August 20, 2009

चटकती दरकती भाजपा की मानसिकता


मुस्लिम वोट बैंक का पीछा करना छोड़ना होगा

भाजपा ने अपने संस्थापक सदस्यों में से एक जसवंत सिंह की छुट्टी कर दी। जसवंत सिंह भाजपा में अटलबिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के साथ शुरूआत के समय से हैं और वर्तमान में इसकी बागडोर संभाले हुए अरुण जेटली और राजनाथ सिंह उनके सामने बच्चे हैं। लेकिन जसवंत सिंह की लिखी एक किताब उनके तीस साल पुराने रिश्ते खा गई। ये तीस साल पुराने रिश्ते भाजपा के साथ वाले हैं। जसवंत सिंह जी ने जिन्ना के फेवर में बोल दिया था। यह उनके सठियाने (हालांकि वो हैं अस्सी के आसपास) की निशानी भी मानी जा सकती है। आडवाणी जी इस निशानी को कुछ साल पहले तब जाहिर कर चुके थे जब वे पाकिस्तान में जिन्ना की मजार पर गए थे। वहाँ उनकी ऐसी जुबान फिसली कि भाजपा का अध्यक्ष पद हाथ से गया और वे उस घटना की अभी तक माफी माँग रहे हैं। सठियाए दोनों ही, बस फर्क इतना रहा कि आडवाणी जी बच गए और जसवंत सिंह जी निबट गए।

लेकिन दोस्तों, ये अजीब वाक्या क्यों घटित हो रहा है समझ नहीं आ रहा। भाजपा को जिन मूल मुद्दों पर रहकर अपना स्थान बनाने की कोशिश करनी चाहिए वो उससे सरके जा रही है। वो बार-बार मुस्लिमों को रिझाने की कोशिश करती नजर आती है। अगर उसे यह करना ही है तो पहले उसे अपना अतीत याद करना चाहिए। भाजपा का स्थान देश की राजनीति में तय ही हिन्दुत्व के आधार पर हुआ है। 1992 में गिरे बाबरी मस्जिद ढाँचे में उसकी भूमिका अहम है और उसे यह भूल जाना चाहिए कि आने वाली कई शताब्दियों तक मुस्लिम उसे वोट देने की गलती से भी सोचेंगे। मुसलमान भाजपा से चिढ़ते हैं, आरएसएस से चिढ़ते हैं और हर उस शख्स से चिढ़ते हैं जो इनसे जुड़ा हुआ हो। भाजपा में दो मुसलमान चेहरे हैं, मुख्तार अब्बास नकवी और शाहनवाज हुसैन। लेकिन भारत की मुस्लिम जमात इन्हें मुसलमान ही नहीं मानती। अगर ये उनके हत्थे चढ़ जाएँ तो भारतीय मुसलमान इन्हें मार ही डालें। भाजपा से जुड़े इन मुसलमानों से मुस्लिम जमात हद दर्जे तक चिढ़ती है। दूसरा उदाहरण मशहूर शायद बशीर बद्र का दिया जा सकता है। वो भाजपा से जुड़े। उनके मोहल्ले में रहने वाले मुसलमानों ने उनका सोशल बॉयकॉट करना शुरू कर दिया। इतना ही नहीं, उनके घर परिवार के बच्चों के साथ कोई बच्चा खेलता तक नहीं था, यह कहकर कि ये तो भाजपा वाले हैं। उनका बहुत टोरचर (मानसिक रूप से प्रताड़ित) किया गया। साधारण मुसलमान जो भाजपा के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ से जुड़ा हुआ है, को भी अपनी खाल बचाकर रखनी पड़ती है। उसे दरअसल मुस्लिम जमात द्वारा धर्म विरोधी माना जाता है।

एक अन्य उदाहरण देना चाहूँगा। इंदौर में एक कॉलोनी है जो मुस्लिम बहुल है। गत वर्ष मध्यप्रदेश में हुए विधानसभा चुनावों में इस कॉलोनी से भी वोटिंग हुई। यहाँ से 1600 वोट पड़े। लेकिन आपको जानकर आश्चर्य हो सकता है कि इनमें से मात्र 3 वोट ही भाजपा को गए। अगर कॉलोनी के रहवासियों को पता चल जाए कि वो तीन वोट कौन से लोगों ने डाले तो उन तीनों की तो समझिए शामत ही आ जाए। यही कारण है कि मुस्लिम वोटों को मुस्लिम वोट बैंक कहा जाता है क्योंकि ये किसी एक पार्टी को थोकबंद पड़ते हैं। भाजपा हर बार गफलत में रह जाती है। किसी पार्टी को अपनी पार्टी लाइन से नहीं भटकना चाहिए। अगर आपको सेक्युलर रहना है तो वह रहिए और नहीं रहना है तो फिर वैसा ही कीजिए...बीच का रास्ता खोजते हुए तो भाजपा बहुत ही साधारण तरीके से दरक जाएगी। इन चुनावों में हमने देख लिया कि भाजपा की राष्ट्रीय स्तर पर फजीहत क्यों हुई। वरुण गाँधी ने उत्तर प्रदेश में आग उगली। लेकिन भाजपा ने उससे अपने को अलग कर लिया। अरे अगर आपने उस व्यक्ति को टिकट दिया है तो पहले ही उसे समझा देना चाहिए था कि क्या बोलना है और अगर बोल दिया तो उसके साथ रहना था। पता चला कि भाजपा उत्तर प्रदेश में मुसलमानों को सीधे तौर पर नाराज नहीं करना चाहती थी क्योंकि वहाँ उनकी संख्या बहुत ज्यादा है। लेकिन भाजपा को ना माया (सत्ता) मिली ना राम मिले। अब वो झूल रही है, उसपर से उसके कुछ सबसे बुजुर्ग नेता सठियाकर कुछ भी उल्टा सीधा बोल रहे हैं जिससे जनता को लग रहा है कि ये अपने स्टेण्ड पर टिक ही नहीं पा रही।

उत्तरप्रदेश में दो अन्य राजनीतिक पार्टियों बसपा और सपा ने अपने स्थाई स्टेण्ड (विचारधारा) से मुसलमानों को अपने हक में किया और अब मुस्लिम वहाँ कांग्रेस को थोकबंद वोट नहीं देते। वहाँ के मुसलमान बाबरी कांड के समय से ही दिल ही दिल में कांग्रेस से भी खफा हैं। उन्हें लगता है कि उस समय केन्द्र में बैठी कांग्रेस चाहती तो वह हादसा रुक सकता था लेकिन उनके पास आप्शन नहीं था। जब सपा और बसपा रूपी आप्शन उनके सामने आए तो उन्होंने कांग्रेस से किनारा कर लिया। मुसलमान कांग्रेस को सिर्फ इसलिए वोट देते हैं ताकि भाजपा सत्ता में नहीं आ पाए, लेकिन भाजपा को यह बात समझ ही नहीं आती। उसको समझ लेना चाहिए कि अगर कोई दूसरा आप्शन सामने आया तो मुसलमान कांग्रेस छोड़कर उसे चुन लेंगे लेकिन भाजपा को कभी नहीं चुनेंगे। इसलिए भाजपा की मुस्लिमों को रिझाने की कोई भी रणनीति कभी काम नहीं आनी वाली।

जिन्ना ने पाकिस्तान नाम का एक ऐसा नासूर हमारे सामने पैदा कर दिया कि हम पिछले 62 सालों से उससे जूझते हुए अपने को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। अगर आज वो नहीं होता तो हमारी तरक्की की राह कहीं अधिक तेज होती। तमाम आतंकवाद और हिंसा पाकिस्तान ने हमें तोहफे में दी। बँटवारे के समय ही लाखों लोग काट डाले गए। यह सब उस जिन्ना की ही वजह से हुआ। लेकिन जसवंत सिंह हैं कि मान ही नहीं रहे। जिन सरदार वल्लभ भाई पटेल को भाजपा अपना हीरो बताती रही है जसवंत सिंह ने उन्हें भी विलेन बना डाला। ऐसे में भाजपा की अंदरूनी बातों को छोड़िए आम भारत का नागरिक क्या सोचेगा। कि इस पार्टी का स्टेण्ड ही अभी तक तय नहीं हो पाया है। इस लोकसभा चुनावों में भारत की जनता ने बता दिया कि उन्हें एक ही स्टेण्ड वाली पार्टी चाहिए जो देश की तरक्की को ही मुख्य माने। भाजपा का राम मंदिर अलाप फुस्स हो चुका है और अब अगर वो मंदिर की बात करेगी तो लोग उसपर हँसेंगे। अब भाजपा को अंदरूनी कलह से उबरकर अपना स्थाई स्टेण्ड रखकर सिर्फ देश की तरक्की पर ध्यान देना चाहिए नहीं तो वो भारत-पाकिस्तान, हिन्दू-मुसलमान करती रह जाएगी और देश में तेजी से बढ़ रही तरक्की पसंद जनता उसे धीरे से किनारे लगा देगी और कांग्रेस बार-बार इसी तरह सत्ता में रिपीट करती रहेगी जैसा कि उसने इस बार किया।

आपका ही सचिन.....।

2 comments:

Suresh Chiplunkar said...

सचिन भाई, मेरे दिल की बात कह दी आपने… :) पूरे लेख के एक-एक शब्द से सहमत…

Common Hindu said...

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