January 09, 2009

भारतीय राजनीति और खानदानवाद

क्या राहुल प्रधानमंत्री बनने लायक हैं??
दोस्तों, कल मैं एक खबर बना रहा था। ये आज के अखबारों में भी छपी है। इसमें भारत के विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी मुख्य हीरो हैं। वे चैन्नई में आयोजित हो रहे भारतीय प्रवासी दिवस के अवसर पर कह रहे थे कि राहुल गाँधी देश के प्रधानमंत्री बनने की राह पर हैं। उनके पिता राजीव गाँधी ४० साल की उम्र में प्रधानमंत्री बन गए थे और ३८ वर्षीय राहुल भी इसके लायक हैं। प्रणब प्रवासी भारतीयों द्वारा पूछे गए इस प्रश्न के उत्तर में यह बात कह रहे थे जिसमें उनसे पूछा गया था कि भारत में युवा राजनेता महत्वपूर्ण पदों पर क्यों नहीं हैं..??
दोस्तों, मुझसे कल ही एक मित्र ने कहा था कि स्टार सन राहुल गाँधी पर कुछ लिखूँ। हालांकि राहुल मेरे दिमाग में लंबे समय से थे लेकिन मैं फिर भी कुछ लिख नहीं रहा था। मैं उनके द्वारा की जा रही राजनीति के क्रियाकलापों को ध्यान से पढ़ने की कोशिश कर रहा था। मै राहुल गाँधी द्वारा युवाओं को महत्व दिए जाने की राजनीति से प्रभावित हूँ। मैं इस बात से भी प्रभावित हूँ कि वो राजनीति में ईमानदारी लाने के लिए बहुत प्रयास कर रहे हैं। लेकिन मैं चिंतित भी हूँ कि उनका ये प्रयास कैसे सफल हो सकेगा जबकि कांग्रेस ने डकैतों की पार्टी सपा से संबंध बना रखे हैं, कि उन कम्युनिस्टों से संबंध बना रखे थे जो देश के बजाए अपनी विचारधारा को अधिक महत्व देते हैं। खैर, मैं मुद्दे से भटक रहा हूँ इसलिए कुछ दो टूक बातें करने जा रहा हूँ.....मैंने छोटी उम्र में (राहुल मुझसे लगभग ६ साल बड़े हैं) सुना था कि राजीव गाँधी का बड़ा बेटा (राहुल, प्रियंका से भी बड़े हैं) डिलेड माइलस्टोन है। यह एक प्रकार की दिमागी कमजोरी होती है। फिर मैंने सुना राहुल कोलंबिया की किसी लड़की से ब्याह रचाना चाहते हैं (ये खानदान पहले से ही हाइब्रिड है)...और सबसे बड़ी बात गाँधी फैमिली इस देश की रॉयल फैमिली बन गई है। मतलब प्रथम परिवार जिसने कई प्रधानमंत्री दिए जिन्होंने लगभग ५० साल इस देश पर राज किया और आज इस परिवार की मुखिया सोनिया गाँधी इस देश में अपनी पसंद के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री बनवा रही हैं। वो देश में पिछले ५ वर्षों से अपरोक्ष रूप से राज कर रही हैं और यह कि कांग्रेस में १० जनपथ तीर्थ है।
दोस्तों, मैं अभी अपनी बात की भूमिका ही तैयार कर रहा हूँ। मूल मुद्दे पर मैं अभी तक नहीं आया। मतलब हम लोकतंत्र में पिछले ६० सालों से रह रहे हैं। राजघराने हमने आजादी के बाद निपटा दिए थे। लेकिन भारतीय राजनीति में ये राजघराने आज भी राज कर रहे हैं। कोई भी अपने परिवार से बाहर निकलकर देखना नहीं चाहता। क्या राहुल से योग्य युवा इस देश में नहीं हैं.....हैं, लेकिन उन्हें मौका नहीं है। मसलन मैं प्रणब मुखर्जी की जिस खबर का हवाला दे रहा था उसमें प्रणब ने कहा था कि देश में कई अन्य युवा राजनीतिज्ञ हैं जो प्रमुख पदों पर हैं। उन्होंने हाल ही में जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री बने ओमर अब्दुल्ला का नाम लिया। कुछ नाम मैं भी ले सकता हूँ, जो राहुल की किचन कैबिनेट के सदस्य हैं। मसलन ज्योतिरादित्य सिंधिया, मिलिंद देवड़ा, जितिन प्रसाद, सचिन पायलट आदि। लेकिन आपने इन नामों को पढ़ते समय एक बात महसूस की.......कि ये सभी भी राजघराने से ही हैं। मतलब सभी के बाप-दादा राजनीतिक अखाड़ों के राजा ही थे। और ये सभी सपूत उन्हीं की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। ओमर अपने खानदान की तीसरी पीढ़ी हैं। उनके बाप फारुख अब्दुल्ला और उससे पहले शेख अब्दुल्ला ने कश्मीर में लंबे समय तक अपना हरा झंडा लहराया है। मुरली देवड़ा, राजेश पायलट, जितिन प्रसाद और माधवराव सिंधिया का आपने नाम सुना ही होगा....तो जनाब ये सभी राहुल की किचन कैबिनेट के पिता लोग हैं।
दोस्तों, भारतीय राजनीति को गिरते देखना भी एक रोचक अनुभव है। परिवारवाद इतना हावी है कि कुछ कही नहीं जाए। हर आदमी अपने खानदान के किसी उत्तराधिकारी को ही सत्ता सौंपना चाहता है। मुलायम ने अपने लड़के को सांसद बनवाया, मुफ्ती सईद ने अपनी बेटी को तो फारुख ने अपने बेटे को सत्ता सौंपी। सोनिया, राहुल को सौंपना चाहती हैं। तो ये युवा अपने बल-बूते पर कहाँ से सत्ता में आए। ये तो सब मुगलकाल और उससे पहले हिन्दू राजाओं के काल से चला आ रहा है कि राजा, युवराज, राजा, युवराज.......इस बार युवराज राहुल हैं। तो हमने तरक्की किस आधार पर की। बिल क्लिंटन जिस तरह सड़कों से उठकर अमेरिका के राष्ट्रपति बने थे, या ओबामा जिस प्रकार वकालत करते हुए राष्ट्रपति बने उसकी मिसाल हमारे देश में मिलना वर्तमान में कठिन होता जा रहा है। हालांकि अमेरिका ने भी बुश खानदान का उदाहरण देकर खानदानवाद को बढ़ावा दिया और हाल ही में सीनियर बुश ने तो यह तक कह दिया कि वो अपने दूसरे बेटे जैब बुश को भी अमेरिका का राष्ट्रपति बनते देखना चाहते हैं लेकिन फिर भी वो मामला अलग है...उसमें सत्ता सौंपी नहीं गई थी बल्कि योग्यता के आधार पर जार्ज बुश (वर्तमान राष्ट्रपति) चुने गए थे। लेकिन हमारे यहाँ चरण धोने की परंपरा हजारों साल पुरानी है। पहले चारण भाट हुआ करते थे। आजकल अर्जुन सिंह और प्रणब मुखर्जी हैं।
दोस्तों, जब इस देश के युवा को पता चल गया है कि राजनीति में ऊँचे स्थान तक पहुँचने के लिए किसी राजघराने या कहें किसी खानदान विशेष का युवराज होना जरूरी है तो वो क्यों आएगा राजनीति में...???? और हाँ, अंत में चलते-चलते यह कि देश की सभी पार्टियों में अंतिम बिंदु तय है। वो बिंदु कांग्रेस में सोनिया हैं, समाजवादी पार्टी में मुलायम हैं, बहुजन समाज पार्टी में मायावती हैं, अन्नाद्रमुक में जयललिता हैं, द्रमुक में करुणानिधि हैं, तृणमूल कांग्रेस में ममता बेनर्जी हैं, तेलगूदेशम में चंद्रबाबू नायडू हैं। मतलब सभी क्षेत्रीय पार्टियों में उनके मुखिया ही अंतिम बिंदु हैं। लेकिन शुक्र है कि भाजपा और कम्युनिस्ट पार्टी में वो अंतिम बिंदु तय नहीं है। वहाँ आकाश फिर भी खुला हुआ है। मैं अपेक्षा करता हूँ कि इस देश की राजनीति को अंतिम बिंदुओं तथा चारण भाटों से मुक्ति मिलेगी। आपको और हमको इस राजनीति में भाग्य अजमाने का मौका मिलेगा।
आपका ही सचिन....।

5 comments:

शाश्‍वत शेखर said...

सबसे पहले आपको धन्यवाद कहूँगा इस टॉपिक पर लिखने के लिए| आपने दिल की बात कह दी| सच है आख़िर किस बात लोग सपना देख रहे हैं प्रधानमन्त्री बनाने का, "गांधी" नाम के अलावा और क्या है उनके पास? अभी कुछ करने दीजिये, कुछ साबित करने दीजिये, ये नही की पहले दिन से ही रट लगा लिए| सच कहें तो पुरी कॉंग्रेस गड्ढे में है, उनका एकसूत्री लक्ष्य है ये, जीहुजूरी करने की आदत जो है|

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

भारत की संस्कृति में सामंतवाद अभी पूरी शिद्दत के साथ जीवित है। हो भी क्यों न। यहाँ लोकतंत्र के नायक पूंजीवाद के पहरुए जब पतनशील हो जाएँ तो यही होना है।
देश के वास्तविक नायक जनता के बीच से जन्म लेते हैं। जनता के संगठन जब तक पल्लवित हो कर आकार नहीं होते यह सब देखने को मिलता रहेगा।

संजय बेंगाणी said...

जनता सर माथे पर बैठाती है तभी ये बैठते है. जनता जागे तो परिवारवाद भागे.

शाश्‍वत शेखर said...

सचिन जी, आपसे एक बात जननी थी, आप पत्रकार हैं इस विषय पर प्रकाश डाल सकते हैं|
राहुल कि उम्र अभी ज्यादा नही है, सोनिया जी कांग्रेस में प्राण फूंकने का काम बखूबी कर रही हैं, फ़िर प्रधानमन्त्री के लिए राहुल को प्रोजेक्ट क्यूँ किया जा रहा है, सोनिया को क्यूँ नही| कहीं इसके पीछे विदेशी मूल वाला मुद्दा तो नहीं, कुछ का मानना है कि पिछली बार जिसे सोनिया का त्याग माना जा रहा था, वह विदेशी मूल मुद्दे पर कुर्सी हाथ से जाने से ज्यादा कुछ नही था!

Sachin said...

शाश्वत जी, आप सही समझ रहे हैं। सोनिया का वो त्याग नहीं था बल्कि समझदारी भरी चाल थी। विदेशी मुद्दे वाले सवाल पर तो कांग्रेस से दिग्गज नेता शरद पवार और पी.ए संगमा निकाले गए थे। सोनिया जानती हैं कि प्रधानमंत्री बने बिना भी उनके हाथ में सरकार और कांग्रेस की समस्त चाबियाँ हैं। इतना ही नहीं वे जानती हैं कि राहुल को प्रधानमंत्री बनाने के बाद विपक्षी दलों के पास मौजूद विदेशी मूल वाले मुद्दे की भी हवा निकल जाएगी। फिलहाल सोनिया का राहुल को २००९ में नहीं बल्कि २०१४ में प्रधानमंत्री बनाने की मूड है। इस बार कांग्रेस शायद ही रिपीट कर पाए लेकिन २०१४ में उसका आना तय है। तब तक राहुल भी अनुभवी हो चुके होंगे और उनकी उम्र भी ४३ साल हो चुकी होगी। सोनिया राहुल को निर्विवाद तौर पर देश की राजनीति में स्थापित करना चाहती हैं। अगले पाँच सालों में तो राहुल भी सभी यूपीए घटक दलों द्वारा सर्वस्वीकार्य हो चुके होंगे। सोनिया सारी योजना बहुत सोच-समझकर बना रही हैं।