January 06, 2009

कैसे गर्व करें अपने सुरक्षा बलों पर..??

इतने पुराने तरीके से कैसे जीतेंगे जंग?
दोस्तों, आज सुबह अखबार में कुछ खबरें पढ़ लीं। बस तभी से मन दुखी है। सोचा कि आप लोगों को भी बताऊँ। हालांकि मेरा विचार आप लोगों को भी दुखी करने का नहीं है लेकिन सच्चाई का पता तो हम सबको होना चाहिए ना..??
तो इस बार मैं उस मुद्दे पर बात करना चाह रहा हूँ जिसपर हम हमेशा गर्व करते रहे हैं। यानी हमारी सेना, सुरक्षा बल और खुफिया एजेंसियाँ। हमने इतिहास में हमेशा पढ़ा कि हमारे देश की सेना शानदार है। हमने पाकिस्तान के खिलाफ चारों युद्ध जीते (हालांकि राजनीतिक तौर पर हम हारे, हमने अपनी बहुत सी भूमि खो दी, लगभग आधा कश्मीर) और चीन से युद्ध में हमने बराबर की टक्कर ली (हालांकि यह भी मुझे काफी बाद में मतलब बड़े होने पर ही पता चला कि चीन से हम बुरी तरह हारे और उसने हमारी ७२ हजार वर्ग किमी जमीन पर कब्जा कर लिया, इससे तीन गुणी कम भूमि पर तो इसराइल बसा है)। दोस्तों, तो ऐसे किस्से सुन-सुनकर मैं बड़ा हुआ। हालांकि मैं मानता हूँ कि इसके पीछे राजनीतिक कारण अधिक हैं और इस वजह से मैंने अपनी सेना पर गर्व करना नहीं छोड़ा। फिर मैंने देखा कि मुंबई हमलों में कैसे छोरे सरीखे १० आतंकियों ने हमारी सेना को छकाया। उनसे डरकर पुलिस तो कहीं जाकर छुप गई, जो सामने आया उसे मार दिया गया। मरीन कमांडोज ने होटलों में अंदर घुसने से मना कर दिया और एनएसजी को पहले तो आने में ही देरी हो गई और बाद में उन्हें भी उन आतंकियों को मारने में ५० घंटे लग गए। उतने घंटे जितने में तो दुनिया भर में कुछ का कुछ हो जाता है। मतलब पूरे दो दिन से ज्यादा...हद है...। इतनी देर में उन आतंकियों ने २०० लोगों को मार डाला, ३०० को घायल कर दिया और एनएसजी के तीन और पुलिस के १७ जवानों को शहीद कर दिया। 
तो दोस्तों मैंने उसका कारण खोजा....इधर-उधर झांका, पढ़ा...नतीजा.... कि हमारी पुलिस और सेना भी भ्रष्टाचार और ढीलेपन का शिकार हो रही है। तो मैं शुरू करता हूँ...
- हमारे देश की कुछ सबसे चुस्त पुलिस में से एक मानी जाने वाली दिल्ली पुलिस के ५५ हजार सुरक्षा कर्मियों में से कई भर्ती के बाद फिर कभी ट्रेनिंग पर नहीं जाते। 
- कांस्टेबल, हेड कांस्टेबल और सब इंस्पेक्टर रैंक के अफसरों में से ८० प्रतिशत के पास हथियार नहीं हैं।
- सिपाहियों को मुकाबले के लिए एसएलआर मिलती है, जो पुरानी हो चुकी है। 
- सब इंस्पेक्टर के पास होती है ९ एमएम पिस्टल जिससे उसे एके ४७ और एके ५६ बंदूकों का मुकाबला करना होता है। 
- वज्र वाहनों में सुधार की दरकार। वायलैस सिस्टम पुराने हैं।
- आतंक निरोधी दस्ते में जवानों की संख्या काफी कम है। 
दोस्तों, आप और हम लोगों को सत्ता के गलियारों से अक्सर यह खबरें सुनने में आती हैं कि पुलिस और अन्य सुरक्षाबलों को आधुनिक और हथियार दिए जा रहे हैं। हकीकत यह है कि जब तक इस तरह की घोषणाएँ अमल में आती हैं जब तक आतंकी और अधिक आधुनिक हथियारों से लैस हो चुके होते हैं। हालांकि इस सब मशीनरी में राजनीति का छेद है जिसे नहीं भरा जा सकता लेकिन इसका खामियाजा आखिर आम जनता को ही उठाना पड़ता है। दिल्ली और मुंबई आतंकियों के फेवरिट टारगेट हैं क्योंकि ये भारत के प्रमुख शहर हैं लेकिन फिर भी हमारे यहाँ हालात ऐसी लचर है। दूसरी ओर आतंकियों ने एक बार ब्रिटेन और अमेरिका को निशाना बनाया लेकिन फिर उस तरफ देखने की उनकी हिम्मत नहीं हुई...इसका भी कारण देख लीजिए..।
न्यूयार्क पुलिस
- टेरेरिस्ट थ्रेट एनालिसिस ग्रुप नीतिगत विश्लेषण कर संबंधित डिपार्टमेंट को भेज दिया करती है। इससे आतंकियों को पकड़ना आसान होता है।
- सुरक्षाकर्मियों के पास हर समय आधुनिक हथियार व संचार सुविधाएँ रहती हैं। 
- तेज रफ्तार वाहन हमेशा तैयार रहते हैं। उपद्गवी इलाकों में जाने के लिए विशेष वाहनों से लैस होती है वहाँ की पुलिस।
- ट्रेफिक सिग्नल पर चेक पाइंट, जिसमें लगे जीपीआरएस सिस्टम की मदद से किसी का भी पता लगाया जा सकता है। 
- हाइवे, नहरों और बाँधों में घुसे हमलावरों से निपटने के लिए विशेष ट्रेंड दस्ता।
लंदन पुलिस
- आधुनिक तकनीकों से लैस है। किसी क्षेत्र में हमला होने पर उस क्षेत्र की पूरी जानकारी वैबसाइट से प्राप्त की जा सकती है। 
- आतंकवाद विरोधी हॉटलाइन हमेशा तैयार। आतंकियों से निपटने वाले रक्षाकर्मी इसी का इस्तेमाल करते हैं। इससे ना तो गोपनीयता भंग होती है और ना ही संवाद में कोई दिक्कत आती है। 
- संदिग्धों पर नजर रखने के लिए कई एजेंसियों का संयुक्त दस्ता, जिससे अपराधी चकमा नहीं दे पाते। 
दोस्तों, इतना अंतर है हममें और उनमें...तो फिर हम क्यों ना पिटेंगे........और बात रही हमारी मशीनरी, सरकार और राजनीतिक पैंतरेबाजी की तो अब इसपर आप लोगों से क्या कहें....सबको सबकुछ पता है। लेकिन फिर भी किसी के कान पर जूँ नहीं रेंग रही है। इस देश के लोगों के भाग्य में शायद ऐसे ही सड़क पर मरना लिखा है (आप लोगों ने गुवहाटी की वो खबर तो पढ़ी ही होगी जिसमें बताया गया था कि इस बार के विस्फोटों के बाद लोगों में पिछले विस्फोटों के बाद उभरे आक्रोश से कम आक्रोश था, पूछने पर स्थानीय लोगों ने बताया कि अब हमें पक्का विश्वास हो गया है कि हमारी रक्षा कोई नहीं कर सकता, ना तो सुरक्षाबल और ना ही सरकार...हमने इस तरह से सड़कों पर मरना स्वीकार कर लिया है, हमें लगता है कि यह हमारे भाग्य में लिखा है) 

आपका ही सचिन....।

6 comments:

शाश्‍वत शेखर said...

जिधर भी देखें कमियां ही नजर आती हैं। पुलिस विभाग में, सेना में, नेता लोगों का कुछ कहना ही नहीं।

अशोक मधुप said...

आप बिलकुल सही है किंतु 200 मरने वालों के बारे मे क्या कहोगे, जिन्होंने बिल्कुल प्रतिरोध नही किया। कायर की भांति कमरे में छिपकर मरने से यदि मुकाबला करने का हौसला किया गया होता तो शायद मरने वाले एक दो आंतकवादी को मारकर सेना आैर सुरक्षा बलो की मदद कर पाते।

shekhu said...

अशोक मधुप साहब,
आपकी टिपण्णी ड्राइंगरूम के योद्धा सी है. आपका मानसिक संतुलन दुरुस्त है न...
सोच समज कर लिखे...

pallavi trivedi said...

bilkul durust farmaya aapne....abhi hame laondon aur america jaisa banne mein bahut wakt lagega.

Neeraj Rohilla said...

आपके पिछले कई लेखों में भटकाव दिख रहा है । कुछ समय पहले आपने इंटरनेट पर लोगों की प्रतिक्रियाओं को अपने ब्लाग पर रखकर कुछ निष्कर्ष निकालने का प्रयास किया था ।

आज की पोस्ट में आप सेना, NSG, मरीन कमाण्डोस की बात प्रारम्भ करते हैं और फ़िर पुलिस फ़ोर्स के बारे में घिसे पिटे तर्क देकर मुद्दे से भटक जाते हैं । आपकी पोस्ट का इन्तजार रहता था लेकिन अब लगता है कि आप शायद जल्दबाजी में लिख रहे हैं । कृपया मेरी टिप्पणी को अन्यथा न लें ।

Sachin said...

नीरज जी, मैंने आपकी बात को गंभीरता से पढ़ा है। हालांकि तर्क तो हमेशा घिसे-पिटे ही होते हैं लेकिन क्या कहें, हैं तो वो तर्क ही। मैंने इस लेख में समस्त सुरक्षा बलों को समेटने की कोशिश की थी नहीं तो लेख बहुत बड़ा हो जाता। बात रही मरीन कमांडोज की तो मैं उन देशों की सेनाओं का भी अपने देश की सेना से तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत कर सकता हूँ लेकिन वो आगे के लेखों में होगा। जिस लेख में टिप्पणियों की बात आप कर रहे हैं उसमें आपकी और मेरी सोच का फर्क हो सकता है। मेरी उन बातों पर हो सकता है कि कम्युनिस्ट तो मुझे गाली भी दे लें, लेकिन वो मेरा विश्लेषण था इसलिए मैं किसी पर ये दबाव नहीं दे सकता कि कोई उसपर समर्थन दे। मैं रोज के अफेयर्स पर अपना दृष्टिकोण रखता हूँ क्योंकि हर रोज हमें अखबार निकालने की आदत है। आप उस तरह से मेरे ब्लाग को लें। और हाँ, चूँकी आप मुझे पढ़ते रहते हैं इसलिए आपका शुक्रिया....आपकी बातों का ध्यान रखा जाएगा, लेकिन ये आश्वासन मैं फिर भी नहीं दे पाऊंगा कि आप मेरी सभी बातों या तर्कों से संतुष्ट होंगे।
आपका ही सचिन....।