April 20, 2009

खतरनाक होगा 'ग्लोबल वार्मिंग' का असर



सचिन शर्मा
'ग्लोबल वार्मिंग' दुनिया के लिए कितनी बड़ी समस्या है, ये बात एक आम आदमी समझ नहीं पाता है। उसे ये शब्द थोड़ा 'टेक्निकल' लगता है इसलिए वो इसकी तह तक नहीं जाता है। लिहाजा इसे एक वैज्ञानिक परिभाषा मानकर छोड़ दिया जाता है। ज्यादातर लोगों को लगता है कि यह एक दूर की कौड़ी है और फिलहाल संसार को इससे कोई खतरा नहीं है। कई लोग इस शब्द को पिछले दशक से ज्यादा सुन रहे हैं इसलिए उन्हें ये बासी लगने लगा है।

भारत में भी ग्लोबल वार्मिंग एक प्रचलित शब्द नहीं है और भाग-दौड़ में लगे रहने वाले भारतीयों के लिए भी इसका अधिक कोई मतलब नहीं है। लेकिन विज्ञान की दुनिया की बात करें तो ग्लोबल वार्मिंग को लेकर भविष्यवाणियाँ की जा रही हैं। इसको 21वीं शताब्दी का सबसे बड़ा खतरा बताया जा रहा है। यह खतरा तृतीय विश्वयुद्ध या किसी क्षुद्रग्रह (एस्टेरोइड) के पृथ्वी से टकराने से भी बड़ा माना जा रहा है।

ये हुई कुछ ऊपरी बातें जो ग्लोबल वार्मिंग को लेकर कही गईं लेकिन अगर हम इसकी तह में जाएँ तो हमें पता चलेगा कि वाकई यह विषय बहुत महत्वपूर्ण है। पूरी दुनिया इससे प्रभावित हो रही है। अगर इसे नहीं संभाला गया तो यह किसी विश्वयुद्ध से ज्यादा जान-माल की हानि कर सकता है। सबसे पहले हमें इसकी कुछ शुरुआती बातें समझनी होंगी।

माना जाता है कि पिछली शताब्दी में यानी सन 1900 से 2000 तक पृथ्वी का औसत तापमान 1 डिग्री फैरेनहाइट बढ़ गया है। सन 1970 के मुकाबले वर्तमान में पृथ्वी 3 गुणा तेजी से गर्म हो रही है। इस बढ़ती वैश्विक गर्मी के पीछे मुख्य रूप से मानव ही है। ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन, गाड़ियों से निकलने वाला घुँआ और जंगलों में लगने वाली आग इसकी मुख्य वजह हैं। इसके अलावा घरों में लक्जरी वस्तुएँ मसलन एयरकंडीशनर, रेफ्रिजरेटर, ओवन आदि भी इस गर्मी को बढ़ाने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार ग्रीन हाउस गैस वो होती हैं जो पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश तो कर जाती हैं लेकिन फिर वो यहाँ से वापस 'स्पेस' में नहीं जातीं और यहाँ का तापमान बढ़ाने में कारक बनती हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार इन गैसों का उत्सर्जन अगर इसी प्रकार चलता रहा तो 21वीं शताब्दी में पृथ्वी का तापमान 3 से 8 डिग्री तक बढ़ सकता है। अगर ऐसा हुआ तो इसके परिणाम बहुत घातक होंगे।

दुनिया के कई हिस्सों में बिछी बर्फ की चादरें पिघल जाएँगी, समुद्र का जल स्तर कई फीट ऊपर तक बढ़ जाएगा। समुद्र के इस बर्ताव से दुनिया के कई हिस्से जलमग्न हो जाएँगे। भारी तबाही मचेगी। यह तबाही किसी विश्वयुद्ध या किसी 'एस्टेरोइड' के पृथ्वी से टकराने के बाद होने वाली तबाही से भी बढ़कर होगी। हमारे ग्रह पृथ्वी के लिए वो दिन बहुत बुरे साबित होंगे।

ग्लोबल वार्मिंग के प्रमुख कारक : जैसा कि ऊपर बताया गया है कि ग्लोबल वार्मिंग के पीछे मुख्य रूप से ग्रीन हाउस गैसों का होना है। तो सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि ये गैसें कौन-सी हैं और कैसे पैदा होती हैं। ग्रीन हाउस गैसों में कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी गैसें शामिल होती हैं। इनमें भी सबसे अधिक उत्सर्जन कार्बन डाइऑक्साइड का होता है। इस गैस का उत्सर्जन सबसे अधिक 'पॉवर प्लांट्स' से होता है।

याद रखें कि बूँद-बूँद से ही घड़ा भरता है। अगर हम ये सोचें कि एक अकेले हमारे सुधरने से क्या हो जाएगा तो इस बात को ध्यान रखें कि हम सुधरेंगे तो जग सुधरेगा। सभी लोग अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करें तो ग्लोबल वार्मिंग को भी परास्त किया जा सकता है
बिजली संयंत्रों को बिजली पैदा करने के लिए भारी मात्रा में जीवाश्म ईंधन (मसलन कोयला) का उपयोग करना पड़ता है। इससे भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड पैदा होती है। माना जाता है कि संसार में 20 प्रतिशत कार्बन डाइऑक्साइड गाड़ियों में लगे गैसोलीन इंजन की वजह से उत्सर्जित होती है। इसके अलावा विकसित देशों के घर किसी भी कार या ट्रक से ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित करते हैं। इनको बनाने में कार्बन डाइऑक्साइड की बहुत मात्रा उत्सर्जित होती है। इसके अलावा इन घरों में लगने वाले उपकरण भी इन गैसों का उत्सर्जन करते हैं।

जागरूकता ही उपाय : ग्लोबल वार्मिंग को रोकने का कोई इलाज नहीं है। इसके बारे में सिर्फ जागरूकता फैलाकर ही इससे लड़ा जा सकता है। हमें अपनी पृथ्वी को सही मायनों में 'ग्रीन' बनाना होगा। अपने 'कार्बन फुटप्रिंट्स' (प्रति व्यक्ति कार्बन उर्त्सजन को मापने का पैमाना) को कम करना होगा। हम अपने आसपास के वातावरण को प्रदूषण से जितना मुक्त रखेंगे इस पृथ्वी को बचाने में उतनी बड़ी भूमिका निभाएँगे।

याद रखें कि बूँद-बूँद से ही घड़ा भरता है। अगर हम ये सोचें कि एक अकेले हमारे सुधरने से क्या हो जाएगा तो इस बात को ध्यान रखें कि हम सुधरेंगे तो जग सुधरेगा। सभी लोग अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करें तो ग्लोबल वार्मिंग को भी परास्त किया जा सकता है। ये एक ऐसा राक्षस है जो जब तक सो रहा है, हम सुरक्षित हैं लेकिन अगर यह जाग गया तो हमें कहीं का नहीं छोड़ेगा।

कहाँ से होता है ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन
पॉवर स्टेशन से - 21.3 प्रतिशत
इंडस्ट्री से - 16.8 प्रतिशत
यातायात और गाड़ियों से - 14 प्रतिशत
खेती-किसानी के उत्पादों से - 12.5 प्रतिशत
जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल से - 11.3 प्रतिशत
रहवासी क्षेत्रों से - 10.3 प्रतिशत
बॉयोमॉस जलने से - 10 प्रतिशत
कचरा जलाने से - 3.4 प्रतिशत

बढ़ रहा है खतरा : हमने टेलीविजन के माध्यम से संसार में ग्लोबल वार्मिंग की वजह से बढ़ रहे खतरों को देखा है। आर्कटिक में पिघलती हुई बर्फ, चटकते ग्लेशियर, अमेरिका में भयंकर तूफानों की आमद बता रही है कि हम 'मौसम परिवर्तन' के दौर से गुजर रहे हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि इसका असर सिर्फ समुद्र तटीय इलाकों पर ही नहीं पड़ेगा बल्कि सभी जगह पड़ेगा।

माना जा रहा है कि इसकी वजह से उष्णकटिबंधीय रेगिस्तानों में नमी बढ़ेगी। मैदानी इलाकों में भी इतनी गर्मी पड़ेगी जितनी कभी इतिहास में नहीं पड़ी। इस वजह से विभिन्न प्रकार की जानलेवा बीमारियाँ पैदा होंगी। वैज्ञानिकों के अनुसार आज के 15.5 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान के मुकाबले भविष्य में 22 डिग्री सेंटीग्रेट तक तापमान जा सकता है।

हमें ध्यान रखना होगा कि हम प्रकृति को इतना नाराज नहीं कर दें कि वह हमारे अस्तित्व को खत्म करने पर ही आमादा हो जाए। हमें उसे मनाकर रखना पड़ेगा। हमें उसका ख्याल रखना पड़ेगा, तभी तो वह हमारा ख्याल रखेगी।

1 comment:

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र said...

बहुत बढ़िया पोस्ट . इस मसले पर सभी को विचार करना चाहिए और किये गए विचारों पर सभी को अमल करना चाहिए पर ऐसा होता नहीं है .. धन्यवाद.