January 12, 2009

क्या फूट गया है आईटी-बीपीओ का फुगावा?

दोस्तों, पिछली बार बात सत्यम की चल रही थी। लेकिन वो बात निश्चित तौर पर अभी खत्म नहीं हुई है। ये बात तो अब लंबी चलेगी। मैं यहाँ थोड़ा फ्लैशबैक में जाना चाहूँगा। लगभग एक साल पहले फिर ताजा बात भी करूँगा। 

तो दोस्तों, लगभग एक साल पहले एक समूह में चर्चा चल रही थी, बात शेयर बाजार और आईटी-बीपीओ सेक्टर की हो रही थी, इनकी ऊँचाइयों को देश की तरक्की बताया जा रहा था, एक बंदा दावा कर रहा था कि उसने अमेरिका की किसी इकॉनामिक मैग्जीन को पढ़ा है, उसमें लिखा था कि भारत का शेयर बाजार ४५००० के अंक को भी एक दिन छुएगा....वह खुश हो रहा था कि भारत तरक्की कर रहा है.....मैं भी वहाँ उपस्थित था....मैंने उससे पूछा कि क्या वाकई ये तीन सेक्टर मिलकर हमारे देश को चमन कर रहे हैं????........और यह भी पूछा कि क्या गारंटी है कि शेयर बाजार के फूलते इस फुग्गे में किसी दिन कोई पिन नहीं पड़ेगी, तब शेयर बाजार २१००० अंक को छू रहा था।......बात चर्चा तक सीमित थी लेकिन अगले ही दिन शेयर बाजार १५०० अंक नीचे गिरा.....छोटे निवेशकों का दिवालिया निकल गया.....और अगले कुछ दिनों में जिन छोटे निवेशकों ने फिशिंग करनी चाही उन्हें हाथ ही नहीं डालने दिया गया....शेयर बाजार भी जानता है कि उसे किसे फायदा देना है........और हां, तब से शेयर बाजार लगातार नीचे गिर रहा है....उस दिन शेयर बाजार २१००० अंक पर था और अब १० हजार के आस-पास चल रहा है.....बाकि शेयर बाजार के ऊपर मैं पहले भी लिख चुका हूँ इसलिए दोहराव से बच रहा हूं.....

दोस्तों, अब उन कुछ बातों को मैं आपके सामने रख रहा हूं जिनपर मुद्दा गरम था......कि क्या वाकई ये तीन सेक्टर देश पर हावी हो रहे हैं.....एक दिन एमबीए की क्लास में बिजनिस एनवायरमेंट के लेक्चर में लेक्चरर ने फिर वही बात दुहरा दी थी.....कि भारत की इंडस्ट्रीज ग्लोबल हो रही हैं....मैंने पूछा उनसे....कौन सी इंडस्ट्रीज ग्लोबल हो गई भारत की.....तो वो बोले साहब आईटी और बीपीओ.....सही बताऊँ...मैं तो पक चुका हूं इनका नाम सुनते-सुनते.......बीपीओ का कैसा काम है मैं बताना नहीं चाहता......आप लोग जानते हैं.......इस इंडस्ट्री के सफरर्स को भी जानते होंगे......और आईटी ने हमारे देश में क्या किया है बताने की जरूरत नहीं.....उदाहरण देना चाहूंगा.....एक दिन मुझे एक सज्जन मिले.....अच्छे रुतबे वाले पद पर हैं.....काफी ज्ञानवान भी.....उम्र ५० के आस-पास.....उनका इकलौता लड़का है......पिछले आठ साल से अमेरिका में है.....इस दौरान सिर्फ दो बार भारत आया.....ये लोग जा नहीं पाए.....पति-पत्नी अकेले रहते हैं.....कारण आप समझ ही गए होंगे....वही आईटी का चक्कर.......हालांकि वे सज्जन गर्व से फूले नहीं समा रहे थे....लेकिन ऐसे इतने लोगों से मिल चुका हूं कि लिखने बैठूं तो कॉपियां भर जाएं......आईटी ने परिवार उजाड़ दिए.....उस अमेरिकी चमक और रुपए-पैसे ने संपन्न घरों के लड़कों को भी सात समंदर पार पहुँचा दिया......अब तो फैशन सा बन गया है यह कहने का हमारा बेटा...अमेरिका में है और आईटी सेक्टर में है

आईटी का रुतबा या हौवा ऐसे ही नहीं बना.......२५ साल के लड़कों को ५० हजार से १ लाख रुपए वेतन मिल रहा है.....यहीं भारत में....विदेशों में वे डॉलर में कमा रहे हैं......तो बस सब अपना कैरियर इसी कंप्यूटर की १७ इंच की स्क्रीन पर खोज रहे हैं.....ह्यूमेनिटिज खत्म, भाषाएं खत्म, आधारभूत विज्ञान खत्म....... समाज शास्त्र और राजनीति विज्ञान बोगस विषय बन गए हैं.....बीए, बीकॉम सिर्फ ग्रेजुएट कहलाने के लिए किए जाने लगे हैं...... सारी फैकल्टीज मर गई हैं.......बच्चा या ता डॉक्टर बनेगा......या आईआईटी में जाएगा.....नहीं तो कैट ब्रेक करेगा और आईआईएम जाएगा..... देश जाए भाड़ में....सिर्फ विदेश में तरक्की करेगा और यहां उसके परिजन उसकी सफलता के किस्से सुनाएँगे....हम जैसे लोगों को.....और गौरांवित होंगे...... अच्छी अंग्रेजी जानने वालों के लिए बीपीओ सेक्टर है........बस वहां एक ही दिक्कत है.....रुपए के अलावा आप कुछ नहीं कमा सकते.....हां तरल लहजे में सर-सर की रट और डांट पड़े तो भी मुस्कुराना भर तो करना ही पड़ता है......(चेतन भगत का वन नाइट एट कॉल सेंटर पढ़ें, इस बीपीओ सेक्टर पर भारी तमाचा मारा है उस युवा लेखक ने)

तो आईटी सेक्टर शानदार चल रहा था....कि अचानक अमेरिकी बाजार की मंदी यहां भी हावी होती दिखी (शेयर बाजार भी इसी के चलते गिरा था).... तो टीसीएस ने अपने हजारों कर्मचारियों को निकाल दिया.....वेतन तो पहले ही काट चुका था....विप्रो ने भी अभी इसी तरह का कदम उठाया.....सत्यम का दिवाला निकला हुआ समझो, सब कंपनियाँ छँटनियाँ कर रही हैं और युवा लोगों का बसा-बसाया घर उजाड़ रही हैं। बस फिर क्या है......अब बहस चल रही है कि आईटी के फुगावे की भी हवा निकल गई है क्या......कहने की जरूरत नहीं है......समीक्षाएँ खुद ही बता रही हैं......लेकिन इस विषय पर अभी बहुत कुछ लिखना बाकी रह गया है.......तो बाकी अगले पृष्ठ में........आशा करता हूं कि दोस्त इसे पढ़ेंगे.....

आपका ही सचिन.........।

7 comments:

शाश्‍वत शेखर said...

हर subject पर आपकी बेबाक और लीक से हटकर राय प्रभावित करती है।

sareetha said...

बातें सब सही हैं लेकिन देश के हालात को देखते हुए सब कुछ फ़िज़ूल लगने लगता है कभी - कभी । नैतिकता का सलीब ढोने वालों का जीना हर तरफ़ मुहाल है । चारों तरफ़ पैसे का बोलबाला है । जब सब कुछ बिकाऊ हो ,तो लोग पैसा कमाने की सोचें या कुछ और । देश की ज़िम्मेदारी जिन्हॆ सौंपी गई है वो क्या कर रहे हैं...? कोई पूछता है उनसे सवाल ...? पूंजीवाद के दौर में अगर लोग आर्थिक रुप से बढना चाह रहे हैं मेहनत से , तो क्या गलत है...? कम से कम देश में हाहाकार के लिए ज़िम्मेदार प्रजातंत्र के चारों खंबों के गठजोड से तो बेहतर ही हैं ये लोग ।

Nilotpal said...

Mitravar - kuchh samajh mein nahin aaya ki aapko pareshani kis baat se hai? Logon ka humanities ke vishayon ko naa padhna yaa fir 25 saal ke yuva ka videsh jaa kar 50 hajar ya 1 lakh ki salary kamaana? Log agar apne beton ke America jaane se khush hain to aap kyon dukhi ho rahe hain? Waise kitne log jaa paa rahe hain America ya kahin aur (calculate kar ke dekhiyega - bahut kam hain)?

Waise - aapki yeh chinta jayaz hai ki sirf 3 sectors se desh ka bhala nahin ho sakta hai. Bilkul sahi baat hai. Farm sector aur manufacturing sector ka growth bhi hona chahiye. Aur shayad kuchh sakaratmak prayas se yeh sambhav bhi ho paye. Lekin aapka competitive advantage farm sector mein kitna hai? Manufacturing mein bhi limited hi hai - kuchh sectors ko chhod diya jaae to. Bach jaata hai services. Aap yeh to dekhiye ki aapke competitive advantages kya hain. Aapke resources limited hain - sirf human resources hi excess mein hain. To bhai mere agar apne log kuchh dhang ki padhai kar 50 hajaar ya 1 lakh kama rahe hain aur dunia ke kisi kaam aa rahe hain to aap kyon dukhi hain? Kya yeh sthiti humanities padh kar tash khelne se behtar nahin hai?

@ Shashwat
Agar aap yeh batate ki aapko aalekh mein kya achha laga to behtar hota.

Sachin said...

नीलोत्पल...यही नाम है ना आपका...???
मित्र मुझे आपसे कोई समस्या नहीं है। आप रुपया कमाइए और दुनिया के काम आइए। ये आलेख आपके लिए नहीं था। वैसे आपके तर्क अच्छे हैं लेकिन मुझे राष्ट्रपति कलाम की उस बात में विश्वास है कि युवा अगर देश की तरक्की के काम आना चाहता है तो उसे खुद के उद्योग धंधे शुरू करने चाहिए। कई युवाओं ने उदाहरण पेश किया भी है। लेकिन क्या करें, हम हिन्दुस्तानियों को नौकरी करने और नौकर बनने में अधिक आनंद आता है। वो कहा ना आपने सर्विसेज...वही। तो लगे रहिए सर्विसेज में। और हाँ मैं अपने तर्कों को सिद्ध करने के लिए अगले कुछ लेखों में स्वरोजगार की बात करूँगा। अगर इच्छा हो तो पढ़िएगा।
आपका ही सचिन।

Amit said...

bahut sahi likha hai aapne...aapke agle lekh ka intezaar rahega..

नरेश सिह राठौङ said...

आपकी बाते बिलकुल सही है । विषय पर अच्छी पकड है ।

'Yuva' said...

आपकी रचनाधर्मिता का कायल हूँ. कभी हमारे सामूहिक प्रयास 'युवा' को भी देखें और अपनी प्रतिक्रिया देकर हमें प्रोत्साहित करें !!