January 16, 2009

चाँदनी चौक टू चाइना बनाम भारतीय सिनेमा

फूहड़ मनोरंजन की फिल्में बनती हैं हमारे यहाँ

दोस्तों, आज अक्षय कुमार की चाँदनी चौक टू चाइना रिलीज हुई। इससे पूर्व उनकी हिट फिल्म सिंग इज किंग रीलीज हुई थी। हालांकि चाँदनी चौक.... फिल्म के लिए लोगों ने आज अच्छी प्रतिक्रियाएँ नहीं दी हैं लेकिन मैं दिन भर इस फिल्म के बारे में टीवी पर सुनता रहा। ऐसा नहीं है कि मैं ऐसा चाह रहा था बल्कि टीवी चैनल वाले ही जबरदस्ती यह सब दिखाए जा रहे थे। मुझे लगता है कि बाजार के चलते ये फिल्म सड़ी होने के बावजूद चल जाएगी क्योंकि हमारे भारत में ऐसा ही होता है। हालिया कई फिल्में इसकी उदाहरण हैं........क्या हम इस बात को समझ रहे हैं.....??
अब मुझे पढ़ने वाले दोस्त फिर कहेंगे कि बासी विषय पर लिखने बैठ गया ( मैंने सिंग इज किंग फिल्म किसी की जिद पर इत्तेफाक से ही देखी इसलिए जिक्र कर रहा हूँ)....लेकिन प्लीज मुझे माफ करिएगा मैं अमूमन फिल्मों को नहीं देखता....खासकर हिंदी फिल्मों को.....नहीं-नहीं....मैं हिन्दी फिल्मों या हिन्दी भाषा का विरोधी नहीं हूं....काफी देशभक्त हूं...और अपनों तथा अपने देश को बहुत प्यार करता हूं लेकिन छोटी-छोटी बातें मुझे कई बार बहुत परेशान कर देती हैं....आप नहीं समझ रहे ना...??? .... समझाता हूं...
एक बार किसी ने गंभीर फिल्मकार श्याम बेनेगल से पूछा कि आखिर कान (फ्रांस) जैसे विश्व विख्यात फिल्म फेस्टिवल में भारतीय फिल्मों का नंबर क्यों नहीं लगता??.... तो उनका जवाब था कि जिस देश के सिने दर्शक हर १० मिनट बाद फिल्मों में नाच-गाना देखना चाहते हों उस देश में गंभीर विषयों पर फिल्म कैसे बन सकती है..खासतौर से ऐसी फिल्मे जिन्हें कान फिल्म फैस्टिवल में जगह मिले और अवार्ड भी....... गंभीर बात है साहब लेकिन आप-हम नहीं समझ रहे....।
सिंग इज किंग या अक्षय कुमार की अन्य फिल्मों की स्टोरी ऐसी होती है कि आप-हम किसी को सुना भी नहीं सकते..... ऐसी फिल्में समाज को क्या संदेश देती हैं मुझे समझ नहीं आता लेकिन हां, ऐसी फिल्में हिट खूब होती हैं।
यहाँ मैं सिर्फ अक्षय कुमार का नाम ही नहीं ले रहा हूँ। आप शाहरुख खान की पिछली कुछ हिट फिल्मों का जिक्र कीजिए। करण जौहर के मानसिक दिवालिएपन के अलावा उन फिल्मों में कभी कुछ नजर नहीं आता। ओम शांति ओम एक बहुत ही बासे टॉपिक पर बनी फिल्म थी। .मैं ये भी देखा है कि शाहरुख रीमेक पर विश्वास करता है। क्यों ये मैं नहीं कह सकता लेकिन उसकी सारी फिल्में कुछ दशक पहले हिन्दी में ही बन चुकी होती हैं। और अगर नहीं तो अंग्रेजी में तो वो जरूर पहले से ही बनी होती है। इस बार तो बंपर हिट गजनी की भी चोरी पकड़ी गई। अपने विजन के लिए जाने जाने वाले आमिर की यह फिल्म अंग्रेजी फिल्म मोमेंटो की नकल थी। 
तो दोस्तों, हमारे देश में फिल्म निर्माता और फिल्म निर्देशक हम लोगों के तीन घंटे छीनकर हमें सिर्फ मनोरंजन के नाम पर फूहड़ता परोसते हैं और खुश होते हैं कि साल में इस बार इतनी फिल्में हिट हो गईं..... इतने करोड़ रुपए का व्यवसाय हुआ लेकिन समाज को क्या मिला इसपर कोई बहस नहीं होती.....हिंदी फिल्मों में हिराईनों के रोल के बारे में भी जरा चर्चा कीजिए.....आजकल निर्माता उन्हें सिर्फ नंगा करने पर ही ध्यान दे रहे हैं और ये हम जानते हैं कि इस देश में मजबूर, और मशहूर होने की लालसा वाली कितनी लड़कियाँ हैं और इसके लिए वो क्याकुछ कर-गुजरने के लिए तैयार रहती हैं.......
हॉलीवुड फिल्मों का उदाहरण दूंगा तो लोग देश-द्रोह का आरोपी बना देंगे......लेकिन ज्यादा बात ना करते हुए सिर्फ एक फिल्म का उदाहरण दूंगा......विश्व प्रसिद्ध मैट्रिक्स सीरीज की मूवीज तो आपमें से ज्यादातर लोगों ने देखी होंगी लेकिन किसी ने एक बात पर ध्यान नहीं दिया होगा......फिल्म की सीरीज की आखिरी मूवी मैट्रिक्स-३ जब खत्म होती है तो उसकी स्टारिंग के साथ जो धुन बजती है उसे सुनिएगा..... वह भारत के शास्त्रों से उठाए गए श्लोक हैं.... सर्वे संतु सुखिनः...सर्वे संतु निरामय...सर्वे भद्राणी पशयन्तु..... मा कश्चित दुखभाग भवेत....
जब मैंने मेट्रिक्स पहली बार देखी थी तभी लग रहा था कि यह हिन्दू आइडियलिज्म के ऊपर है लेकिन कोई सुबूत नहीं था......लोगों से चर्चा होती थी बस.....लेकिन अंतिम भाग ने मेरा साथ दिया और उसकी पूरी कहानी ने भी..... मैं कहना चाहता हूं कि अरबों डॉलर की फिल्म भारतीय सोच पर बन सकती है लेकिन हम विदेशी हुए जा रहे हैं.....फिल्मों में लड़कियों को ऐसे कपड़े पहनवा कर नचवा रहे हैं कि अपनी पत्नी, बच्ची या अपनी मां के साथ फिल्म नहीं देख सकते। करण जौहर की फिल्मों में आधी अंग्रेजी घुसी रहती है.....एक आदमी के कई चक्कर और एक औरत के भी कई चक्कर आम हैं.....ऐसी दो कौड़ी की लव स्टोरियों से हम अपने समाज को क्या-कुछ दे देंगे।.........??
कुछ दिनों पहले एक अन्य फिल्म रिलीज हुई थी आमिर खान की तारे जमीन पर.... इसने बहुत तारीफ बटोरी। ये प्रयास अच्छे हैं। ऐसी फिल्में बनते रहनी चाहिए लेकिन एक बिन मांगा सुझाव मेरी तरफ से भी.......
भारतीय सभ्यता और संस्कृति पांच हजार साल पुरानी है.....कई दिग्गज और जबर्दस्त लोगों की दास्तानें इससे जुड़ी हुई हैं..... अगर इन्हीं पर फिल्में बनाई जाएं तो अगले कई साल तक भारतीय फिल्म इंडस्ट्री को आइडिया चुराने के लिए हॉलीवुड का मुंह नहीं ताकना पड़ेगा। दूसरी ओर लव स्टोरी भी चलती रहें.... भई नहीं तो युवा मुझे गाली देंगे लेकिन कम से कम कुछ तो सार्थक हो......
हमारा १०० करोड़ लोगों का देश ओलंपिक में अपने आकार के हिसाब से अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करवा पाता (हालांकि इस बार हमने अच्छा प्रदर्शन किया) ...और ना ही आस्कर या कान में कोई अवार्ड बटोर पाता है.....तो इसके लिए दोषी हम-आप हैं.......हम जब तक ऐसी फिल्में हिट करवाते रहेंगे तब तक गंभीर प्रयास नहीं होंगे और याद रखिएगा मैं यह हर विषय पर कह रहा हूं.....खेल,फिल्म और राजनीति भी.....क्योंकि इन सबमें हमारी पसंद बहुत फूहड़ है इसलिए अंतरराष्ट्रीय नक्शे पर हम पिछड़ जाते हैं......हमें अपनी पसंद सुधारनी होगी.....बस आप लोगों से सिर्फ इतना ही.....
(नोटः कृपया यहाँ स्लमडॉग मिलियनेयर की अपेक्षा नहीं करें। उस फिल्म ने दुनिया के सामने भारत की फूहड़ और गरीब छवि पेश की है। अमिताभ इसपर बोल चुके हैं। विदेशियों को हमें गरीब देखना ही पसंद है। इससे खुश होकर वो हमें अवार्ड भी टिका देते हैं। नहीं तो उस तारे जमीं पर क्यों आस्कर से बाहर कर दिया गया। इस विषय पर अलग से लिखूंगा। स्लमडॉग का निर्देशक एक ब्रिटिश है और उसने फिल्म के नाम के अनुरूप कुत्ते जैसा ही काम किया है)
आपका ही सचिन....।

4 comments:

Amit said...

bahut sahi sachin....accha likha hai....

नीरज गोस्वामी said...

आप की बातों में दम है...इसलिए हमारी सहमति भी है आपसे..शतप्रतिशत......एक बात और अगर भारत की गरीबी को पश्चिम वाले दिखाते हैं तो हम उनकी आलोचना करते हैं...गरीबी हटाने का काम नही करते...ये बात अजीब लगती है..
नीरज

शाश्‍वत शेखर said...

बढिया कहा आपने। हरेक शब्द से सहमति है। आमिर तो खैर जादातर फ़िल्में original ही बनाते हैं, लेकिन बाकियों से कोइ उम्मीद नहीं।

अल्पना वर्मा said...

यहाँ हर वीरवार को नयी फ़िल्म रिलीज़ होती है--हम ने चाँदनी चौक से चाइना कल ही देख ली थी.
शुरू का पार्ट तो बहुत ही बोर करने वाला था-इंटरवल के बाद थोड़ा मनोरंजन था--नहीं तो फ़िल्म में कुछ नहीं है.
आप का सुझाव [बिना मांगे दिया हुआ]बहुत अच्छा है--हमारे देश के इतिहास में इतने किस्से कहानियाँ हैं कि अगर उन्हीं पर फ़िल्म बनायें तो फ़िल्म बनने वालों को बाहर की नक़ल करने की जरुरत ही नहीं पड़ेगी--