January 31, 2009

अमेरिका.....हमारा दोस्त या दुश्मन- दूसरा भाग

अमेरिकी शताब्दी का ब्लूप्रिंट
तो जिन दोस्तों ने मुझे पढ़ा उनका शुक्रिया। बात गंभीर थी इसलिए गंभीर लोगों ने ही इसे पढ़ा होगा ऐसी आशा है....
तो बात अमेरिका की हो रही थी और उसके ब्लूप्रिंट की...दुनिया को अपनी तरह से देखने और मोल्ड करने में जुटे अमेरिका ने अभी कुछ समय पहले भारतीय पाले में परमाणु समझौते की गुगली फैंकी थी....हमारे प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह और अमेरिका के भूतपूर्व राष्ट्रपति जार्ज बुश ने जिद करके उस समझौते को मंजूर भी कर लिया और अब यह जल्दी ही लागू होगा। उस समझौते में ऐसा बहुत कुछ था जो आम लोगों को नहीं पता था। मैंने इस संबंध में वैबदुनिया पोर्टल के विचार मंथन कॉलम में दो लेख लिखे थे....जिनके लिंक मैं आप लोगों को नीचे दे रहा हूं। इन्हें कॉपी-पेस्ट करके इंटरनेट पर पढ़ा जा सकता है। इनमें से एक का विषय -परमाणु समझौते का काला सच- और दूसरे का -पहले भारत अपने परमाणु संयंत्र तो सुधारे- था।..... अगर समय मिले तो जरूर पढ़िएगा....और अपना नजरिया भी बताइएगा.....
http://hindi.webdunia.com/samayik/article/article/0708/02/1070802049_1.htm http://hindi.webdunia.com/samayik/article/article/0708/08/1070808138_1.htm
दूसरी बात.... मैंने अमेरिका द्वारा दुनिया की आबादी को डिप्लीट करने संबंधी बात भी कही थी। मुझे इस संबंध में २७ पेज का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज मिला है। यह मेरे पास है। जिस किसी को इसमें रुचि होगी उसे ये मेल किया जा सकता है क्योंकि ये अंग्रेजी में है। इसे अमेरिका के ही एक पत्रकार ने तैयार किया है। इससे पता चलता है कि भोपाल गैस कांड क्यों हुआ था। या अमेरिका अपने रासायनिक हथियारों और जहरीली गैसों का किस प्रकार अल्पविकसित या विकासशील देशों की आबादी पर प्रयोग करता है।
तो आगे अपनी बात जारी रखता हूं...... अमेरिका एक बहुत ही रोचक देश है। २५० साल पुरानी सभ्यता....... और वहां ५० साल पुरानी वस्तुओं को एंटीक का दर्जा दे दिया जाता है, जबकि इतनी पुरानी वस्तुएँ तो आपके-हमारे घरों में मिल जाती हैं। तो...इस देश ने बहुत ही तरीके से दुनिया को कब्जे में किया है....मुख्यतः धन और फिर बल के जरिए....सबसे ज्यादा धन वह अपनी सेना को दुनिया भर में तैनात करने में लगाता है। जापान अभी तक अपनी भूमि पर उसको सहने के लिए मजबूर है। जर्मनी में भी अमेरिका की सेनाएँ तैनात हैं। तीन महासागरों में उसके सैकड़ों वार-शिप्स घूम रहे हैं। वह अफगानिस्तान में है, पाकिस्तानी सीमावर्ती इलाकों में है। नाटो के जरिए रूस के आस-पास जमा है। अफ्रीका में है और आस्ट्रेलिया में तो उसके बड़े-बड़े बेस हैं। कुल मिलाकर उसने दुनिया को घेर रखा है। अंतरिक्ष में घूम रही उसकी सेटेलाइट रूपी आंखें सभी पर नजर रखे हुए हैं। बातें पलटने में कितना माहिर है यह बताने की जरूरत नहीं..... जब पाकिस्तान के साथ था तो उसके साथ हुए हमारे युद्ध में उसकी क्या मदद नहीं की....आज उसे हमारी जरूरत है तो ऐसे बयान देता है कि भारत को लगने लगता है कि वह उसकी गुडबुक में शामिल है।
तो अमेरिकी शताब्दी के ब्लूप्रिंट वाली बात पर आते हैं...... जब अमेरिका के ट्रेड सेंटर की इमारतें गिर गई तो कुछ लोगों के मन में शक उत्पन्न हुआ कि स्टार वार्स प्रोग्राम और एंटी मिसाइल सिस्टम (इनमें कोई भी मिसाइल अमेरिका की एयरस्पेस में एंट्री करते स्वतः ही खत्म हो जाएगी) विकसित करने वाला देश कुछ हवाईजहाजों के घेरे में कैसे आ गया.....उन लोगों को बुश की नियती पर शक पहले से ही था.....तब एक ऐसी बात बाजार में आई जिसको मुस्लिम दुनिया आज भी अपने लेखन और बोलचाल में इस्तेमाल कर रही है.....कि अमेरिका ने खुद ही उन ट्रेड सेंटरों की इमारतों पर हमला करवा लिया.....उन्हें गिरवा दिया... ताकि इसके बाद उसे मुस्लिम दुनिया को घेरने और उनकी बढ़ती ताकत को कुचलने का मौका मिल जाए.....क्योंकि गिनती में इस र्धम की पालना करने वाले देश ५६ हैं.......यह बात मैं यूं ही नहीं कह रहा हूं......इन तथ्यों को बताने और इनका खुलासा करने के लिए अमेरिकी बाजार में एक किताब आई और बाद में तो उसपर हॉलीवुड ने फिल्म भी बनाई.... उस किताब और फिल्म का नाम एक ही है यानी -फैरेनहाइट ९-११ (नाइन इलेवन)...... इसमें उन सभी बातों को खुलकर बताया गया है और ऐसे कई तथ्य बताए गए हैं जो बुश की ऐसी सोच के प्रति मन में संशय पैदा करते हैं।...हालांकि मुझे इस बात में संशय है लेकिन जब अमेरिकी खुद ही संशय जता रहे हैं तो क्या किया जा सकता है।
यह तो दुनिया मानती है कि सितंबर नौ-ग्यारह के बाद दुनिया बदली है.....यह सही भी है क्योंकि उस दिन ने विश्व में अमेरिका को अपनी मनमानी करने का मौका मुहैया कराया है......उसके बाद वो अपनी आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के नाम पर जो चाहे वो करता है.....और निश्चित तौर पर दुनिया पर हावी हुआ है....... भारत को अमेरिका इस समय मित्र के तौर पर इसलिए देख रहा है क्योंकि आतंकवाद के भुगतभोगी हम लंबे समय से रहे हैं......और उसे लग रहा है कि हम उसका साथ देंगे.....लेकिन उन इमारतों के गिरने से पहले क्या उसे हमारी बातें झूठी लगती थीं????? भारत से काम निकलने के बाद उसका हमारे प्रति क्या नजरिया रहेगा, तय नहीं है.......इस बारे में बातें बहुत हैं....अमेरिका के निशाने पर भी अभी बहुत कुछ है...हालांकि बराक ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद लोग मान रहे हैं कि अमेरिका की नीतियों में बदलाव आएगा लेकिन सनद रहे कि अमेरिका का कोई भी राष्ट्रपति क्यों ना बन जाए उसकी नीतियाँ वही होती हैं जो अमेरिका के हित में हों। फिर भले ही वो राष्ट्रपति डेमोक्रेट हो या रिपब्लिकन....बिल क्लिंटन और जार्ज बुश का शासन काल हम देख चुके हैं और हमने ये भी देखा है कि उन्होंने कितनी लॉलीपॉप भारत को चूसने के लिए दी थीं। दोस्तों, इस मुद्दे पर बात आगे भी की जा सकती है....बताने के लिए अभी बहुत कुछ है। लेकिन यह सब बातें करना तभी अच्छा लगेगा जब आप लोग इस विषय में मेरा साथ देंगे......अभी बस इतना ही......बाकि बातें बाद में
आपका ही सचिन.....।

January 30, 2009

अमेरिका....हमारा दोस्त या दुश्मन-पहला भाग

२१ वीं शताब्दी को अमेरिकी शताब्दी बनाने का ब्लूप्रिंट
दोस्तों, मेरी तरफ से सब लोगों को बधाई, आखिर तमाम प्रचार के बाद बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति बन गए हैं। भारतीय भी खुश हैं क्योंकि उनकी चमड़ी के मिलते जुलते रंग का कोई व्यक्ति अमेरिका में पहली बार राष्ट्रपति बन गया है। इस बात से खुश होकर अमेरिका के एक भारतीय राजनीतिज्ञ ने आखिर ये तक कह दिया कि अगले दो दशकों में कोई भारतीय अमेरिका का राष्ट्रपति बन सकता है.....मेरी तरफ से डबल बधाई.....।
अमेरिका....अमेरिका...अमेरिका....यह शब्द सुन-सुनकर ही हमारे और आपके बच्चे बड़े हो रहे हैं...उनके ख्वाबों में है अमेरिका....सब के सब वहां जाकर आईटी इंजीनियर जो बनना चाहते हैं ( अगर यही हालत रही तो थोड़े दिन बाद भारत से चित्रकार, कलाकार, संगीतकार और अन्य विधाओं के लोग बनना बंद हो जाएंगे और हम सिर्फ अमेरिकियों के लिए आईटी चाकर पैदा करने वाला कारखाना भर बनकर रह जाएंगे)....... लोग कह रहे हैं कि अमेरिका एक ऐसा देश है जो सबको मौका देता है...वहां बिना भेदभाव के आगे बढ़ने के अवसर मिलते हैं...आप तुरत-फुरत अमीर बन सकते हैं....और....और....और भी बहुत कुछ (मेरे पास शब्द नहीं हैं).....
लेकिन भारतीय अमेरिकियों की बदौलत ही नहीं बल्कि वैसे भी बहुत हिम्मती हैं.... अमेरिका में लगभग ३२ लाख भारतीय रहते हैं....यानी अमेरिका की लगभग एक प्रतिशत आबादी भारतीय मूल की है। इनमें से ज्यादातर संपन्न हैं और भारत का नाम कर रहे हैं... लेकिन अगर आप भारतीयों की दुनिया भर में स्थिति देखें तो वे जहां भी हैं संपन्न हैं। विश्व के विभिन्न कोनों में कुल ढाई करोड़ भारतीय रहते हैं... अमेरिका और केनेडा तो हैं हीं.... इसके अलावा इनमें यूरोप के आईसलैण्ड, स्काटलैण्ड, स्पेन से लेकर अफ्रीका के केन्या, फिजी......नीचे न्यूजीलैण्ड, आस्ट्रेलिया....बगल में थाईलैण्ड, मारीशस, हांगकांग, सिंगापुर, से लेकर रूस और सबदूर भारतीय मौजूद हैं.... मुख्यरूप से गुजराती, मारवाड़ियों, पंजाबियों और सिखों ने बाहर जाकर काम करने की हिम्मत दिखाई है.....मुस्लिम अरब देशों में बहुतायत में गए हैं....आखिर किस देश ने भारतीयों को बढ़ने में मदद नहीं की...वे जहां हैं अपनी दम पर हैं और संपन्न हैं...तो भाईयों इस मामले में अमेरिका के गुण गाने हमें इसलिए बंद कर देने चाहिए......क्योंकि हमने वहां अपनी उपयोगिता सिद्ध करके दिखाई है... वह देश हमें ऐसे ही तरक्की नहीं दे रहा है...... अब तस्वीर के दूसरे रुख की बात करते हैं..इनमें से शायद कुछ बातें आप जानते हों तो शायद कुछ आपके लिए नई होंगी......अमेरिका भारत के लिए दोस्त है या दुश्मन.....यह तो काफी बाद का है....पहला सवाल है कि अमेरिका विश्व का दोस्त है या दुश्मन...???? यह क्यों कहा....? तो पहले कुछ तथ्यों पर नजर....
यह तो आपको पता ही होगा कि विश्व में सबसे रईसी और सबसे ज्यादा रईसों की संख्या भी अमेरिका के पास है.....यूएन की एक रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका के पहले पांच खरबपतियों की संपत्ति विश्व के १४९ अविकसित देशों की कुल जीडीपी से भी ज्यादा है.....धन्य है यह गोरा देश....पूरी पृथ्वी पर इतनी चौड़ी खाई तो आपको अंतरिक्ष से भी दिखाई नहीं देगी जितनी इन माइग्रेटेड लोगों ने बना रखी है.... दुनिया भूख से मर रही है और वहां दौलत का अंत ही नहीं..... अब दूसरा तथ्य........अमेरिका जब-तब दुनिया से गरीबी मिटाने का संकल्प लेता रहता है....वह गरीबी नहीं गरीबों को मिटाने की बात कर रहा है.....मेरे पास कुछ अमेरिकी विशेषज्ञों के डाक्यूमेंट्स हैं जिनसे पता चलता है कि वह दुनिया की आबादी को डिप्लीट यानी कम करने की जुगाड़ में है (इन डाक्यूमेन्टस का उल्लेख मैं अपने ब्लाग की अगली कड़ी में करूंगा और हो सका तो उसकी लिंक भी यहां उपलब्ध कराऊंगा)......आप लोगों ने शायद वाइट मैन्स बर्डन थ्योरी सुनी होगी.....इस थ्योरी का आशय है कि दुनिया को चलाने और सुधारने का भार या कहें जिम्मा इन गोरे लोगों पर है। भाई लोगों इसीलिए तो हालीवुड फिल्मों में अक्सर ये अमेरिकी (और उनके साथ ब्रिटिश) दुनिया को बचाते हुए अमूमन मिल जाते हैं.....मानसिक रूप से दिवालिए लोग हैं ये.....
अब एक और बात......ध्यान दीजिएगा.... सन २००१......जब महात्मा जार्ज डब्ल्यू बुश (जो शक्ल से भेड़िए जैसे हैं और जिन्हे बीमारी भी वहीं है जो भेड़िए को होती है यानी डिस्लेक्सिया) ने एक गोपनीय ग्रुप बनाया.....(वैसे ये और इनके बाप सीनियर बुश पहले से ही एक गोपनीय ग्रुप यानी सीक्रेट सोसायटी स्कल्स एंड बोन्स के मेंबर हैं....यह सोसायटी कितनी वाहियात है यह आपको वीकिपीडिया से पता चलेगा....कृपया जाएं और पता लगाएँ.....उसके बाद मैं उसके बारे में कुछ और भी बहुत रोचक बातें बताउंगा..) ......इस ग्रुप में कॉलेन पॉवेल और पॉल वुल्फोविट्ज (जिन्हे एक महिला के चक्कर में विश्व बैंक की अध्यक्षता खोनी पड़ी थी) शामिल थे। इस ग्रुप ने एक ब्लू प्रिंट बनाया था जिसका मुख्य उद्देश्य था.......द ट्वन्टी फर्स्ट सेंचुरी शुड बीन एन अमेरिकन सेंचुरी.....यानी २१वीं सदी अमेरिका की होनी चाहिए और किसी की नहीं......यह ब्लू प्रिंट वाली बात सामने आई ही थी कि उसके तुरंत बाद अमेरिकी वर्ल्ड ट्रेड सेंटर गिर गए......उसके बाद क्या हुआ दुनिया को मालूम है......सबसे पहले अफगानिस्तान.....फिर इराक.....अब इरान पर निगाहें और उत्तरी कोरिया को खुलेआम धमकियाँ......( मैं बता देना चाहता हूं जिस प्रकार हिन्दी फिल्में फ्लाप नहीं होती और संगीत-वितरण अधिकार बेचकर उसका रुपया पहले ही निकाल लिया जाता है....उसी प्रकार अमेरिका को किसी युद्ध में नुकसान नहीं होता.....वह अपना फायदा पहले ही निकाल लेता है....या धमकियां देकर मित्र राष्ट्रों से ले लेता है)..............
तो ट्रेड सेंटर की इमारतें गिर गई.....अमेरिका ने संसार भर के मुसलमानों को आतंकवादी घोषित कर दिया और सारे इस्लामिक राष्ट्रों की ओर निशाना साध दिया.....मुस्लिम राष्ट्र इन्हें जहां इस्लाम के खिलाफ युद्ध मान रहे हैं मेरा नजरिया इसमें दूसरा है.....अमेरिका किसी का सगा नहीं है....सउदी अरब, कुवैत का जहां वो हितैषी बनता है.....पाकिस्तान को जहां वह बगलबच्चा बनाकर रखता है.....वहीं भारत को जब तब गुगली फैंकता रहता है.....इसके बहुत सारे उदाहरण हैं...वर्तमान में चल रहा मुंबई हमले की जाँच भी इसी का उदाहरण है जिसमें हमें लगातार गुगली फैंकी जा रही है।
अब बाकि अगले ब्लाग में नहीं तो लेख की लंबाई से आप लोग बोर हो जाएंगे......विषय में रुचि आ रही है या नहीं...कृपया बताइएगा....उसी प्रकार की मेहनत इसके अगले भाग को लिखने में करूंगा......तब तक आप लोगों से विदा आपका ही सचिन.....।

January 28, 2009

उत्तर आधुनिकतावाद और विखंडन का सिद्धांत

अब संसार का समाज किसी को बड़ा नहीं बनने देगा
मित्रों, १९८० के दशक में एक किताब आई थी, उसका टॉपिक वही है जो मैंने इस लेख का रखा है यानी उत्तर आधुनिकतावाद और विखंडन का सिद्धांत...इस किताब में संसार के कई बड़े विचारकों के विचार थे, अलग-अलग देशों के समाज को लेकर...मसलन फ्रांस के देरदा उल्लेखनीय हैं क्योंकि उन्होंने कुछ बेहद ही सटीक बातें कही थीं जो आजकल हूबहू सही उतर रही हैं....
तो भाईयों इस किताब में था कि धीरे-धीरे संसार के सारे समाज ऐसा रूप धारण कर लेंगे कि वे किसी को बड़ा ही नहीं बनने देंगे यानी अब कोई बड़ा आदमी नहीं बन पाएगा...दूसरे शब्दों में आगे कोई भारत का नेता नहीं होगा...मध्यप्रदेश या उत्तरप्रदेश का नेता भी मुश्किल से ही कोई होगा....मतलब ये नेता किसी जाति विशेष का हो सकता है..मसलन यादवों का नेता उभर कर सामने आ सकता है ( आ भी रहा है), दलितों का नेता बन सकता है या किसी अन्य समुदाय या संप्रदाय विशेष का नेता बन सकता है लेकिन देश का नेता होना अब संभव नहीं जान पड़ता क्योंकि सामाजिक ढाँचा टिपिकल होगा और वो किसी को बड़ा बनने में सपोर्ट नहीं करेगा...।
तो दोस्तों उन सभी विचारकों ने १०० और २०० साल पहले ही यह अनुमान लगा लिया था कि दुनिया किस दिशा में जाने वाली है...?? वे जान गए थे कि भविष्य में टांग खिंचाई ज्यादा भयानक रूप धारण कर लेगी और तिकड़मी लोग ही आगे जा पाएँगे...नतीजा बड़े लोगों की सैकेण्ड लाइन तैयार ही नहीं हो पाएगी..आपके सामने कुछ उदाहरण रखना चाहूँगा.....
भारतीय साहित्य की बात करते हैं...पिछले कुछ वर्षों में कई बड़े लोग चले गए..निर्मल वर्मा चले गए...अमृता प्रीतम चली गईं...कमलेश्वर चले गए...त्रिलोचन जी चले गए...सब अपने जीवन के ७०, ८० और ९० के दशक में थे..अब थोड़े से कुछ बचे हैं...राजेन्द्र यादव हैं....नामवर सिंह जी हैं...केदारनाथ सिंह जी, काशीनाथ जी, रविन्द्र कालिया जी, दूधनाथ सिंह जी भी हैं...लेकिन अगले २० साल बाद कौन होगा...या कहें कि अगले दशक में ही कौन होगा..कोई सेकेण्ड लाइन ही नहीं है.....
ठीक ऐसा ही भारतीय राजनीति के साथ भी है...बड़े नेता बुजुर्ग हो चुके हैं और उनके बाद सेकेण्ड लाइन में परिवारवाद के पोषक ही सामने हैं..अपने बूते कोई बड़ा नेता बन जाएगा इसकी गुंजाइश कम ही है...ज्योतिरादित्य सिंधिया माधवराव जी के नाम पर खड़े हैं.....राहुल गाँधी क्या हैं बताने की जरूरत नहीं....मुलायम के बेटे हैं....मुरली देवड़ा के बेटे हैं और कांग्रेस की यंग किचन कैबिनेट में सभी बड़े नेताओं के बेटे-बेटियाँ ही हैं ऐसे में अपने बूते उठकर सामने आने वाला भला कौन नजर आ रहा है....??
कमोबेश ऐसी ही स्थिति लगभग सभी क्षेत्रों में है...तो यही विखंडन है और उत्तर आधुनिकता में यह होना भी सुनिश्चित है...तो जिस प्रकार आप और हम सूचना क्रांति को महसूस करते हैं, कि भई वाह पिछले दस सालों में क्या जबरदस्त क्रांति हुई है...सबकुछ बदल गया है...हवाईजहाज में बैठे हों या माउन्ट एवरेस्ट पर....आप दुनिया के संपर्क में रह सकते हैं और वो भी नितांत आसानी से....सब कुछ आपकी अंगुलियों की टिप्स पर है लेकिन जब बात सामाजिक परिवर्तन की होती है तो यह कई सालों में, दशकों में, बल्कि शताब्दियों में यह धीरे-धीरे होता है इसलिए हमें नजर नहीं आता या कहें कि हम समझ नहीं पाते.....
लेकिन मैं अपने सुधि भाईयों से यह अपेक्षा करता हूँ कि यह विखंडन हम जरूर देख-समझ रहे हैं....दुनिया की जिस टेढ़ी चाल को हम रोज कोसते हैं वही परिवर्तन है और शायद आपको और हमको इसे महसूस करना चाहिए क्योंकि इसका कयास तो काफी पहले ही लग चुका है....कई बार हमें इसे समझना चाहिए और इसके मजे भी लेना चाहिए कि हम इस बड़े वक्त के परिवर्तन के साक्षी बन रहे हैं। हालांकि यह वक्त लोगों के लिए उतना अच्छा नहीं होगा...रुपयों से जुड़ी तरक्की के लेवल पर हो सकता है लेकिन सैद्धांतिक और संस्कारित तौर पर तो नहीं ही होगा लेकिन फिर भी हमें इसमें जीना है....
आपका ही सचिन.....।

January 27, 2009

इंसान से ज्यादा कीमती, रईसों के कुत्ते..!!

जिनके पास रुपया है उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि खर्च कहाँ करें? आज एक खबर पढ़ी...कि दिल्ली में डॉग पार्लर यानी कुत्तों को सजाने-संवारने की दुकानों का चलन काफी बढ़ गया है। इस चलन ने पिछले कुछ वर्षों में अधिक जोर पकड़ा है।... इस शहर में रईस अपने कुत्तों को इन पार्लरों में लेकर आते हैं और एक सत्र यानी एकाध घंटे के एक हजार रुपए से लेकर बीस हजार रुपए तक अपने कुत्तों पर खर्च कर देते हैं। कुत्तों के मालिक चाहते हैं कि उनका कुत्ता किसी रॉक स्टार से कम ना दिखे और इसके लिए वो उसे शैंपू से नहलवाते हैं। उनका हेयर कट, मसाज और पॉ यानी पंजों की मालिश आदि करवाते हैं.....??? 
दोस्तों, मैंने जबसे इस खबर को पढ़ा है बैचेनी से बैठा हुआ हूँ.....समझ नहीं आ रहा कि इसपर क्या कहूँ......बीस हजार रुपए अपने कुत्ते पर....... वो भी कुछ घंटों के......इतने रुपए में आपका या हमारा बच्चा सालभर एक अच्छे स्कूल में पढ़ सकता है......किसी गरीब के बच्चे की पूरे जीवन की शिक्षा इतने रुपयों में हो सकती है और किसी गरीब की बेटी का ब्याह भी इतने रुपयों में हो सकता है.......तो हमारे देश को तो देखिए और देखिए उस नवधनाढ्य पीढ़ी को जो अपने कुत्तों पर हजारों-लाखों रुपया खर्च कर रही है........उस भारत देश में जिसमें आज भी २६ करोड़ लोग गरीबी की रेखा से नीचे जीवन-यापन करने को मजबूर हैं.....गरीबी की रेखा यानी वो लोग जो अपना रोज का खर्चा एक डॉलर यानी ५० रुपए से भी कम रुपए में चला रहे हैं.......उस देश में जहाँ आज भी कई जानें ठीक से पेट ना भरने और छोटी-मोटी बीमारियों का इलाज ना करवा सकने के कारण चली जाती हैं...अब हमारे देश में कुत्तों की कीमत इंसानी जान से ज्यादा हो गई है......अब यह भी तय होता जा रहा है कि स्थितियाँ अगर ऐसी ही रहीं तो देर-सबेर यहाँ मैक्सिको जैसी हालत होगी और रईसों के घर बुरी तरह लूटे जाएँगे......
आप लोग कह सकते हैं कि मैं कुछ ज्यादा ही निगेटिव बातें कर रहा हूँ.....लेकिन क्या करूं, जान जलती है जब पता चलता है कि हमारे देश में अर्थ की असामनता बढ़ती ही जा रही है.....यह खाई इतनी गहरी और चौड़ी होती जा रही है कि आम आदमी इसे ना तो कभी लांघ पाएगा और ना ही पाट पाएगा....इसके बाद क्या होगा, इसका अंदाजा सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि देश में नक्सली गतिविधियाँ सात राज्यों में फैल चुकी हैं....नक्सलियों का ध्येय क्या है यह आप लोगों को बताने की जरूरत नहीं.....बस इतना ही कि वे अतिसंपन्न लोगों के जान के दुश्मन हैं....माओ को मानते हैं और बंदूक की नली से क्रांति किए जा रहे हैं....मैं उस आंदोलन को बिल्कुल उचित तो नहीं ठहरा रहा हूं लेकिन यह तय है कि अगर हालात ऐसे ही चलते रहे तो एक समय देश का बेरोजगार युवा भूखा मरने के बजाए उनके साथ मिलकर बंदूक उठाने से नहीं चूकेगा और फिर हमारे अतिप्राचीन समाज का क्या होगा यह डिबेटेबेल बात हो सकती है......
बात कुत्तों से शुरू हुई थी तो उन्हीं पर खत्म करूंगा कि आजकल बाजार में एक हजार से लेकर पाँच लाख रुपए तक के कुत्ते के पिल्ले आ रहे हैं, रईस उन्हें झूरकर खरीद भी रहे हैं......आम आदमी अपने आशियाने का सपना पूरा नहीं कर पा रहा है और इस देश की एक पीढ़ी उतनी कीमत के कुत्ते के पिल्ले खरीद रही है.....ये कुत्ते के पिल्ले इंसानों पर इतने ज्यादा भारी पड़ेंगे पता नहीं था.....क्या ही अच्छा होता कि ये रईस किसी गरीब का बच्चा गोद लेकर उसका जीवन संवार देते...शायद वो उनके लिए कुत्ते से तो अधिक बेहतर सिद्ध होकर दिखा ही देता...लेकिन मुझे नहीं लगता कि रईस ऐसा करेंगे, उन्हें गरीबों से ज्यादा कुत्तों में रुचि है....!!!!!!
आपका ही सचिन......।

January 24, 2009

डेली सोप्स और भारतीय महिलाएँ

एकता कपूर जैसे धारावाहिक निर्माता देश को बर्बाद कर रहे हैं
कुछ दिन पहले अपने एक रिश्तेदार के घर जाना हुआ, दोपहर का समय था इसलिए घर की महिलाएँ टीवी के सामने जमी थीं..थोड़ी देर मैं भी बैठ लिया....चूंकी मैं दोपहर में अमूमन घर के बाहर रहता हूं इसलिए टीवी पर आने वाले भयावह धारावाहिकों (डेली सोप्स) से बचा रहता हूं...लेकिन उस दिन कुछ देर टीवी के सामने बैठना पड़ा....देखता हूं कि धारावाहिक में खूब सजी धजी महिलाएं जहर उगल रही हैं......कुछ ही देर में दो-चार सुंदर चेहरे षडयंत्र रचते हुए दिखे....आदमी परेशान हो रहे हैं इन धारावाहिकों में.....चूंकी टीवी चैनलों को पता है कि दोपहर में महिलाएँ ही घर में रहती हैं इसलिए सारे डेली सोप्स महिला प्रधान होते हैं...वे ही पुरुषों को लीड करती हैं, षडयंत्र रचती हैं, पुरुषों को अपनी अंगुलियों पर नचाती हैं और डरावने रोल भी करती हैं....कुल मिलाकर घर-घर की कहानी के नाम पर एक डरावना खेल खेला जा रहा है जो हर रोज नियमित टीवी पर दिखाया जाता है....
तो बात कहने का प्लेटफार्म तैयार हो गया है....क्या हमारे देश की महिलाओं को अपना ज्ञान बढ़ाने की जरूरत नहीं है....डिस्कवरी की वैबसाइट पर जाइए...उसके कई प्रकार के चैनल्स हैं....मिलट्री, साइंस, हैल्थ, किड्स और ना जाने क्या-क्या...ठीक है आप कहेंगे कि महिलाएँ इन्हें देखकर क्या करेंगी...तो ट्रेवल एंड लिविंग है......लाइफस्टाइल है......उसका जनरल चैनल है......नेशनल ज्योग्राफिक सोसायटी के तमाम चैनल हैं...अच्छी बात है कि ये सब आपको अंटार्कटिका भी घर बैठे दिखा देंगे.....अब कोई ये कह सकता है कि इन सबको देखने से क्या फायदा...खासकर महिलाओं के लिए.....तो साहब जिस पृथ्वी पर हम पैदा हुए उसके बारे में थोड़ा देखने और समझने में बुराई ही क्या है....दुनिया के इतने देश...इतनी सभ्यताएँ....इतनी बोलियाँ...इतनी संस्कृतियाँ...क्या कुछ नहीं है देखने-समझने को......और इन धारावाहिकों में क्या हो रहा है....कई पति..कई-कई प्रमिकाएँ...अवैध संबंध इस कदर, की बूझो तो जानें....जिसे देखो महल जैसे घर में रह रहा है....जो परिवार तंगी वाला दिखाते हैं वो भी आलीशान घर में रह रहा मिलता है जबकि आम भारतीय को दो कमरे नसीब नहीं हो रहे हैं.......और कुछ नहीं तो ये सोप्स भारतीय महिलाओं को अपने पतियों पर शक करना और खुद की फरमाइशों को बढ़ाने के अलावा और कुछ नहीं सिखाते...
कोई कह सकता है कि क्या महिलाएँ इतनी बचकाना होती हैं जो यूं ही भड़क जाएंगी...वे तो मनोरंजन के लिए देख रही हैं....तो साहब जो चीज आपको लगातार कई घंटे कई साल तक रोज दिखाई जाती रहे उसका असर दिमाग पर होना तो अवश्यंभावी है....विज्ञान भी कहता है और मनोविज्ञान भी.....संगति का प्रभाव है.....एकता कपूर अपने सोप्स में कई मिसाल पेश करती मिल जाएँगी लेकिन असल जिंदगी में वो बददिमाग और घमंडी औरत है.....फिल्मों के सितारे फिल्मों में मिसाल पेश करते हैं.....प्यार की, ईमानदारी की और ना जाने किस-किस की.....लेकिन असल जिंदगी में इसे छोड़ा और उसे पकड़ा का खेल चलता रहता है....एक-एक, कई-कई से फ्लर्ट कर रहा है...तमाम शादियां हो रही हैं....ऐसे में इनको देख-सुनकर कोई कैसे अच्छा बना रह सकता है....मनोरंजन का जीवन में महत्वपूर्ण रोल है लेकिन यह तो शो-बिजनिस है...सिर्फ व्यापार...आप पर इसका क्या असर पड़ रहा है इससे किसी को मतलब नहीं...सब सिर्फ रुपया बना रहे हैं...
मुझे ऐसा लगता है कि घर में दोपहर को रुकने वाली महिलाएं माँ हैं जिन्हें अपने बच्चों को बहुत ऊंचाइयों तक ले जाना है....कहते हैं कि मां बच्चे की पहली शिक्षक होती है....अगर वे ज्ञान या कहें सकारात्मक ज्ञान प्राप्त करेंगी और उसे अपने बच्चों को देंगी तो निश्चित ही हमारे देश की आगे आने वाली पौध जोरदार होगी...ज्ञानवान होगी...इसलिए वे सिर्फ ये ना सोंचें कि वे घर में बैठकर और क्या करें... हो सकता है कि उनका बच्चा उनके ज्ञान से पोषित होकर दुनिया जीते.....शिवाजी बने..जैसा कि जीजाबाई ने उन्हें बनाया था..
आपका ही सचिन......।

January 23, 2009

गोरेपन और सफलता के बीच संबंध..!!

गोरे रंग का भूत अभी तक हमारे सिर पर सवार है
पिछले काफी समय से टीवी पर एक विज्ञापन देख रहा हूं..यह एक विज्ञापन नहीं बल्कि विज्ञापनों की पूरी एक सीरीज है...औरतों और मर्दों दोनों के लिए है....फेयर एंड लवली वालों ने बनाई है.....वे खुशखबरी दे रहे हैं कि अब वे मर्दों के लिए भी गोरेपन वाली क्रीम ले आए हैं.....यानी अब मर्दों को काले रहने की जरूरत नहीं है......वे भी दूसरे गोरों की तरह इस रंग को अपनाकर शानदार सफलता पा सकते हैं...दूसरी ओर लड़कियों वाला विज्ञापन तो है ही जिसमें इस क्रीम को लड़कियां सात दिन तक लगाती हैं और उसके बाद उनमें से कोई एयरहोस्टेस बन जाती है तो कोई फिल्म स्टार बन जाती है.....कोई टीवी स्टार बनती है तो कोई न्यूज एंकर बन जाती है....इन क्रीम वालों का बस चले तो यह पूरे हिन्दुस्तान को ही गोरा बना दें और सबको सफल...!!!!!!
तो भाईयों और बहनों (माफ किजिए यह शब्द सब के लिए नहीं कह रहा हूं.......जो गोरी होंगी उनके लिए बहन करने से पहले सोचूंगा.....हा...हा) खैर भारत पिछले पांच हजार सालों (इतिहासविदों की नजरों में) और लाखों सालों (हमारे धर्म के अनुसार) से कई रंग-रूपों वाले लोगों का घर रहा है.....काश वे लोग यह जान पाते कि फेयर एंड लवली इस समय सबको गोरा किए दे रही है तो उन्हें तब पैदा होने का अफसोस जरूर हुआ होता।
तो एक किस्सा....किसी ने पं. नेहरू से एक पार्टी में पूछा था (यह पार्टी ब्रिटेन में हो रही थी) कि जिस तरह हमारे देश में सब लोगों का रंग एक ही है वैसा ही आपके देश में क्यों नहीं है.....या आपके देश में इतने रंगों के लोग कैसे मिलते हैं......तो नेहरूजी ने कहा था कि गधे सब जगह एक ही रंग के होते हैं जबकि घोड़े कई रंगों में पाए जाते हैं.......तो भई यह तो हो गई मजाक वाली बात लेकिन असलियत उल्टी है......हम भारतीय गोरे रंग वालों को घोड़ा और काले, हल्के या भूरे रंग वालों को गधा मानते हैं.......यह गोरा रंग हमारे ऊपर इस कदर हावी है कि लोग शादी के लिए भी लड़की में गोरापन ढूंढते हैं जैसे गोरी होकर वह क्या निहाल कर लेगी....?????? आश्चर्य है कि हमारे इस आदर्शों वाले देश को यह क्या हो गया है......माना कि अंग्रेज हमारी छाती पर २५० साल चढ़े रहे.......लेकिन उनके उतरने के बाद उनकी भाषा और उनका रंग इतने सालों तक चढ़ा रहेगा यह किसी ने नहीं सोचा था.....अगर आप लंबे हैं और गौरांग है तो अपनी सफलता की गारंटी मानिए....और अगर कोई लड़की गोरी है तो माता-पिता को उसकी शादी और दहेज की समस्या से मुक्त मिल गई समझो....हद हो गई.....गुणों की कद्र करने वाले इस देश में यह क्या.....और इस बात को इस क्रीम बनाने वाली कंपनी ने लपक लिया और अब वो हमारी कमजोरी पर प्रहार कर-करके कह रही है कि जल्दी से गोरा बन जाओ नहीं तो असफलता हाथ लगेगी..।
वैसे गोरे रंग का इतिहास लंबा है.....इस रंग के लोग दुनिया को बचा रहे हैं और वाइट मैन्स बर्डन थ्योरी का बाजा पिछले कई सौ सालों से बजा रहे हैं...लेकिन हम भारतीयों के सिर पर यह बाजा इतना असर करेगा कि लोग गोरा होने के लिए क्रीम का इस्तेमाल करने लगेंगे तो क्या होगा सोचो.....कोई कह सकता है कि एक विज्ञापन को लेकर इतनी लंबी-चौड़ी बात क्यों....तो साहब यह विज्ञापन कई सालों से सिर्फ इसी बूते चल रहा है कि इस देश की युवतियां इस क्रीम को खरीद रही हैं (गोरा होने के लिए)...अन्यथा किसी कंपनी में दम नहीं है कि अपने ना बिकने वाले ब्रांड का ऐसा प्रचार करे...तो अंत में सिर्फ यही कि इस क्रीम को नहीं खरीदना है...इसके पीछे दो बातें हैं.....एक यह की वाकई में इसे लगाने से कोई गोरा-वोरा नहीं होता.....और दूसरा यह कि क्रीम और उसका विज्ञापन भारतीय समाज की कुंठा को दर्शा रहे हैं......इसलिए इसे बंद होना चाहिए.....और एक बात यह भी कि अगर मैं उन भारतीयों (और वो भी गोरे नहीं)...का उदाहरण दूं जो महान हुए....सर्वकालिक महान.... तो समझो इस पन्ने जैसे कई पन्ने भरेंगे.....इसलिए उन्हें खोजने का काम आपका रहा.....।
आपका ही सचिन......।

January 22, 2009

रियलिटी शो और मशहूर होने की ललक!



सिर्फ नाच-गाकर या गालियाँ देकर ही नामचीन हो जाना चाहती है नई पीढ़ी

दोस्तों, आजकल देर रात कभी टीवी खोलकर देखता हूँ तो वहाँ एमटीवी पर एक नंगा रियलिटी शो खड़ा मिलता है जिसका नाम है एमटीवी रोडीज। इस शो में भाग लेने के लिए हमारे देश के खूबसूरत और जवाँ युवा कतार में लगे खड़े मिलते हैं। जब वे आडिशन देने अंदर जाते हैं तो दो गंजे उनका गालियों से स्वागत करते हैं, भला बुरा कहते हैं। ये युवा जो अपने घरवालों को अपनी पेंट की जिप से लगाकर रखते हैं इन गंजों की बातें खून का घूँट पीकर और मुस्कुराते हुए सिर्फ इसलिए सह जाते हैं क्योंकि वो मशहूर होना चाहते हैं। पूरे सीरियल के दौरान अब ये गाली देने और सुनने का सिलसिला चलता रहेगा। मैंने उसकी फाड़ दी और उसने मेरी फाड़ दी। ये शब्द वहाँ लड़कियों से सुनने को मिलते रहेंगे। ये है हमारी नई पीढ़ी जो मशहूर होने की ललक में अपनी फड़वा रही है। दूसरी ओर एक जमात ऐसी भी है जो नाच-गाकर मशहूर होना चाहती है। नाच और गाना भी खुद का नहीं। किसी फिल्मी का। मतलब फिल्मों के गानों और नृत्यों की नकल पेश करके जजों का इम्प्रेस करने का सिलसिला चल रहा है। दोस्तों दुख होता है इस भांडपने को देखकर, आज आपके सामने इसी विषय पर अपने विचार रखूँगा। तो शुरू करता हूँ...।
वर्तमान दौर इलेक्ट्रॉनिक मी़डिया का है। यह टीवी मीडिया लोगों का चेहरा बना और बिगाड़ रहा है। लोग खुश हैं क्योंकि वे मशहूर हो रहे हैं, उन्हें लग रहा है कि दुनिया उन्हें देख रही है और खुशी और गम में उनका साथ दे रही है। इन बातों को भुनाने के लिए टीवी चैनल रियलिटी शो के भ्रम रच रहे हैं...इस मायाजाल में फँसकर हमारे युवा और बच्चे लगभग पगलाए जा रहे हैं....वे जोर-जोर से नाच रहे हैं....सुरीले बनकर गा रहे हैं....और अगले राउंड में ना पहुँच पाने पर आँखों में आंसू भर-भर कर रो रहे हैं....उनका साथ उनके माता-पिता भी दे रहे हैं....माएँ प्रतियोगिता के दौरान भगवान से आर्शीवाद माँगती हुई नजर आती हैं....सलेक्ट ना होने पर भीगी पलकों को अपने पल्लू से पोंछती नजर आती हैं....आखिर हो क्या गया है हमारे इस महान देश को......यहाँ के लोगों की आकांक्षाएँ इतनी छोटी तो ना थीं......वो कभी इतनी आसानी से तो जीवन की जंग जीतना नहीं चाहते थे.....????????
टीवी चैनलों पर कई प्रकार के रियलिटी शो हमेशा चलते रहते हैं....बच्चों के लिए इसपर लिटिल चैंप्स चला...इंडियन आईडल...फेम गुरूकुल.....सारेगामापा.....नच बलिए.....बिग बॉस......कितने ही हैं जिन्होंने इस भ्रम को जिलाए रखा......सबमें क्या फर्जीवाड़ा हुआ आप लोगों को पता है.......और कितने रियलिटी शो के विजेता स्थापित सितारा बन पाए यह भी पता है......इन शो के बहाने करोड़ों रुपए बटोरने वाले टीवी चैनलों ने उन विजेताओं के साथ क्या किया यह भी पता है.......कई विजेता गुमनामी के अंधेरे में खो गए तो कई इस बात की रिपोर्ट लिखाते फिरे कि उनके साथ किए गए वादे पूरे नहीं किए गए......जो हारे उन्होंने बेइमानी की शिकायत की.....और उन जजों को क्या कहूं जो पूरे शो के दौरान सब प्रतियोगियों के लिए कहते रहे कि वो महान कलाकार बनने वाले हैं........पानी पर चढ़ा-चढ़ाकर डुबो दिया बच्चों को......
देश की भोली जनता रात को टीवी के सामने बैठ जाती है और जिसकी शक्ल, सूरत, नाच या गाना पसंद आता है उसे हाथ में मोबाइल लेकर एसएमएस करने लग जाती है.....टीवी चैनल भी दर्शकों से एसएमएस करने की माँग बहुत भावुक अंदाज में करते हैं....भोली जनता उनकी बातों में आ जाती है बिना यह बात जाने की इन एसएमएस की कीमत वो क्या चुकाने वाली है......बीच में अखबारों में एक खबर भी आई थी कि इसी प्रकार के एक कार्यक्रम में एसएमएस करते रहने से एक घर में मोबाइल का बिल ३० हजार रुपए आ गया था........इन कार्यक्रमों की सच्चाई का आलम यह है कि बिग बॉस को भी लोगों ने लाखों एसएमएस किए और बाद में उसी सीरियल की एक प्रतियोगी ने (यह एक मॉडल थी) ने अपने एक साक्षात्कार में कह दिया था कि वे लोग इस कार्यक्रम की शूटिंग की रिहर्सल ठीक वैसे ही करते थे जैसे किसी नाटक की होती है.....यानी सबकुछ पहले से सेट था, निर्धारित था और हम समझते रहे कि सब ओरिजनल हो रहा है........
अब उन जजों की भी बात करते हैं जो इन कार्यक्रम में प्रतियोगियों को चने के झाड़ पर चढ़ाने का काम करते हैं......जावेद अख्तर को मैं पसंद करता हूं.....वो टू द पाइंट बात करते हैं इसलिए कई लोग उन्हें पसंद करते हैं......लेकिन समझ नहीं आता कि वो इस भीड़ में बैठकर क्या कर रहे हैं.......धीरे-धीरे इन रियलिटी शो की रियलिटी खुलने लगी है......इस पर खुद मीडिया में भी काफी कुछ छप चुका है.......ऐसे में जावेद अख्तर जैसे गंभीर लोगों को इन शो से हट जाना चाहिए.......जो अन्य बड़े नाम इन शो से जुड़े दिखते हैं वो टीवी चैनलों की ताकत को सिर्फ नमन करने आते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि वो इन्हीं चैनलों की बदौलत स्टार हैं.....इस छोटे परदे की वजह से ही उनके चेहरे हर घर में पहचाने जाते हैं....ये अलग बात है कि उन जजों को यह नहीं पता होता कि उनकी नकली बातें कितने युवाओं और बच्चों के मन में गंभीर महत्वाकांक्षाएँ पैदा कर देती हैं और कई बार इन कोमल मनों पर हार का बोझ जरूरत से ज्यादा दबाव बना देता है....
हमारे महान देश के माता-पिता को चाहिए वे बच्चों को जीवन के भावी संघर्ष के लिए तैयार करें.....उन्हें जिंदगी के कठोर पथ के बारे में जानकारी दें....उन्हें ताकतवर और मजबूत बनाएं....लेकिन वें हैं कि अपने बच्चों को अदनान सामी और हिमेश रेशमिया के सामने ले जाकर खड़ा कर देते हैं......फेम गुरूकुल के विजेता काजी तौकीर का क्या हुआ.......उसे ४० लाख एसएमएस मिले......अब वो कहीं नहीं है क्योंकि हम सब जानते थे कि वो ढंग से गाना ही नहीं जानता था.......उसे भावानात्मक बहाव ने जिताया.......इस बारे में बाद में चर्चाएं भी हुई थीं.....हम हमेशा श्रेष्ठ प्रतिभा को ही जिताएँ ऐसा जरूरी नहीं......और जो श्रेष्ठ प्रतिभा होगी वो खुद ही जीवन में सफलता का रास्ता बनाएगी....जैसे नदी अपना रास्ता बनाती है.....
आपका ही सचिन......। 

January 17, 2009

फिल्मी सितारे और भारतीय राजनीति

राजनीति को ग्लैमर के तौर पर आजमाने वालों की कमी नहीं


दोस्तों, आज सुबह से टीवी चैनल वालों ने फिर से अपने खटकर्म शुरू कर दिए थे और लगातार दिखाए जा रहे थे कि संजय दत्त लखनऊ से सपा के टिकट पर चुनाव लड़ने की अपनी घोषणा के बाद वहाँ पहुँच गए हैं और कैसे उनका धुँआधार स्वागत किया जा रहा है। लोग पागल हो रहे हैं संजय को देखकर, वे खुश हैं कि संजय लखनऊ से चुनाव लड़ रहे हैं आदि-आदि। तमाम प्रकार की फालतू की अटकलें लगाई जा रही हैं। उस नायक (?) के लिए जो १.५ साल जेल में एके ५६ राइफल रखने के कारण बंद रहा और जिसपर टाडा और फिर पोटा लगाया गया। हालांकि आजकल राजनीतिज्ञों के लिए तो ये क्वालिफिकेशन ही है लेकिन मैं फिल्मी सितारों और राजनीति की बातें करना चाहता हूँ। इस वाक्ये से मेरे मन में एकदम से कई सारी बातें आईं....दोस्त लोगों से बाँटना चाहता हूँ.....
तो गोविंदा सांसद हैं साहब.....फिल्मी सितारे धर्मेन्द्र भी सांसद हैं बीकानेर से.....अपने बिहारी बाबू शत्रुघ्न सिन्हा भी सांसद हैं.....बीच में स्वास्थ्य और फिर जहाजरानी मंत्री बन गए थे एनडीए सरकार में....स्वर साम्राज्ञी लतामंगेशकर राज्यसभा सांसद हैं..... हेमा मालिनी सांसद हैं...... स्मृति इरानी ( सास भी कभी बहू थी वाली) भी सांसद हैं......नवजोत सिंह सिद्धू भी सांसद हैं.....विनोद खन्ना भी लोकसभा सांसद हैं.... अमिताभ बच्चन भी लोकसभा का स्वाद चखकर देख चुके हैं.....

यह तो हुए फिल्मी सितारे....... अब दूसरी ओर देखें..... तो अनिल अंबानी सांसद थे....उन्होंने इस्तीफा दे दिया था....विजय माल्या भी सांसद हैं.... और..और कितने गिनाऊँ.....यह बात आगे बताता हूं कि यह सब क्यों हैं जबकि राजनीति और आम जनता से इन्हें कोई लेना-देना नहीं है.......

तो अब आप कहेंगे कि यह ज्ञान क्यों, यह सबको पता है......... लेकिन मैं आप सबसे एक प्रश्न पूछना चाहता हूं (युवक और युवतियों दोनो के लिए है) कि अगर आपको किसी लड़के या लड़की की आवाज पसंद आई या फिर किसी के सिर के बाल पसंद आए या किसी की टाँगे या घुटने पसंद आए तो क्या आप उससे शादी कर लेंगे??????? शायद नहीं....शायद इसलिए लगाया क्योंकि सबकी सोच एकसी नहीं होती....

तो इन फिल्मी सितारों को लोकसभा में चुनकर हम क्यों अपना मजाक बनवाते हैं जबकि हमें पता है कि ये लोग जब तक नाच-गाना नहीं कर लेंगे इन्हें जीवन जीने में मजा नहीं आएगा......एशो-आराम से फुर्सत नहीं निकाल पाएँगे....फिर भी भावनाओं में बहकर हम इन्हें चुन लेते हैं.....धर्मेन्द्र बीकानेर में शोले के डायलॉग सुना-सुनाकर चुनाव जीत गए जबकि बाद के पाँच साल में एक बार भी वहाँ झांकने नहीं गए.... अब वहां के लोग उन्हें गालियां दे रहे हैं.....इसी प्रकार गोविंदा भी ठुकमे लगा-लगाकर चुनाव जीते लिए अब उन्हें फिल्मों में सलमान के साथ ठुमके लगाने से फुर्सत नहीं है। उनके संसदीय क्षेत्र की जनता उन्हें अब तक का सबसे नाकारा सांसद घोषित कर चुकी है.....शत्रुघ्न सिन्हा भी चुने जाने के तुरंत बाद फिल्म की शूटिग में व्यस्त हो गए थे......हेमा मालिनी और अन्य पुरानी अभिनेत्रियाँ संसद में हैं जरूर लेकिन वे क्या रोल निभाती हैं यह बताने की जरूरत नहीं है......लताजी भी राज्यसभा में चुने जाने के बाद अभी तक सिर्फ एक ही बार वहाँ गई हैं.....

ऐसा नहीं है कि फिल्म में काम करने वालों को राजनीति नहीं आती.....जयललिता अभिनेत्री थीं.... एमजी रामचंद्रन भी अभिनेता थे.....स्व. सुनील दत्त अभिनेता थे......और तो और अमेरिका के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन भी हॉलीवुड अभिनेता थे.....कैलीफोर्निया के वर्तमान गर्वनर आरनोल्ड श्वाजनेगर मशहूर हॉलीवुड एक्शन हीरो थे........लेकिन एक बार राजनीति में आने के बाद उन्होंने अपना सबकुछ राजनीति और देश को दे दिया......कम से कम समय तो दिया ही यानी पूर्णकालिक रहे.....लेकिन दूसरी ओर कई अभिनेता फिल्मों में व्यस्त रहकर अपने क्षेत्र की जनता को छलते रहते हैं.......उन्हें राजनीति से जुड़ने में सिर्फ एक प्रकार का ग्लैमर नजर आता है।

असल में ग्लैमर या उद्योग क्षेत्र के लोग राजनीति में आते क्यों हैं.....समझने वाली बात है......एक बार मैंने खबर पढ़ी थी कि अमेरिका में बुद्ध धर्म को ग्रहण करने वालों की संख्या बढ़ी है......लेकिन साथ ही यह भी बताया गया था कि अमेरिकी लोग उस धर्म के मूल को कुछ नहीं मानते....सारी बदमाशी करते हैं (वो शिल्पा शेट्टी वाला भूरा रिचर्ड गेरे भी याद है ना आपको, वो भी बौद्ध है) बस थोड़ा चेंज के लिए उन्होंने अपना धर्म बदल लिया.....बस अपनी राजनीति वाली बात में भी वहीं चेंज है.........संसद में जाने का शौक है, दुनिया के सारे ऐश कर लेते हैं तब सोचते हैं क्यों ना संसद में भी चक्कर लगाके देख लिया जाए.....और हमारे देश की जनता तो चकरघिन्नी है ही..... जो इनके चक्कर में आ जाती है....

विजय माल्या के लिए तो इंडिया टुडे ने छापा भी था कि उन्होंने रुपए देकर अपने लिए राज्यसभा की सीट बुक करवा ली और जद को रुपयों का ढेर दे दिया....इसी प्रकार का काम अनिल अंबानी ने भी किया था लेकिन बीच में उनका जमीर जाग गया और उन्होंने अपनी संसदीय सदस्यता से इस्तीफा दे दिया (वो लाभ के पद वाले मामले के दिनों में)....

इस प्रकार की तमाम बातें हमारे सामने आती रहती हैं लेकिन हम उनपर रिएक्ट ही नहीं करते......और लोकतंत्र की इस खामी का फायदा इस प्रकार के लोगों को मिल जाता है....हमें अपने को राष्ट्रीय परिदृश्य में इतना परिपक्व दिखाने की जरूरत है कि कोई राजनैतिक पार्टी किसी लफ्फाज या नौटंकी छाप व्यक्ति को पार्टी का टिकट देने की जुर्रत ना करे और संसद में पहुँचाने की तो कम से कम सोचे भी नहीं.....तभी हमें और हमारे लोकतंत्र को सही मायनों में परिपक्व माना जाएगा.....हमारी राजनीति पहले से ही उस नौटंकी छाप अमर सिंह को झेल रही है और वो पगला राजनेता अपने जैसे नौटंकीछापों का ही संसद में मजमा लगाए दे रहा है। आज तो संजय दत्त के साथ वो जिस जीप में सवार था उसमें भोजपुरी फिल्मों का प्रसिद्ध हीरो मनोज तिवारी और पूर्व अभिनेत्री तथा सांसद जया प्रदा और उनकी नामराशि की दूसरी सांसद जया बच्चन भी सवार थीं। हद है, पूरी फिल्म इंडस्ट्री ही संसद में पहुँच जाएगी तो वहाँ गंभीर राजनीति होगी या फिर नाच-गाना। दोस्तों से मेरा आव्हान है कि इन नचैयों को राजनीति से उखाड़ फैंको, हम तो इन्हें शो बिज में ही देख-देखकर बोर हो चुके हैं, अब संसद में नहीं देखना चाहते।

आशा है दोस्त मेरी बातों से सहमत होंगे.....

आपका ही सचिन....।

January 16, 2009

चाँदनी चौक टू चाइना बनाम भारतीय सिनेमा

फूहड़ मनोरंजन की फिल्में बनती हैं हमारे यहाँ

दोस्तों, आज अक्षय कुमार की चाँदनी चौक टू चाइना रिलीज हुई। इससे पूर्व उनकी हिट फिल्म सिंग इज किंग रीलीज हुई थी। हालांकि चाँदनी चौक.... फिल्म के लिए लोगों ने आज अच्छी प्रतिक्रियाएँ नहीं दी हैं लेकिन मैं दिन भर इस फिल्म के बारे में टीवी पर सुनता रहा। ऐसा नहीं है कि मैं ऐसा चाह रहा था बल्कि टीवी चैनल वाले ही जबरदस्ती यह सब दिखाए जा रहे थे। मुझे लगता है कि बाजार के चलते ये फिल्म सड़ी होने के बावजूद चल जाएगी क्योंकि हमारे भारत में ऐसा ही होता है। हालिया कई फिल्में इसकी उदाहरण हैं........क्या हम इस बात को समझ रहे हैं.....??
अब मुझे पढ़ने वाले दोस्त फिर कहेंगे कि बासी विषय पर लिखने बैठ गया ( मैंने सिंग इज किंग फिल्म किसी की जिद पर इत्तेफाक से ही देखी इसलिए जिक्र कर रहा हूँ)....लेकिन प्लीज मुझे माफ करिएगा मैं अमूमन फिल्मों को नहीं देखता....खासकर हिंदी फिल्मों को.....नहीं-नहीं....मैं हिन्दी फिल्मों या हिन्दी भाषा का विरोधी नहीं हूं....काफी देशभक्त हूं...और अपनों तथा अपने देश को बहुत प्यार करता हूं लेकिन छोटी-छोटी बातें मुझे कई बार बहुत परेशान कर देती हैं....आप नहीं समझ रहे ना...??? .... समझाता हूं...
एक बार किसी ने गंभीर फिल्मकार श्याम बेनेगल से पूछा कि आखिर कान (फ्रांस) जैसे विश्व विख्यात फिल्म फेस्टिवल में भारतीय फिल्मों का नंबर क्यों नहीं लगता??.... तो उनका जवाब था कि जिस देश के सिने दर्शक हर १० मिनट बाद फिल्मों में नाच-गाना देखना चाहते हों उस देश में गंभीर विषयों पर फिल्म कैसे बन सकती है..खासतौर से ऐसी फिल्मे जिन्हें कान फिल्म फैस्टिवल में जगह मिले और अवार्ड भी....... गंभीर बात है साहब लेकिन आप-हम नहीं समझ रहे....।
सिंग इज किंग या अक्षय कुमार की अन्य फिल्मों की स्टोरी ऐसी होती है कि आप-हम किसी को सुना भी नहीं सकते..... ऐसी फिल्में समाज को क्या संदेश देती हैं मुझे समझ नहीं आता लेकिन हां, ऐसी फिल्में हिट खूब होती हैं।
यहाँ मैं सिर्फ अक्षय कुमार का नाम ही नहीं ले रहा हूँ। आप शाहरुख खान की पिछली कुछ हिट फिल्मों का जिक्र कीजिए। करण जौहर के मानसिक दिवालिएपन के अलावा उन फिल्मों में कभी कुछ नजर नहीं आता। ओम शांति ओम एक बहुत ही बासे टॉपिक पर बनी फिल्म थी। .मैं ये भी देखा है कि शाहरुख रीमेक पर विश्वास करता है। क्यों ये मैं नहीं कह सकता लेकिन उसकी सारी फिल्में कुछ दशक पहले हिन्दी में ही बन चुकी होती हैं। और अगर नहीं तो अंग्रेजी में तो वो जरूर पहले से ही बनी होती है। इस बार तो बंपर हिट गजनी की भी चोरी पकड़ी गई। अपने विजन के लिए जाने जाने वाले आमिर की यह फिल्म अंग्रेजी फिल्म मोमेंटो की नकल थी। 
तो दोस्तों, हमारे देश में फिल्म निर्माता और फिल्म निर्देशक हम लोगों के तीन घंटे छीनकर हमें सिर्फ मनोरंजन के नाम पर फूहड़ता परोसते हैं और खुश होते हैं कि साल में इस बार इतनी फिल्में हिट हो गईं..... इतने करोड़ रुपए का व्यवसाय हुआ लेकिन समाज को क्या मिला इसपर कोई बहस नहीं होती.....हिंदी फिल्मों में हिराईनों के रोल के बारे में भी जरा चर्चा कीजिए.....आजकल निर्माता उन्हें सिर्फ नंगा करने पर ही ध्यान दे रहे हैं और ये हम जानते हैं कि इस देश में मजबूर, और मशहूर होने की लालसा वाली कितनी लड़कियाँ हैं और इसके लिए वो क्याकुछ कर-गुजरने के लिए तैयार रहती हैं.......
हॉलीवुड फिल्मों का उदाहरण दूंगा तो लोग देश-द्रोह का आरोपी बना देंगे......लेकिन ज्यादा बात ना करते हुए सिर्फ एक फिल्म का उदाहरण दूंगा......विश्व प्रसिद्ध मैट्रिक्स सीरीज की मूवीज तो आपमें से ज्यादातर लोगों ने देखी होंगी लेकिन किसी ने एक बात पर ध्यान नहीं दिया होगा......फिल्म की सीरीज की आखिरी मूवी मैट्रिक्स-३ जब खत्म होती है तो उसकी स्टारिंग के साथ जो धुन बजती है उसे सुनिएगा..... वह भारत के शास्त्रों से उठाए गए श्लोक हैं.... सर्वे संतु सुखिनः...सर्वे संतु निरामय...सर्वे भद्राणी पशयन्तु..... मा कश्चित दुखभाग भवेत....
जब मैंने मेट्रिक्स पहली बार देखी थी तभी लग रहा था कि यह हिन्दू आइडियलिज्म के ऊपर है लेकिन कोई सुबूत नहीं था......लोगों से चर्चा होती थी बस.....लेकिन अंतिम भाग ने मेरा साथ दिया और उसकी पूरी कहानी ने भी..... मैं कहना चाहता हूं कि अरबों डॉलर की फिल्म भारतीय सोच पर बन सकती है लेकिन हम विदेशी हुए जा रहे हैं.....फिल्मों में लड़कियों को ऐसे कपड़े पहनवा कर नचवा रहे हैं कि अपनी पत्नी, बच्ची या अपनी मां के साथ फिल्म नहीं देख सकते। करण जौहर की फिल्मों में आधी अंग्रेजी घुसी रहती है.....एक आदमी के कई चक्कर और एक औरत के भी कई चक्कर आम हैं.....ऐसी दो कौड़ी की लव स्टोरियों से हम अपने समाज को क्या-कुछ दे देंगे।.........??
कुछ दिनों पहले एक अन्य फिल्म रिलीज हुई थी आमिर खान की तारे जमीन पर.... इसने बहुत तारीफ बटोरी। ये प्रयास अच्छे हैं। ऐसी फिल्में बनते रहनी चाहिए लेकिन एक बिन मांगा सुझाव मेरी तरफ से भी.......
भारतीय सभ्यता और संस्कृति पांच हजार साल पुरानी है.....कई दिग्गज और जबर्दस्त लोगों की दास्तानें इससे जुड़ी हुई हैं..... अगर इन्हीं पर फिल्में बनाई जाएं तो अगले कई साल तक भारतीय फिल्म इंडस्ट्री को आइडिया चुराने के लिए हॉलीवुड का मुंह नहीं ताकना पड़ेगा। दूसरी ओर लव स्टोरी भी चलती रहें.... भई नहीं तो युवा मुझे गाली देंगे लेकिन कम से कम कुछ तो सार्थक हो......
हमारा १०० करोड़ लोगों का देश ओलंपिक में अपने आकार के हिसाब से अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करवा पाता (हालांकि इस बार हमने अच्छा प्रदर्शन किया) ...और ना ही आस्कर या कान में कोई अवार्ड बटोर पाता है.....तो इसके लिए दोषी हम-आप हैं.......हम जब तक ऐसी फिल्में हिट करवाते रहेंगे तब तक गंभीर प्रयास नहीं होंगे और याद रखिएगा मैं यह हर विषय पर कह रहा हूं.....खेल,फिल्म और राजनीति भी.....क्योंकि इन सबमें हमारी पसंद बहुत फूहड़ है इसलिए अंतरराष्ट्रीय नक्शे पर हम पिछड़ जाते हैं......हमें अपनी पसंद सुधारनी होगी.....बस आप लोगों से सिर्फ इतना ही.....
(नोटः कृपया यहाँ स्लमडॉग मिलियनेयर की अपेक्षा नहीं करें। उस फिल्म ने दुनिया के सामने भारत की फूहड़ और गरीब छवि पेश की है। अमिताभ इसपर बोल चुके हैं। विदेशियों को हमें गरीब देखना ही पसंद है। इससे खुश होकर वो हमें अवार्ड भी टिका देते हैं। नहीं तो उस तारे जमीं पर क्यों आस्कर से बाहर कर दिया गया। इस विषय पर अलग से लिखूंगा। स्लमडॉग का निर्देशक एक ब्रिटिश है और उसने फिल्म के नाम के अनुरूप कुत्ते जैसा ही काम किया है)
आपका ही सचिन....।

January 15, 2009

राजनीति तो करनी ही पड़ेगी यारों

युवाओं को इसके लिए मानस बनाना ही पड़ेगा
दोस्तों, कल बात राजनीति पर चल रही थी इसलिए लोगों को बोझिल लगी होगी। लेकिन मैं अपनी बात जारी रखूँगा क्योंकि उसमें बिंदु अभी बाकी रह गए थे। तो कल अपनी बात वैकल्पिक राजनीति पर चल रही थी.....
दोस्तों, वे सब निर्णय जिनसे हम या हमारा समाज प्रभावित होता है अगर कहीं अटकते हैं तो बस राजनीति पर जाकर.......अगर अच्छे निर्णय नहीं हो पाते तो समझो जाहिल राजनेताओं के कारण और अगर हो पाते हैं तो समझो इने-गिने अच्छे राजनेताओं के कारण.....कांग्रेस शुरूआत कर रही है युवा नेताओं को आगे बढ़ाने की.......राहुल गांधी के किचन कैबिनेट में दाखिल करवाकर.......उसपर वैसे लंबी बहस हो सकती है कि २०१४ में सोनिया जी राहुल को प्रधानमंत्री के तौर पर देखना चाहती हैं....इसलिए राहुल को ताकतवर बनाया जा रहा है..फिर इस मामले में परिवारवाद पर भी बहस हो सकती है....अब ज्योतिरादित्य सिंधिया को केन्द्र में ले जाया गया है। कुछ माह पहले मप्र के कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर भी सिंधिया का नाम चला था.....खैर, ऐसी कई बातें हैं.....लेकिन ध्यान देने पर पता चलता है कि जो भी युवा राजनीति में जा रहे हैं सब संपन्न या स्थापित राजनैतिक घरानों या खानदानों से हैं......इस ग्रुप में भी मुरली देवड़ा के बेटे हैं.... जितेन्द्र प्रसाद के बेटे हैं.... माधवराव सिंधिया और राजेश पायलट के बेटे हैं.......मुलायम सिंह यादव के बेटे हैं...राजीव गांधी भी ४० साल में प्रधानमंत्री बन गए थे लेकिन वह इसलिए कि वो इंदिरा गांधी के बेटे थे... 
तो सवाल है कि ऐसे में हम कहाँ हैं.......हमारी भी आकांक्षा होनी चाहिए क्योंकि देश में राजनेताओं की जरूरत है और फुल टाइम राजनेताओं की.....इसे कैरियर के तौर पर भी अपनाया जा सकता है.....मुंबई के एक विश्वविद्यालय का इस संबंध में विज्ञापन छपा था...वहाँ बाकायदा प्रोफेशनल पोलिटिक्स का कोर्स शुरू हो रहा था.......अब यह देश के युवाओं पर निर्भर करता है कि वे आईआईटी और आईआईएम से बाहर निकलकर खालिस मिट्टी की गंध सूंघना चाहते हैं या नहीं.......। अब जमाना काफी बदला है समाज सेवक भी राजनीति में आ रहे हैं क्योंकि यह भी एक तरह की समाजसेवा ही है......उदाहरण दे रहा हूं......एक समय वकील झूरकर राजनेता बनते थे......आडवाणी जी..अटलजी...कपिल सिब्बल...अरुण जेटली...रामजेठमलानी...कितने ही बने....पुरानों में तो काफी हैं....... फिर दौर चला जब पत्रकार राजनीति में आए.......अटलजी पत्रकार भी रहे, लखनऊ स्वदेश के संपादक थे..... अरुण शौरी भी विनिवेश मंत्री रहे.....और भी कई रहे....राज्यसभाओं में भी पहुँचे....दैनिक जागरण के मालिक और प्रधानसंपादक भी राज्यसभा सांसद रहे.... पॉयनियर के चंदन मित्रा हैं.....हिन्दू वाले एन राम हैं, लोकमत समाचार के विजय डरडा हैं.....वर्तमान में भाजपा राष्ट्रीय कार्रकारिणी के सचिव और राज्यसभा सांसद प्रभात झा स्वदेश ग्वालियर में १६ साल पत्रकार रहे....लंबी लिस्ट है........
वर्तमान चलन समाजसेवियों का है.....अब नाम क्या गिनाऊं लेकिन दिल्ली के इंडियन इंटरनेशनल सेंटर और इंडिया हैबिटाट सेंटर में आपको इस कांबिनेशन के हजारों लोग मिल जाएँगे, आप वहां जाकर देख सकते हैं...... लेकिन कमी सिर्फ युवाओं की है, हालांकि उनकी संख्या बढ़ रही है लेकिन पूरी नहीं है.....पढ़े-लिखे लोग तो मिल रहे हैं लेकिन राजनीति से घृणा करना हमें खत्म करना होगा...। लेकिन यह घृणा है कि खत्म ही नहीं हो रही है। लोग पॉलिटिकल कैरियर की ओर ध्यान ही नहीं दे रहे हैं। पोलिटिक्स कैरियर भी हो सकता है यह हम सोचते तक नहीं। हालांकि मैं मानता हूँ कि इस देश में फिलहाल यह मुश्किल कार्य है लेकिन असंभव नहीं। वैकल्पिक राजनीति की ओर हमें देखना ही होगा। बॉलीवुड इस इश्यू पर फिल्म बना रहा है, युवाओं की आवाज उठा रहा है लेकिन हम युवा फिलहाल राजनेताओं को गाली देने में व्यस्त हैं। जब मौका आता है तो हम फिल्म स्टार या स्पोर्ट्स स्टार तो बनना चाहते हैं लेकिन पोलिटिकल स्टार बनना अछूत शब्द सा लगता है। जब तक हम इस विकल्प की ओर ध्यान नहीं देंगे ये देश नहीं सुधर सकता क्योंकि फिलहाल जो सत्ता में हैं वो इस देश को वैसा कतई नहीं बनने देंगे जैसा कि हम चाहते हैं। इस अपेक्षा को पूरा करने के लिए तो मैदान में हमें ही उतरना होगा। 
नोटः (प्रसिद्ध पुस्तक जीत आपकी के लेखक शिव खेड़ा ने हाल ही में अपनी पॉलिटिकल पार्टी बनाकर एक सकारात्मक शुरुआत की है, कई और भी बुद्धिजीवी हस्तियाँ ये दुस्साहस कर रही हैं, मैं आशा करता हूँ कि आप और हम में से भी लोग ऐसा दुस्साहस करने के लिए राजी होंगे)
आपका ही सचिन....।