January 30, 2009

अमेरिका....हमारा दोस्त या दुश्मन-पहला भाग

२१ वीं शताब्दी को अमेरिकी शताब्दी बनाने का ब्लूप्रिंट
दोस्तों, मेरी तरफ से सब लोगों को बधाई, आखिर तमाम प्रचार के बाद बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति बन गए हैं। भारतीय भी खुश हैं क्योंकि उनकी चमड़ी के मिलते जुलते रंग का कोई व्यक्ति अमेरिका में पहली बार राष्ट्रपति बन गया है। इस बात से खुश होकर अमेरिका के एक भारतीय राजनीतिज्ञ ने आखिर ये तक कह दिया कि अगले दो दशकों में कोई भारतीय अमेरिका का राष्ट्रपति बन सकता है.....मेरी तरफ से डबल बधाई.....।
अमेरिका....अमेरिका...अमेरिका....यह शब्द सुन-सुनकर ही हमारे और आपके बच्चे बड़े हो रहे हैं...उनके ख्वाबों में है अमेरिका....सब के सब वहां जाकर आईटी इंजीनियर जो बनना चाहते हैं ( अगर यही हालत रही तो थोड़े दिन बाद भारत से चित्रकार, कलाकार, संगीतकार और अन्य विधाओं के लोग बनना बंद हो जाएंगे और हम सिर्फ अमेरिकियों के लिए आईटी चाकर पैदा करने वाला कारखाना भर बनकर रह जाएंगे)....... लोग कह रहे हैं कि अमेरिका एक ऐसा देश है जो सबको मौका देता है...वहां बिना भेदभाव के आगे बढ़ने के अवसर मिलते हैं...आप तुरत-फुरत अमीर बन सकते हैं....और....और....और भी बहुत कुछ (मेरे पास शब्द नहीं हैं).....
लेकिन भारतीय अमेरिकियों की बदौलत ही नहीं बल्कि वैसे भी बहुत हिम्मती हैं.... अमेरिका में लगभग ३२ लाख भारतीय रहते हैं....यानी अमेरिका की लगभग एक प्रतिशत आबादी भारतीय मूल की है। इनमें से ज्यादातर संपन्न हैं और भारत का नाम कर रहे हैं... लेकिन अगर आप भारतीयों की दुनिया भर में स्थिति देखें तो वे जहां भी हैं संपन्न हैं। विश्व के विभिन्न कोनों में कुल ढाई करोड़ भारतीय रहते हैं... अमेरिका और केनेडा तो हैं हीं.... इसके अलावा इनमें यूरोप के आईसलैण्ड, स्काटलैण्ड, स्पेन से लेकर अफ्रीका के केन्या, फिजी......नीचे न्यूजीलैण्ड, आस्ट्रेलिया....बगल में थाईलैण्ड, मारीशस, हांगकांग, सिंगापुर, से लेकर रूस और सबदूर भारतीय मौजूद हैं.... मुख्यरूप से गुजराती, मारवाड़ियों, पंजाबियों और सिखों ने बाहर जाकर काम करने की हिम्मत दिखाई है.....मुस्लिम अरब देशों में बहुतायत में गए हैं....आखिर किस देश ने भारतीयों को बढ़ने में मदद नहीं की...वे जहां हैं अपनी दम पर हैं और संपन्न हैं...तो भाईयों इस मामले में अमेरिका के गुण गाने हमें इसलिए बंद कर देने चाहिए......क्योंकि हमने वहां अपनी उपयोगिता सिद्ध करके दिखाई है... वह देश हमें ऐसे ही तरक्की नहीं दे रहा है...... अब तस्वीर के दूसरे रुख की बात करते हैं..इनमें से शायद कुछ बातें आप जानते हों तो शायद कुछ आपके लिए नई होंगी......अमेरिका भारत के लिए दोस्त है या दुश्मन.....यह तो काफी बाद का है....पहला सवाल है कि अमेरिका विश्व का दोस्त है या दुश्मन...???? यह क्यों कहा....? तो पहले कुछ तथ्यों पर नजर....
यह तो आपको पता ही होगा कि विश्व में सबसे रईसी और सबसे ज्यादा रईसों की संख्या भी अमेरिका के पास है.....यूएन की एक रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका के पहले पांच खरबपतियों की संपत्ति विश्व के १४९ अविकसित देशों की कुल जीडीपी से भी ज्यादा है.....धन्य है यह गोरा देश....पूरी पृथ्वी पर इतनी चौड़ी खाई तो आपको अंतरिक्ष से भी दिखाई नहीं देगी जितनी इन माइग्रेटेड लोगों ने बना रखी है.... दुनिया भूख से मर रही है और वहां दौलत का अंत ही नहीं..... अब दूसरा तथ्य........अमेरिका जब-तब दुनिया से गरीबी मिटाने का संकल्प लेता रहता है....वह गरीबी नहीं गरीबों को मिटाने की बात कर रहा है.....मेरे पास कुछ अमेरिकी विशेषज्ञों के डाक्यूमेंट्स हैं जिनसे पता चलता है कि वह दुनिया की आबादी को डिप्लीट यानी कम करने की जुगाड़ में है (इन डाक्यूमेन्टस का उल्लेख मैं अपने ब्लाग की अगली कड़ी में करूंगा और हो सका तो उसकी लिंक भी यहां उपलब्ध कराऊंगा)......आप लोगों ने शायद वाइट मैन्स बर्डन थ्योरी सुनी होगी.....इस थ्योरी का आशय है कि दुनिया को चलाने और सुधारने का भार या कहें जिम्मा इन गोरे लोगों पर है। भाई लोगों इसीलिए तो हालीवुड फिल्मों में अक्सर ये अमेरिकी (और उनके साथ ब्रिटिश) दुनिया को बचाते हुए अमूमन मिल जाते हैं.....मानसिक रूप से दिवालिए लोग हैं ये.....
अब एक और बात......ध्यान दीजिएगा.... सन २००१......जब महात्मा जार्ज डब्ल्यू बुश (जो शक्ल से भेड़िए जैसे हैं और जिन्हे बीमारी भी वहीं है जो भेड़िए को होती है यानी डिस्लेक्सिया) ने एक गोपनीय ग्रुप बनाया.....(वैसे ये और इनके बाप सीनियर बुश पहले से ही एक गोपनीय ग्रुप यानी सीक्रेट सोसायटी स्कल्स एंड बोन्स के मेंबर हैं....यह सोसायटी कितनी वाहियात है यह आपको वीकिपीडिया से पता चलेगा....कृपया जाएं और पता लगाएँ.....उसके बाद मैं उसके बारे में कुछ और भी बहुत रोचक बातें बताउंगा..) ......इस ग्रुप में कॉलेन पॉवेल और पॉल वुल्फोविट्ज (जिन्हे एक महिला के चक्कर में विश्व बैंक की अध्यक्षता खोनी पड़ी थी) शामिल थे। इस ग्रुप ने एक ब्लू प्रिंट बनाया था जिसका मुख्य उद्देश्य था.......द ट्वन्टी फर्स्ट सेंचुरी शुड बीन एन अमेरिकन सेंचुरी.....यानी २१वीं सदी अमेरिका की होनी चाहिए और किसी की नहीं......यह ब्लू प्रिंट वाली बात सामने आई ही थी कि उसके तुरंत बाद अमेरिकी वर्ल्ड ट्रेड सेंटर गिर गए......उसके बाद क्या हुआ दुनिया को मालूम है......सबसे पहले अफगानिस्तान.....फिर इराक.....अब इरान पर निगाहें और उत्तरी कोरिया को खुलेआम धमकियाँ......( मैं बता देना चाहता हूं जिस प्रकार हिन्दी फिल्में फ्लाप नहीं होती और संगीत-वितरण अधिकार बेचकर उसका रुपया पहले ही निकाल लिया जाता है....उसी प्रकार अमेरिका को किसी युद्ध में नुकसान नहीं होता.....वह अपना फायदा पहले ही निकाल लेता है....या धमकियां देकर मित्र राष्ट्रों से ले लेता है)..............
तो ट्रेड सेंटर की इमारतें गिर गई.....अमेरिका ने संसार भर के मुसलमानों को आतंकवादी घोषित कर दिया और सारे इस्लामिक राष्ट्रों की ओर निशाना साध दिया.....मुस्लिम राष्ट्र इन्हें जहां इस्लाम के खिलाफ युद्ध मान रहे हैं मेरा नजरिया इसमें दूसरा है.....अमेरिका किसी का सगा नहीं है....सउदी अरब, कुवैत का जहां वो हितैषी बनता है.....पाकिस्तान को जहां वह बगलबच्चा बनाकर रखता है.....वहीं भारत को जब तब गुगली फैंकता रहता है.....इसके बहुत सारे उदाहरण हैं...वर्तमान में चल रहा मुंबई हमले की जाँच भी इसी का उदाहरण है जिसमें हमें लगातार गुगली फैंकी जा रही है।
अब बाकि अगले ब्लाग में नहीं तो लेख की लंबाई से आप लोग बोर हो जाएंगे......विषय में रुचि आ रही है या नहीं...कृपया बताइएगा....उसी प्रकार की मेहनत इसके अगले भाग को लिखने में करूंगा......तब तक आप लोगों से विदा आपका ही सचिन.....।

2 comments:

शाश्‍वत शेखर said...

बढ़िया लिखा है आपने| अगला भाग पढने का मन है, जल्दी लिखियेगा|

संगीता पुरी said...

अच्‍छा है...आगे भी लिखें...