January 04, 2009

घिघियाते गाँधीवादी..!!

६० साल बाद भी नहीं बदली सोच
अभी कुछ दिन पहले मुझे एक रोचक अनुभव हुआ। मैं अपने शहर के एक प्रतिष्ठित गाँधीवादी (उम्र लगभग ८० साल) के यहाँ किसी काम से गया था। वे कहीं जाने के लिए घर से बाहर ही खड़े थे। उनके साथ एक मुस्लिम सज्जन भी खड़े थे। वो कारपेंटर थे और गाँधीवादी महोदय उन्हें किसी काम से अपने गाँव ले जा रहे थे। शायद वहाँ उन्हें कुछ बनवाना था। मेरे पहुँचने के बाद उन लोगों को वापस अपने घर में आना पड़ा। मुझसे बात शुरू की गई। मैं अपने मुद्दे की बात की पाँच लाइनें ही बोल पाया था कि वो गाँधीवादी सज्जन इस्लाम पर अपना ज्ञान देने लगे। मैं भौंचक्का रह गया। बात एक-डेढ़ घंटे लंबी खिंच गई। बातचीत में उन गाँधीवादी सज्जन ने यह तक कह दिया कि वो दीनी मुसलमान हैं और सिर्फ आध्यात्मिक हिन्दू हैं। सामने बैठे मुस्लिम सज्जन (जिनकी उम्र ६७ साल थी) को उन्होंने बोल दिया कि वो इस्लाम के बारे में उनसे अधिक जानते हैं। गाँधीवादी महोदय ने गाँधी जी की तमाम बातें मुझे और उन कारपेंटर महोदय को सुनाईं। 
थोड़ी देर बाद जब अति हो गई तब उस मुस्लिम कारपेंटर ने बोलना शुरू किया। उन्होंने बताया कि वो गाँधीवादी सज्जन इस्लाम के बारे में कुछ नहीं जानते। उन्होंने इस्लाम की तमाम बातें बताईं....मसलन उनके यहाँ दाढ़ी क्यों रखी जाती हैं, मूछें क्यो नहीं....कि अल्लाह ने उनको थोड़े समय के लिए धरती पर भेजा है क्योंकि उनका शैतान के साथ कोई समझौता है। कि सारी आत्माएँ उनके यहाँ जमा हैं और वो सबका ख्याल रखता है। कि कुरान में जीवन जीने की बारीक से बारीक बातें बताई गई हैं और उन्हें फॉलो करके जीवन को तर किया जा सकता है। कि एक दिन वो सबको जन्नत में बुला लेगा। और यह भी कि इब्राहीम मुसलमान थे यहूदी या कुछ अन्य नहीं। उन्होंने ये भी बताया कि उनका २४ साल का लड़का आलिम है और बहुत जानता है, इस्लाम के मामले में उससे कोई पार नहीं पा सकता। उन्होंने अपने बेटे की फोटो भी दिखाई। एक घंटे लगातार बोलने के बाद अब वो गाँधीवादी सज्जन चुप थे। मैं भी चुप था क्योंकि मैं उन दोनों को ही ध्यान से सुन रहा था। दोस्तों मुझे पता चल गया था कि गाँधीजी अपने असल जीवन में कैसे होंगे। कि हमारा देश क्यों दो टुकड़े में टूटा और कैसे जिन्ना ने गाँधीजी से अपनी बात मनवा ली होगी। शहर का एक प्रतिष्ठित गाँधीवादी कैसे एक मुसलमान कारपेंटर को खुश करने के लिए मेरी काम की बात को एक तरफ रखकर सिर्फ इस्लाम की बात करने लगता है, यहाँ तक कि अपने को मुसलमान भी कह देता है जबकि वहीं वो कारपेंटर अपने धर्म पर अडिग है। उसके कॉन्सेप्ट क्लीयर हैं और हाँ वो अपने को ना तो हिन्दू बताता है और ना गाँधीवादी...। मेरे लिए यह अनुभव बहुत भौचक्क और साथ ही रोचक था।

आपका ही सचिन...।

3 comments:

Suresh Chandra Gupta said...

मैंने भी यह अक्सर देखा है कि बहुत से हिंदू यह कहते हुए गर्व अनुभव करते हैं जैसा इन गांधीवादी सज्जन ने कहा. यहाँ तक कि कुछ हिंदू मुसलामानों को खुश करने के लिए अपने धर्म को गाली भी दे देते हैं. ऐसे लोग सेकुलर और प्रगतिशील कहलाते हैं. बैसे सच्चाई यह है कि यह लोग न तो इस्लाम को जानते हैं और न ही हिंदू धर्म को. गाँधी जी भी मुसलमानों को खुश करने में ही लगे रहते थे. कभी-कभी तो इस के लिए अनशन तक कर डालते थे.

मुझे गुड्डी फ़िल्म में गाई गई एक प्रार्थना याद आ रही है, जिसकी एक लाइन है - "दूसरों की जय से पहले ख़ुद को जय करें". पहले हिंदू धर्म को समझ लें, फ़िर उस के बाद इस्लाम को समझने की कोशिश करें. बिना पढ़े और बिना समझे किसी धर्म के बारे में भाषण देना उचित नहीं है.

Shashwat Shekhar said...

जी हां इसी का परिनाम भुगत लिया सन ४७ में, आज भी भुगत रहें हैं।

तरूश्री शर्मा said...

एक बार फिर बढ़िया तेवर सचिन। खूब काटा है इन दोगली मानसिकता वालों को... सालों से परेशान हो रहे हैं इस तुष्टिकरण से, छोटे घटनाक्रम से बड़ा दांव लगाया। बेहद बढ़िया।