैं और वो भविष्य में, वो यूँ ही संसार की एकमात्र महाशक्ति नहीं है।

आपका ही सचिन......।

August 13, 2009

भारत को तोड़ना आखिर क्यों आसान है?


देश की विविधता ही हमारी दुश्मन बन रही है
दोस्तों, एक चीनी उल्लू के पट्ठे सामरिक रणनीतिकार ने कुछ दिन पहले अपनी अक्ल चला दी। उसके अनुसार भारत धर्म के आधार पर बहुत बँटा हुआ है। कई अन्य तरह से भी वहाँ भेदभाव है। इस सबका फायदा उठाते हुए चीन को अपने मित्र राष्ट्र पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और भूटान की मदद से भारतीय संघ को 20-30 टुकड़ों में तोड़ देना चाहिए। झान लुई नामक इस गधे रणनीतिकार के अनुसार चीन को असमी, तमिल और कश्मीरी जैसी विभिन्न राष्ट्रीयताओं के साथ एकजुट होना चाहिए और उनके स्वतंत्र राष्ट्र की स्थापना में सहयोग देना चाहिए। लेख में विशेष रूप से भारत से असम की स्वतंत्रता हासिल करने के लिए चीन को यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) का सहयोग करने को कहा गया है।

तो दोस्तों, यह बात मैंने आपको कोई नई नहीं बताई क्योंकि मीडिया में सबदूर यह मुद्दा आ चुका है। लेकिन उस खबर को पढ़ने के बाद कुछ बातों पर मैंने चिंतन जरूर किया। मैंने सोचा कि चीन जो सोच रहा है वो गलत नहीं है। वो जानता है कि भारत रीएक्शन देने में देरी करता है। या कहें कि रिएक्शन करता ही नहीं है। अंदर से खोखले या कहें कमजोर हो गए हैं हम। क्यों, उदाहरण के लिए चीन को ही देखिए, वो मुसलमानों को अपना दोस्त बताता है। मुस्लिम राष्ट्रों के पक्ष में खड़ा रहता है लेकिन उसके दूरस्थ पश्चिमी क्षेत्र जिनजियांग में उइगर मुस्लिमों ने जरा हल्ला मचा दिया और 15 चीनियों को क्या मार दिया, चीन ने सैंकड़ों उइगर मुसलमान मार दिए, और उस रिएक्शन को कंट्रोल करने के लिए 50 हजार सैनिकों की बटालियन उस क्षेत्र में तैनात कर दी। मजेदार बात यह है कि संसार भर के मुसलमानों को अपना भाई बताने वाले पाकिस्तान ने चीन के इस कदम का समर्थन किया और उसकी हर बात में हाँ में हाँ मिलाई। यह सब चीन के प्रेशर का कमाल है। यह ठीक उसी तरह है कि पाकिस्तान ने तालीबान खड़ा किया, आतंकवादी पैदा किए लेकिन जब अमेरिका का प्रेशर पड़ा तो उन्हीं आतंकियों और तालीबानियों को अब चुन-चुनकर मार रहा है और बैतुल्लाह मसूद के मरने की सगर्व पुष्टि कर रहा है।

बाद चूँकी अमेरिका की निकली तो उसके संबंध में सिर्फ इतना ही कि तालीबान या कहें ओसामा के अल कायदा ने उसकी दो बड़ी इमारतें गिरा दीं जिसमें 3500 अमेरिकी मारे गए। अमेरिका महाशक्ति है इसलिए उसे बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। लेकिन उसने सोच रखा था कि इस बड़े नुकसान की भरपाई भी वह बड़े तरीके से ही करेगा। आज वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की इमारतों को गिरे आठ साल हो गए हैं। इस बीच अमेरिका ने पहले अफगानिस्तान और फिर इराक पर कब्जा किया। कुल मिलाकर 15 लाख मुसलमान मारे जा चुके हैं (ये अफगानिस्तानी और इराकी नागरिक हैं, धर्म का उल्लेख इसलिए किया क्योंकि इस्लामिक दुनिया इसे इस्लाम और ईसाइयों का झगड़ा मानकर ही देख रही है)। अमेरिका ने एक दूसरा काम भी किया, उसने इन दोनों देशों पर कब्जा करके इन क्षेत्र विशेषों पर नजर रखने के लिए जमीन तलाश ली। उसे चीन से खतरा है इसलिए वो अफगानिस्तान (ठीक चीन के बगल में) में आकर बैठ गया। इरान से खतरा है इसलिए इराक में जाकर बैठ गया, उत्तरी कोरिया से खतरा है इसलिए वो ताइवान और जापान में भी जमा बैठा है। जो लोग पाकिस्तान गए हैं उन्हें पता है कि वहाँ दीवारों पर लिखा रहता है कि रूस के बाद अमेरिका और फिर हिन्दोस्तान की बारी। मतलब पाकिस्तानियों को लगता है कि उन्होंने अफगानिस्तान से रूस को अपने बलबूते खदेड़ दिया था (हालांकि उसके पीछे भी अमेरिका ही था), अब वे अमेरिका को खदेड़ देंगे और फिर भारत का सत्यानाश कर देंगे। उनकी अक्ल के अनुसार इस्लाम से टकराने वाला हरेक व्यक्ति या राष्ट्र एक ना एक दिन नेस्तानाबूद होना ही है।

दोस्तों, आप लोग यह मत समझना कि मैं विषय से भटक गया हूँ। मैं सिर्फ यह बताना चाह रहा हूँ कि अगर किसी देश (महाशक्ति, और भारत भी अपने को महाशक्ति कहता है इसलिए जिक्र कर रहा हूँ) को जरा सा नुकसान होता है तो वो उसकी भरपाई किस हद तक जाकर करता है लेकिन हमारे पास सैंकड़ों उदाहरण हैं जब हम पिटकर चुपचाप आकर अपनी माँद में बैठ जाते हैं। नेशनल जियोग्राफिक के 'जेल्ड एब्राड' सीरियल में बताया गया कि विदेशियों को अगवा करने वाले सईद नामक एक युवक ने रोहित शर्मा नाम रखकर किस तरह से विदेशियों को अगवा किया, भारत को बदनाम किया और पकड़े जाने के बाद वो जेल में जब आराम फरमा रहा था उसी दौरान अफगानिस्तान ले जाए गए हमारे अपह्रत विमान के बदले उसे भी छुड़ा लिया गया। वो उन तीनों आतंकवादियों में शामिल था जिन्हें छोड़ा गया था। हम जिन्हें पकड़ लेते हैं (अफजल और कसाब टाइप आतंकी) उन्हें ही जब हम सजा नहीं दे पाते तो चीन, इजराइल या अमेरिका जैसी बढ़-चढ़कर कार्रवाई कैसे कर पाएँगे। वो देश ऐसा कर लेते हैं इसलिए उनकी दुनिया में इज्जत है। शक्तिशाली की ही दुनिया में इज्जत होती है। शांति, प्रेम और भाईचारे की बात कमजोर लोग करते हैं। हम कैसी महाशक्ति हैं कि हमारे पड़ोस का रणनीतिकार हमें 20-30 टुकुड़ों में आसानी से तोड़ने की बात कर रहा है। दरअसल वो जानता है कि हममें इच्छाशक्ति की कमी है जिसका फायदा हमारा दुश्मन चीन उठा सकता है।

अंत में चलते-चलते...
कि दोस्तों, अमेरिका को यह समझ आ गया है कि इस्लाम अपनी आबादी बढ़ाकर दुनिया पर कब्जा करना चाहता है, अब वह उनकी जनसंख्या वृद्धि को कंट्रोल करने के उपायों में लग गया है। वो उपाय क्या हैं वो अगली पोस्ट में, लेकिन उसने यह भी जान लिया है कि पाकिस्तान या अरब देश शक्ति व रुपयों से डरते हैं। अरब राष्ट्रों को उसने शक्ति से दबा रखा है तो पाकिस्तान को रुपए के बलबूते। वहाँ वो अरबों डॉलर देता है। अगर आज वो पाकिस्तान से हाथ हटा ले तो वो भरभरा कर गिर पड़ेगा। इसी बलबूते वो भाईयों को भाईयों (मुस्लिम) से ही मरवा रहा है। यही बात चीन ने भारत के लिए भी सोची है। लेकिन हमें उस चुंदे (छोटी आँखों वाले) देश को बताना होगा कि हम पाकिस्तान सरीखे कमजोर या लालची नहीं जो आपस में लड़ मरेंगे, लेकिन यह हमें नहीं, हमारी देश की सरकार और सेना को दिखाना होगा....हमें फुफकारना सीखना होगा, विषैला नाग बनना होगा, तभी हमपर क्षमा शोभेगी...दिनकर जी ने सच ही कहा है..
क्षमा शोभती उस भुगंज को जिसके पास गरल हो,
उसको क्या जो दंतहीन, विषरहित, विनीत, सरल हो।

आपका ही सचिन...।

August 11, 2009

इमरान हाशमी और कसाब की वाजिब माँगें!


वक्त पड़ने पर इन्हें याद आ जाता है कि ये मुसलमान हैं
दोस्तों, पिछले कुछ समय से आप लोगों से दूरी बनी हुई है इसके लिए माफी। कई मुद्दे दिमाग में उमड़-घुमड़ रहे हैं लेकिन व्यस्तता की वजह से बाहर नहीं आ पाए...परंतु ये मुद्दा थोड़ा सा लेटेस्ट है। इसलिए 'मत चूके चौहान' की तर्ज पर सोचा कि फटाफट कुछ लिख डालूँ।

दोस्तों, कल ही एक खबर पढ़ी कि बालीवुड के छिछोरे हीरो इमरान हाशमी ने कहा है कि मुंबई की निब्बाना सोसायटी से उसका कोई विवाद नहीं है। उसने अपने लगाए आरोप वापस ले लिए हैं। आरोप के अनुसार इमरान हाशमी ने झोंक में कह दिया था कि सोसायटी मुंबई में उसे इसलिए एक फ्लैट देना नहीं चाह रही है क्योंकि वह एक मुसलमान है। ह..ममम..मम...कुछ-कुछ समझ आया था मुझे...

सच बताऊं तो यह तो मुझे उस दिन ही पता चला था कि इमरान हाशमी एक मुसलमान है। इस मुसलमान लड़के को मैं पिछले 5 साल से देख रहा हूँ, तब से जब से इसकी मर्डर फिल्म रीलीज हुई थी। इसके बाद यह लगभग सभी फिल्मों में लुच्चा बना, क्योंकि इसे एक्टिंग आती नहीं है। इसने बहुत सी हिरोइनों की चूमा-चाटी की (अपने मामा महेश भट्ट की शह पर और उसी की फिल्मों में), वो सभी लड़कियाँ हिन्दू थीं (उसी की भाषा में) और उनमें से कई विश्व सौंदर्य प्रतियोगिताओं की विनर भी थीं। उन लड़कियों ने भी कभी नहीं सोचा होगा कि वो किसिंग सीन एक मुसलमान के साथ कर रही हैं। इमरान नाम थोड़ा कंफ्यूजिंग इसलिए लगा क्योंकि शाहिद कपूर का नाम भी मुस्लिम है लेकिन वो हैं हिन्दू...और दूसरा वो गंजा फिल्म निर्देशक महेश भट्ट इस इमरान हाशमी को अपना भांजा बताता रहता है इसलिए भी हमें लगता था कि वो हिन्दू हो। लेकिन अचानक एक दिन हाशमी ने बच्चों की तरह चिल्ला कर कह दिया कि अरे वो तो मुसलमान है इसलिए उसके साथ भेदभाव किया जा रहा है।

मैं अमूमन ऐसे मौकों पर अचंभित रह जाता हूँ। मैं तब भी अंचभित रह गया था जब अमूमन नंगे बदन रहने वाला और अंडरवियर पहनी लड़कियों के साथ डांस करते रहने वाला सलमान खान भी काले हिरण के शिकार के समय जेल जाने के बाद अचानक मुसलमान हो गया था। (????) सलमान तब जेल में मुस्लिम गोल टोपी पहनने लगा था और बोलने लगा था कि वो अल्पसंख्यक वर्ग से है इसलिए उसके साथ ये भेदभाव हो रहा है। गजब है भाई, उस पर से तुर्रा ये कि इन दोनों मुस्लिम हीरो की माताएँ हिन्दू हैं और आज तक इनके साथ कभी धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया गया। जब सलमान जेल के बाहर आया तो उसने वो मुस्लिम टोपी अपने सिर पर से निकाल फैंकी, और अब वो पक्के तौर से अपने धर्म का पालन कर रहा है। अब सलमान अपने टीवी शो 'दस के दम' में मल्लिका शेरावत से पूछता है कि कितने प्रतिशत भारतीय स्वीमिंग पूल में तैरते समय सू..सू कर लेते हैं। वो मल्लिका से भी यह पूछ लेता है कि क्या कभी उसने स्वीमिंग पूल में तैरते समय सू..सू की है। (वाह जैसे इन दस के दम वालों ने 110 करोड़ भारतीयों से पूछ ही लिया हो कि वो क्या वाकई में स्वीमिंग पूल में सू..सू कर लेते हैं...फर्जी सीरियल है)

तो कुल मिलाकल मैं बता रहा था कि अब सलमान भूल चुका है कि वो अल्पसंख्यक वर्ग से है, ये बात अब उसे तभी याद आएगी जब वो फिर से जेल जाएगा या किसी मुसीबत में फँसेगा। संजय दत्त का उदाहरण भी मुझे याद आता है। वो टाडा में जब जेल में बंद था तो अचानक ही उसे अपनी माँ का धर्म (इस्लाम) याद आ गया था। वो वहाँ वही गोल मुस्लिम टोपी पहनकर रहता था, पाँचों समय की नमाज पढ़ता था और हमें यह बताने की कोशिश करता था कि उसकी माँ मुसलमान थी इसलिए उसे जेल में बंद कर दिया गया..।

मुझे अमूमन इस टुच्ची सोच पर गुस्सा आता था लेकिन अब हँसी आती है। देश के मुसलमानों की सोच मैं जानता हूँ और यह भी कि वो किसी को अपनी टोपी पहने देखकर ही उसे अपने जैसा मान लेते हैं , फिर भले ही भेड़ की खाल में भेड़िया ही क्यों ना हो। उनकी इस एकतरफा सोच का ही लाभ लेने के लिए ये फिल्मी सितारे या अन्य तथाकथित ओकेजनल मुसलमान ऐसी बात कर जाते हैं।

अंत में यह दोस्तों, कि कसाब को पालते हुए हमें जल्दी ही एक साल हो जाएगा। वह जेल में सभी सुविधाएँ माँग रहा है, वह राखी भी बँधवाना चाहता था, अब रोजा रखना चाहता है, अदालत उसे जल्दी ही यह सुविधा प्रदान करेगी। कसाब ने कहा है कि उसे रोजे का कार्यक्रम मुहैया कराया जाए। अगर अदालत ने यह नहीं किया तो कसाब कह देगा कि वो अल्पसंख्यक वर्ग से है इसलिए उसके साथ ज्यादती की जा रही है। उसके इस आरोप से देश भर के मुस्लिम भाई खफा हो जाएँगे, इसलिए वो यह ब्रह्मास्त्र चलाए इसे पहले ही हमें उसकी सारी बातें मान लेनी चाहिए...जय हिंद।

आपका ही सचिन...।

July 12, 2009

बापू के जीवन का दर्पण 'सेवाग्राम आश्रम'

यहाँ के कण-कण में है बापू का जीवनदर्शन

सचिन शर्मा
महात्मा गाँधी का साबरमती आश्रम (गुजरात) दुनिया भर में प्रसिद्ध है। लेकिन उतना ही प्रसिद्ध उनका सेवाग्राम आश्रम भी है जो वर्धा(महाराष्ट्र) में स्थित है। इस आश्रम की खासियत यह है कि गाँधीजी ने अपने संध्याकाल के अंतिम 12 वर्ष यहीं बिताए। वर्धा शहर से 8 किमी की दूरी पर 300 एकड़ की भूमि पर फैला यह आश्रम इतनी आत्मिक शांति देता है जिसको आप शब्दों में नहीं पिरो सकते। इस आश्रम की कई खासियत हैं। गाँधीजी ने यहाँ कई रणनीति बनाईं, कईयों से मिले और बहुतों के जीवन को नई दिशा दी। यहाँ आकर ऐसा लगता है जैसे आप किसी मंदिर में पहुँच गए हों। सबकुछ शांत और सौम्य। आश्रम को समझने पर गाँधीजी का व्यक्तित्व भी आप ही समझ आ जाता है। यह आश्रम बापू के व्यक्तित्व का दर्पण है। यहाँ आकर ही पता चल जाता है कि हम एक ऐसे महान शख्स का उठना-बैठना देख-समझ रहे हैं जिसने भारत की आजादी का नींव रखी। तो आइए देखते हैं कि कैसे हुई 'सेवाग्राम आश्रम' की स्थापना और नजर डालते हैं उसके इतिहास पर।

साबरमती से सेवाग्राम :
गाँधीजी के साबरमती से सेवाग्राम पहुँचने की कहानी भी काफी रोचक है। 12 मार्च 1930 को प्रसिद्ध नमक सत्याग्रह के लिए साबरमती आश्रम से अपने 78 साथियों के साथ गाँधीजी 'दांडी यात्रा' पर निकले थे। वहाँ से चलते समय उन्होंने संकल्प लिया था कि स्वराज्य लिए बिना आश्रम में नहीं लौटूँगा। 6 अप्रेल 1930 को गुजरात के दांडी समुद्र तट पर गाँधीजी ने नमक का कानून तोड़ा और 5 मई 1930 को उन्हें गिरफ्तार कर बिना मुकदमा चलाए यरवदा जेल में डाल दिया गया। 1933 में जेल से रिहा होने के बाद गाँधीजी देश व्यापी हरिजन यात्रा पर निकल गए। स्वराज्य मिला नहीं था इसलिए वे वापस साबरमती लौट नहीं सकते थे। अतः उन्होंने मध्य भारत के एक गाँव को अपना मुख्यालय बनाने का निश्चय किया। 1934 में जमनालाल बजाज एवं अन्य साथियों के आग्रह से वे वर्धा आए और मगनवाड़ी में रहने लगे। 30 अप्रेल 1936 को गाँधीजी पहली बार मगनवाड़ी से सेगाँव (सेवाग्राम) रहने चले आए। जिस दिन वे सेवाग्राम आए उन्होंने वहाँ छोटा सा भाषण देकर सेवाग्राम में बस जाने का अपना निश्चय गाँववालों को बताया।

यूँ हुआ सेवाग्राम का नामकरण :
आज के सेवाग्राम का नाम शुरू में सेगाँव था। इसी क्षेत्र में नागपुर-भुसावल रेलवे लाइन पर शेगाँव नाम के रेलवे स्टेशन वाला एक बड़ा गाँव होने से गाँधीजी की डाक में बहुत गड़बड़ी होती थी। अतः सुविधा के लिए 1940 में गाँधीजी की इच्छा एवं सलाह से 'सेगाँव' का नाम 'सेवाग्राम' कर दिया गया।

सेवाग्राम में विभिन्न कुटियाएँ :
सेवाग्राम में कई कुटियाएँ हैं जहाँ स्वयं गाँधीजी एवं उनके सहयोगी रहा करते थे। यह सब कुटिया अपने आप में अनोखी हैं और गाँधीजी की तत्कालीन जीवनशैली समेटी हुई हैं। उनका विवरण इस प्रकार है।

आदि निवास : यहाँ शुरुआत में गाँधीजी समेत सभी लोग रहा करते थे। तब यही एकमात्र कुटी थी। यहाँ बा-बापू के अलावा प्यारेलाल जी, संत तुकड़ोजी महाराज, खान अब्दुल गफ्फार खाँ के साथ दूसरे आश्रमवासी तथा मेहमान ठहरते थे। गाँधीजी से मिलने आने आने वाले सब नेता भी उनसे यहीं मिलते थे। 'भारत छोड़ो आंदोलन' की प्रथम सभा 1942 को इसी जगह हुई थी। 1940 के व्यक्तिगत सत्याग्रह की प्राथमिक तैयारी भी इसी जगह हुई थी।

बापू कुटी और बापू दफ्तर : इन दोनों कुटियों में गाँधीजी रहते थे तथा लोगों से मिलते थे। बापू कुटी और बापू दफ्तर बाद में बनी। आज जैसी ये दिखती हैं पहले इसके मुकाबले यह कहीं अधिक छोटी थीं। बापू दफ्तर वाली कुटी में गाँधीजी लोगों से मंत्रणा करते थे। उनकी मदद करने वाले लोग उनके दाएँ ओर बैठते थे। महादेवभाई या दूसरे मंत्री उनकी बाईं ओर बैठते थे।

बा- कुटी : आश्रम में अनेक पुरुषों का रहना तथा आना-जाना होता था। इस वजह से बा की परेशानी को देखते हुए जमनालाल बजाज ने बा की सहमति से उनके लिए एक अलग कुटी बनवा दी। आज वह बा- कुटी के नाम से जानी जाती है।

आखिरी निवास : यह कुटी जमनालाल बजाज ने स्वयं के रहने के लिए बनवाई थी। लेकिन ऐसा अवसर ना आ सका। यह कुटी अन्य कई मेहमानों के रहने के काम में आती रही।

प्रार्थना भूमि : यह आश्रम के बीचोंबीच एक बड़ी भूमि है जो प्रार्थना के लिए काम आती थी। इसपर आज भी प्राथर्ना होती है।

इन कुछ प्रमुख कुटियों और स्थानों के अलावा भी यहाँ कई स्थान हैं। इनमें महादेव कुटी, भोजन स्थान, रसोई घर, किशोर निवास, परचुरे कुटी, रुस्तम भवन, नई तालीम परिसर, गौशाला, अंतरराष्ट्रीय छात्रावास, डाकघर, यात्री निवास शामिल हैं।

गाँधी चित्र प्रदर्शनी :
आश्रम के पश्चिम में, मुख्य सड़क के उस पार स्थित गाँधी चित्र प्रदर्शनी में बापू का संपूर्ण जीवनक्रम चित्रों के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है। यह चित्र प्रदर्शनी काफी अद्भुत है और इसे जरूर देखा जाना चाहिए। इसे देखते समय बापू का पूरा जीवन आपके सामने जीवन्त हो उठेगा।

यहाँ चित्रों के अतिरिक्त बापू के जीवन में घटित घटनाओं को मूर्तियों द्वारा तथा उनके आवास आदि को प्रतिकृति के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है। इससे बापू के जीवनक्रम व कार्य को समझने व जानने में बहुत आसानी होती है।

सेवाग्राम सेवकों के लिए :
गाँधीजी एक पोथी में समय-समय पर आश्रमवासियों के लिए सूचनाएँ लिख कर रखा करते थे। पोथी के प्रारंभ में लिखा रहता था - 'सेगाँव सेवकों के लिए'। इस पोथी में बहुत ही अद्भुत बातें लिखी रहती थीं जो अनुकरणीय हैं। पेश हैं उनमें से कुछ बातें..
यह बात हम ध्यान रखें

- थूक भी मल है। इसलिए जिस जगह हम थूकें या मैले हाथ धोवें वहाँ बर्तन कभी साफ ना करें।
(दिनांक : 6.8.1936)
- मेरी सलाह है कि सब नियमपूर्वक सूत्रयज्ञ करें। उस बात में हमें बहुत सावधान रहना चाहिए।
(दिनांक 6.1.1940)
- सब काम सावधानी से होना चाहिए, हम सब एक कुटुम्ब हैं, इसी भावना से काम लेना आवश्यक है। ( दिनांक : 21.1.1940)
- नमक भी चाहिए उतना ही लेवें। पानी तक निकम्मा खर्च न करें। मैं आशा करता हूँ कि सब (लोग) आश्रम की हर एक चीज अपनी और गरीब की है ऐसा समझकर चलेंगे।
(दिनांक : 30.1.1940)

हम यह कैसे कह सकते हैं कि सेवाग्राम आश्रम मात्र को देखने से हम बापू और उनके जीवन को समझ सकते हैं। तो स्वयं गाँधीजी ने इस बारे में लिखा है।
यहाँ रहते एक बार महात्मा गाँधी ने कहा था, 'मेरा जीवन ही मेरा संदेश है'...सेवाग्राम में रहते हुए 1937 में उन्होंने कहा था..

' आप यह विश्वास रखें कि मैं जिस तरह से रहना चाहता हूँ ठीक उसी तरह से आज रह रहा हूँ। जीवन के प्रारंभ में ही अगर मुझे अधिक स्पष्ट दर्शन होता तो मैं शायद जो करता वह अब जीवन के संध्याकाल में कर रहा हूँ। यह मेरे जीवन की अंतिम अवस्था है। मैं तो नींव से निर्माण करके ऊपर तक जाने के प्रयास में लगा हूँ। मैं क्या हूँ, यह यदि आप जानना चाहते हैं तो मेरा यहाँ (सेवाग्राम) का जीवन आप देखिए तथा यहाँ के वातावरण का अध्ययन कीजिए। '

अगर वाकई कोई गाँधीजी को, उनके दर्शन को और उनके जीवन को समझना चाहता है तो उसे सेवाग्राम आश्रम जाकर जरूर देखना चाहिए। वहाँ अब भी चरखे पर सूत काता जाता है। पारंपरिकता वहाँ जीवन्त है। स्वयं गाँधीजी भी वहाँ जीवन्त हैं। आश्रम देखकर सहसा विश्वास करना मुश्किल हो जाता है कि कोई महान पुरुष इस सादगी से भी रह सकता है।

तभी तो अल्बर्ट आइन्सटीन ने एक बार गाँधीजी के बारे में कहा था - 'मैं गाँधी को हमारे युग का एकमात्र सच्चा महापुरुष मानता हूँ। आने वाली पीढ़ियाँ कठिनाई से यह विश्वास कर पाएँगी कि गाँधी जैसा हाड़-माँस का बना व्यक्ति सचमुच इस धरती पर कभी टहलता था।'

July 09, 2009

'सरिस्का' से भी नहीं लिया सबक



पन्ना प्रकरण में मध्यप्रदेश के वन विभाग ने झूठ बोला

सचिन शर्मा
मध्यप्रदेश के पन्ना टाइगर रिजर्व से बाघों का पूरी तरह सफाया हो चुका है। यह बात अब कई सरकारी एवं गैर सरकारी जाँच एजेंसियों ने अपनी रिपोर्टों में पुष्ट कर दी है। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण द्वारा गठित विशेष जाँच टीम की रिपोर्ट आने के बाद तो अब यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया है कि पन्ना टाइगर रिजर्व में अब एक भी बाघ नहीं बचा है। इस जाँच टीम ने इस बात का भी खुलासा किया है कि पन्ना में वर्ष 2002 और 2005 के बीच सर्वाधिक बाघों का शिकार हुआ। बाघों के शिकार का यह सिलसिला जनवरी 2009 तक जारी रहा जब तक पन्ना का अंतिम बाघ बचा था।

पन्ना में बाघों के गायब होने तक एक बाघ विशेषज्ञ चिल्ला-चिल्लाकर कहता रहा कि यहाँ बाघों का अस्तित्व खतरे में है और उन्हें बचाए जाने के लिए जल्दी ही कुछ किया जाना चाहिए, लेकिन उस विशेषज्ञ की बात पर मध्यप्रदेश के वन विभाग ने कोई कान नहीं धरा। यहाँ बात हो रही है बाघ विशेषज्ञ डॉ. रघु चुंडावत की। इनकी 'द मिसिंग टाइगर आफ पन्ना' नामक रिपोर्ट को भी पार्क के तत्कालीन अधिकारियों द्वारा अनदेखा किया गया और अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए बाघों की संख्या के अतिरंजित आँकड़े पेश किए गए। इस पूरे प्रकरण ने सरिस्का की याद ताजा कर दी।

चार साल पहले वहाँ गायब हुए बाघों को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर हंगामा खड़ा हुआ था। उस मामले ने इतना तूल पकड़ा था कि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह खुद रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान आए थे और उन्होंने पूरे देश के सभी प्रदेशों के वन विभागों के प्रमुखों से इस संबंध में बात की थी। उस दौरान ही राष्ट्रीय स्तर पर 'टाइगर टास्क फोर्स' का गठन हुआ था, जिसका नेतृत्व सीएसई (सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट) प्रमुख सुनीता नारायण को सौंपा गया था। बाद में उस समिति ने अपनी बहुचर्चित रिपोर्ट 'जोइनिंग द डाट्स' केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को सौंपी थी। उस रिपोर्ट में हर उस बात का उल्लेख था जो बाघों के खत्म होने के पीछे कारण बनी थी और हर उस बात का उल्लेख भी था जिसे अपनाकर बाघों को बचाया जा सकता था। यह रिपोर्ट आज भी सीएसई की वेबसाइट पर उपलब्ध है। इतना ही नहीं इस रिपोर्ट को भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून की वेबसाइट पर जाकर भी पढ़ा जा सकता है।

यहाँ सरिस्का का उदाहरण इसलिए दिया है क्योंकि वो देश की पहली ऐसी बाघ परियोजना (प्रोजेक्ट टाइगर) है, जहाँ बाघ शिकार के कारण खत्म हो गए थे। उसके बाद राजस्थान के दूसरे प्रोजेक्ट टाइगर रणथम्भौर में भी कमोबेश यही स्थिति बनी। हालाँकि वहाँ बाघ खत्म नहीं हुए थे, लेकिन उनकी संख्या 47 से घटकर मात्र 21 रह गई थी। यानी आधी से भी कम।रणथम्भौर में बाघ कम होने वाली बात भी सबसे पहले अक्टूबर 2004 में इस लेखक ने ही उठाई थी। उन 3-4 सालों में देखा गया कि कैसे वन विभाग के अधिकारी आँकड़ों की हेरा-फेरी करके जनता की आँखों में धूल झोंकते रहते हैं। पर्यटकों को यह पता ही नहीं चलता कि उन्हें जो आँकड़े बताए जा रहे हैं असलियत में बाघ उससे बहुत कम संख्या में बचे हैं।

पन्ना प्रकरण के सामने आने के बाद तो ऐसा लगा कि इतिहास ने अपने को दोहरा दिया है। वही गलतियाँ फिर से हुईं। वन विभाग के अधिकारियों ने इन दोनों प्रकरणों में सिर्फ झूठ बोला। बाघ दिखाई नहीं देने के बाद भी सिर्फ यही बताया गया कि बाघ इस जंगल में हैं और उनकी संख्या बढ़ रही है। रणथम्भौर प्रकरण के दौरान वहाँ के प्रसिद्ध बाघ विशेषज्ञ फतेहसिंह राठौड़ की संस्था 'टाइगर वॉच' ने कई बार वहाँ के वन विभाग को चेताया था कि यहाँ बाघों का शिकार हो रहा है, लेकिन अधिकारियों ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। आखिर जब मीडिया में इस विषय संबंधी खबरें छपीं तब वसुंधरा राजे की तत्कालीन सरकार की नींद खुली और उसने टाइगर टास्क फोर्स का गठन किया। इस समिति ने भारतीय वन्यजीव संस्थान की मदद से रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान में बाघों की गिनती करवाई जो आश्चर्यजनक रूप से कम निकली।

अब सरिस्का और रणथम्भौर की तरह ही पन्ना का भी हाल हुआ है और मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार की नींद भी तब जाकर खुली है, जब पन्ना टाइगर रिजर्व के सभी बाघों का शिकार हो गया है। अब पन्ना में भी भारतीय वन्यजीव संस्थान की मदद से इस पूरे प्रकरण को सुलझाने का प्रयास किया जा रहा है। कान्हा तथा बाँधवगढ़ से बाघ-बाघिनों को लाए जाने की योजना बनाई जा रही है। दो बाघिनें वहाँ लाई भी जा चुकी हैं, लेकिन बाघ ना होने की वजह से वो 'मेटिंग सीजन' होने के बावजूद भी प्रजनन करने में समर्थ नहीं हैं। 'प्रोजेक्ट टाइगर' के अनुसार देश में बाघों की हालत खस्ता है। उसकी एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले तीन सालों में 100 से ज्यादा बाघ मारे गए हैं, जिनमें से आधे तो इसी साल (2009) में मारे गए हैं। भारत के विभिन्न प्रदेशों के वन विभागों ने इतने पर भी अपना ढर्रा नहीं बदला और झूठ बोलना जारी रखा तो हमारे देश का राष्ट्रीय पशु एक दिन खत्म हो जाएगा। अगर देश में 'सरिस्का' बार-बार यूँ ही दोहराए जाते रहे तो सभी योजनाएँ धरी की धरी रह जाएँगी।

सरकारों को वन विभाग के दावों की किसी गैर सरकारी संगठन या स्वायत्त संस्था से पुष्टि कराते रहनी चाहिए ताकि वन विभाग झूठे आँकड़े पेश करने से पहले कई बार सोच ले। सरकार को 'वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट' और उसके अंतर्गत होने वाली सजाओं को भी सख्ती से लागू करना चाहिए ताकि बाघों तथा अन्य वन्यजीवों की हत्या करने वालों को यह पता चल जाए कि वो एक जघन्य कृत्य कर रहे हैं और उसकी उन्हें सख्त सजा मिलेगी। अगर प्रदेश सरकारें यह सख्त रवैया अपनाएँगी तभी वे अपने यहाँ के जंगलों और उनमें रहने वाले वन्यजीवों को बचा पाएँगी। अगर ऐसा नहीं हो पाया तो देश के जंगलों में वन्यजीव आँकड़ों में तो जीवित दिखेंगे, लेकिन असलियत में नहीं।